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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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By Deepak Kumar Dwivedi
लोकतांत्रिक मूल्य, सहिष्णुता और मध्य मार्ग महत्वपूर्ण हैं, किंतु वे धर्म और राष्ट्र की अस्मिता से कभी अधिक नहीं हो सकते। आज हमारे सामने यह गहन प्रश्न है — क्या लोकतांत्रिक मूल्य सर्वोपरि हैं, या धर्म, संस्कृति और अस्मिता की रक्षा? दुर्भाग्य से हमने धर्म को केवल पूजा-पाठ, आचार और संस्कार तक सीमित कर लिया है। उसकी व्यापक सामाजिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक भूमिका भूल चुके हैं। यही भूल हमें बार-बार भटकाती है।
हम इस सभ्यता के युद्धभूमि में खड़े हैं, जहाँ असुरी और राक्षसी शक्तियाँ लगातार संघर्षरत हैं। वैश्विक इस्लामिक जिहाद, ईसाई धर्मांतरण अभियान, वामपंथी और पश्चिमी सांस्कृतिक हावीवाद — ये सभी हमारी सभ्यता, संस्कृति और धर्म को समाप्त करने का प्रयास कर रहे हैं। ऐसे समय में लोकतांत्रिक मूल्य, शांति, सद्भाव और मध्य मार्ग केवल बहाने के रूप में रह जाते हैं।
हम “वसुधैव कुटुम्बकम” की बातें करते हैं, परंतु वही असुरी, अब्राहमिक मत और विचार “मानो या मरो” छोड़ने को तैयार नहीं हैं। जब वे नहीं रुकते, तो क्या हम “सभी धर्म समान हैं” और “सहिष्णुता सर्वोपरि” जैसी अवधारणाओं में फँसकर अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा त्याग दें? धर्म केवल पूजा-पाठ का नाम नहीं है; यह चेतना है, दृष्टि है, जीवन-दर्शन है और सामाजिक संरचना है, जो सत्य और न्याय के लिए खड़ी रहती है।
अन्य मत, पंथ, संप्रदाय, मज़हब और राजनीतिक गिरोह केवल उनके सामाजिक और राजनीतिक रूप हैं। उदाहरणतः इस्लाम को मज़हब कहा जाता है, किन्तु यह केवल आस्था का मामला नहीं है; यह एक राजनैतिक विचारधारा भी है, जिसके अनुयायी अपने सिद्धांत को विश्वभर फैलाना चाहते हैं और पूरी दुनिया को दारुल इस्लाम बनाने का लक्ष्य रखते हैं। उसी प्रकार, पश्चिमी वामपंथ, कम्युनिज्म और चर्च संगठन सत्ता-संचालन और सांस्कृतिक अधिग्रहण के लिए सक्रिय हैं।
आज हमारे आराध्य — भगवान विष्णु, भगवान शिव, ब्रह्मा, श्रीराम, श्रीकृष्ण, जगदम्बा — और हमारे पवित्र धर्मग्रंथ — रामचरितमानस, मनुस्मृति — पर अभद्र टिप्पणियाँ की जाती हैं। हमारे आराध्य के प्रसाद में गौमांस मिलाना, हमारे धर्म को अपवित्र करना और हिंदू परिवार तथा समाज व्यवस्था को ध्वस्त करने का प्रयास करना एक दुर्भाग्यपूर्ण यथार्थ बन गया है। हिंदू परंपराओं को रूढ़िवादी कहकर उन्हें बदलने की कोशिशें न्यायालयों के माध्यम से भी की जाती हैं, जिसका शबरीमाला मामला प्रत्यक्ष उदाहरण है।
आज का न्यायालयिक परिदृश्य हिन्दू मूल्यों और परिवार संरचना के लिए चुनौतीपूर्ण बन गया है। सुप्रीम कोर्ट से लेकर हाईकोर्ट तक ऐसे निर्णय सामने आते हैं जो समलैंगिकता को वैधानिक मान्यता देने, वैवाहिक बलात्कार के मामलों में दुर्भावनापूर्ण रियायत देने, लिव-इन रिलेशनशिप को स्वीकार करने, या विवाहोपरांत अवैध संबंधों को मान्यता देने जैसे विवादास्पद मामलों को प्रोत्साहित करते हैं। इसी बीच, मुस्लिम और ईसाई मामलों में न्यायालय मौन रहती हैं और उनके पर्सनल लॉ का हवाला देती हैं।
हमारी भूमि सदियों से सनातन धर्म, संस्कृति और सभ्यता का प्रतीक रही है। परंतु आज हम ऐसे दौर में खड़े हैं, जब हमारे आराध्य, हमारे धर्म और हमारी परंपराएँ लगातार अपमानित हो रही हैं, और समाज का एक बड़ा भाग मौन साधे खड़ा है।
2008 में सुप्रीम कोर्ट में कांग्रेस सरकार ने हलफनामा प्रस्तुत किया, जिसमें भगवान राम को काल्पनिक बताया गया। उस समय भी सत्ता और न्याय व्यवस्था ने हिन्दू धर्म की आस्था पर सवाल उठाया। आज, अक्टूबर 2025 में, मध्यप्रदेश सरकार ने महाजन आयोग की रिपोर्ट और हलफनामे में भगवान राम पर शंबूक वध और शबुक वध, एकलव्य की कहानी जैसे संदर्भ शामिल किए, जिन्हें वामपंथियों की दृष्टि से तैयार किया गया था। वर्षों से सरकारें बदलती रही हैं, लेकिन हिंदू विरोधी सोच नहीं बदली।
