सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

धर्म, संस्कार और राष्ट्र: संघ की शताब्दी से सहस्राब्दी की ओर


By 🖋️दीपक कुमार द्विवेदी 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की सौ वर्ष की यात्रा किसी संगठन की नहीं, बल्कि एक जीवंत चेतना की यात्रा है। यह उस भारत की आत्मा की यात्रा है जिसने दासता के अंधकार में भी अपनी पहचान, अपने मूल्य और अपनी संस्कृति को जीवित रखा। डॉ. हेडगेवार ने जब संघ का बीज बोया, तब उन्होंने केवल एक संगठन नहीं बनाया — उन्होंने उस राष्ट्रचेतना के बीज को सिंचित किया, जो आने वाले युगों में भारत की आत्मा को पुनः जाग्रत करने वाला था।

सौ वर्ष बीत चुके हैं। इस यात्रा में संघ ने असंख्य चुनौतियों, विरोधों और असहमतियों के बीच भी भारतीय समाज को पुनः ‘स्व’ की ओर मोड़ा है। आज संघ केवल शाखाओं का जाल नहीं, बल्कि करोड़ों हृदयों की संवेदना बन चुका है। उसने गाँवों, बस्तियों, वनवासी अंचलों, सीमांत क्षेत्रों, विश्वविद्यालयों, उद्योगों और राजनीति — सभी में एक अदृश्य संस्कार-शक्ति का संचार किया है। किंतु अब समय है कि यह यात्रा केवल ‘संगठन’ तक सीमित न रहे; अब संघ को उस सहस्राब्दी दृष्टि को लेकर चलना होगा, जो आने वाले हजार वर्षों के भारत की दिशा और दशा तय करेगी।

संघ की यह यात्रा अब ‘संगठन से सभ्यता’ और ‘संघटन से संस्कार’ की यात्रा बन चुकी है। शताब्दी का यह समापन वस्तुतः सहस्राब्दी दृष्टि की भूमिका है — जिसमें भारत का उदय केवल राष्ट्र के रूप में नहीं, बल्कि विश्वबंधुत्व के सनातन ध्रुव के रूप में होगा।

आज समय की पुकार है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पंच परिवर्तन के साथ हिन्दू समाज को नई दिशा प्रदान करे। संघ के सामने केवल संगठन विस्तार का नहीं, बल्कि अखंड भारत के संकल्प को साकार करने का दिव्य उद्देश्य है। यह संकल्प तब पूर्ण होगा जब भारत की आत्मा — धर्म — पुनः राष्ट्र जीवन का प्राणतत्व बने।

इस्लाम, ईसाईयत और वामपंथ से उत्पन्न वैचारिक संकटों ने भारतीय समाज की जड़ों को दुर्बल किया है। इनसे ग्रसित समाज को पुनः सनातन धारा में प्रवाहित करना, घर-वापसी कराना और धर्मस्थापना को जन-आंदोलन के रूप में प्रतिष्ठित करना आज की आवश्यकता है। संघ का प्रत्येक कार्य ‘धर्म संस्थापना’ के भाव से प्रेरित हो — यही भाव “यदा यदा हि धर्मस्य” के संदेश का मूर्त रूप होगा।

क्योंकि आज भारत जिस वैचारिक संघर्ष से गुजर रहा है, वह क्षणिक नहीं है। यह एक दीर्घकालिक सभ्यता-संघर्ष है, जिसमें अब्राह्मिक पंथ और विचारधाराएँ, इस्लाम क्रिश्चियनिटी, कल्चरल मार्क्सवाद, समाजवाद ,पूँजीवाद और उपभोक्तावाद — सब मिलकर भारतीय समाज की मूल संरचना को परिवर्तित करने में लगे हैं। इस संघर्ष का उत्तर केवल राजनीतिक सत्ता परिवर्तन में नहीं, बल्कि सभ्यतागत पुनर्जागरण में छिपा है।
और यह पुनर्जागरण तभी संभव है जब संघ आने वाले सहस्र वर्षों के लिए एक ऐसी वैचारिक रूपरेखा गढ़े जो वेद से विज्ञान तक, संघ से संस्कृति तक, और परिवार से विश्वमानव तक को एक सूत्र में बाँध सके।

संघ की भूमिका : संगठन से सभ्यता तक

बीते सौ वर्षों में संघ ने संगठन निर्माण का कार्य पूर्ण किया है। अब आवश्यकता है कि यह संगठन संस्कृति का वाहक बने। जिस प्रकार पहले चरण में शाखा थी, अब दूसरे चरण में संघ का दर्शन समाज-जीवन के हर क्षेत्र में मूर्त हो — शिक्षा, अर्थनीति, कला, शासन, विज्ञान, मीडिया, कुटुंब व्यवस्था और नीति-निर्माण तक।
संघ को अब केवल शाखाओं की संख्या नहीं बढ़ानी, बल्कि उस संस्कृति का अर्थ पुनः परिभाषित करना है जो भारत को भारत बनाती है।

वेदांत आधारित आधुनिक भारत

संघ की सहस्राब्दी दृष्टि का केन्द्र बिंदु होगा — वेदांत पर आधारित आधुनिकता। एक ऐसा भारत जहाँ आध्यात्मिकता और विज्ञान विरोधी न होकर परस्पर पूरक हों। जहाँ तकनीकी प्रगति के साथ नैतिकता का संयम हो, और जहाँ आर्