वर्तमान समय में यह विडम्बना चरम पर है कि स्वामी प्रसाद मौर्य जैसे राजनेता, बिहार के पूर्व शिक्षा मंत्री, अनेक सोशल मीडिया इनफ़्लुएंसर्स , लेखक, पत्रकार, फ़िल्म निर्माता, विश्वविद्यालयों के प्राध्यापक, सैकड़ों एनजीओ, यहाँ तक कि उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालय के अनेक न्यायाधीश भी, खुलेआम हिन्दू आस्थाओं, देवप्रतिमाओं, परम्पराओं और संस्कारों के विरुद्ध अमर्यादित एवं अपमानजनक वक्तव्य देते हैं, किन्तु तथाकथित “धर्मनिरपेक्ष” तंत्र एवं मीडिया मौन साधे रहते हैं।
जब हिन्दू समाज अपनी अस्मिता, परम्पराओं और धर्मरक्षा के लिए स्वर उठाता है, तो उसी क्षण सम्पूर्ण “इको-सिस्टम” उसे असहिष्णु, प्रतिक्रियावादी अथवा अपराधी ठहराने में जुट जाता है। एक ओर अपमान, निन्दा, मिथ्याकथन और परम्पराभंजक गतिविधियाँ निर्बाध रूप से चलती रहती हैं; दूसरी ओर यदि हिन्दू समाज अपनी श्रद्धा और अस्तित्व के पक्ष में खड़ा होता है तो लोकतंत्र, नैतिकता, सद्भाव और सहिष्णुता का पाठ उसी को पढ़ाया जाता है।
इस दोहरे मापदण्ड ने हिन्दू समाज को बार-बार पीड़ित और कलंकित करने का वातावरण तैयार किया है। यह स्पष्ट है कि यह समूचा वैचारिक और संस्थागत ढाँचा—चाहे राजनीति हो, न्यायपालिका हो या मीडिया—हिन्दू अस्मिता और परम्पराओं को लक्ष्य बनाकर काम कर रहा है, और जब हिन्दू स्वयं के धर्म, संस्कृति एवं परिवार व्यवस्था की रक्षा की बात करता है, तब उसे अपराधी ठहराने का प्रयास होता है।
सबसे गंभीर और चिंता का विषय यह है कि जब कोई हिंदू अपने धर्म, संस्कृति और परंपराओं की रक्षा के लिए आवाज़ उठाता है, तो वैश्विक मीडिया और लोकतांत्रिक इकोसिस्टम उसे अपराधी बना देते हैं। इतिहास और वर्तमान दोनों ही इसमें स्पष्ट उदाहरण प्रस्तुत करते हैं। बामियान की बुद्ध प्रतिमाएँ बमों से उड़ा दी गईं, पर समाज और मीडिया मौन रहे। वहीं, नूपुर शर्मा के समर्थन में एक साधारण वीडियो स्टेटस लगाने पर निर्दयतापूर्वक कन्हैयालाल दर्जी का जिहादी द्वारा गला काट दिया गया।
यही विरोधाभास हमारे समय का सबसे क्रूर सत्य है — वह जिसे सहने और सहिष्णु होने में महान माना गया, वही अब अपनी आस्था और धर्म की रक्षा करने पर भी अपराधी ठहराया जाता है।
लोकतांत्रिक मूल्य, नैतिक आदर्श, सहिष्णुता और शांति का ज्ञान केवल हिंदुओं के लिए दिया जाता है। वही मूल्य और आदर्श, जब अब्राह्मिक मतो के अत्याचारों के लिए अनुपस्थित रहते हैं, और हिंदू समाज अपने धर्म और संस्कृति की रक्षा करने की बात भी करता है तो उसे अपराधी घोषित कर दिया जाता है।
आज स्पष्ट है कि हमारे आराध्य, हमारी परंपरा और हमारी संस्कृति की रक्षा करना केवल व्यक्तिगत आस्था का मामला नहीं है, बल्कि पूरे समाज और राष्ट्र की अस्मिता का प्रश्न है। यदि हम मौन रहेंगे, तो यह पवित्र भूमि हमें उसी उपेक्षा और अन्याय के गर्त में दफन कर देगी, जहाँ अधर्म और असत्य ने विजय प्राप्त कर ली है।
हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग पेंडुलम की भांति झूलता रहता है। परंतु जब धर्म और अधर्म की रेखा स्पष्ट हो, तब भी लोग मध्य मार्ग की बातें क्यों करते हैं? सहिष्णुता और शांति की बातें क्यों दोहराते हैं, जबकि दैत्य और अधर्मी हमारे आराध्य और संस्कृति पर आक्रमण कर रहे हैं?
सत्य यह है कि हमारी आस्था आहत हो रही है, हमारी बहनों की अस्मिता लूटी जा रही है, हमारी मातृभूमि के 79 वर्ष पूर्व टुकड़े किए जा चुके हैं। ऐसे समय में केवल शांति और सद्भाव की बातें करना धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए पर्याप्त नहीं है।
हम अपना सिर दे सकते हैं, पर धर्म और संस्कृति का सिर कभी झुकने नहीं देंगे। धर्म और राष्ट्र की रक्षा हमारे जीवन से भी अधिक महत्वपूर्ण है। यही हमारी असली पहचान, शक्ति और अस्तित्व की अंतिम ढाल है।
अब प्रश्न यही है — क्या हम अपने आराध्य, धर्म और संस्कृति के विरुद्ध हो रहे अत्याचारों के सामने मौन रहेंगे, या अपनी पवित्र परंपराओं और सनातन धर्म की रक्षा के लिए साहसपूर्वक खड़े होंगे?
🖋️ दीपक कुमार द्विवेदी
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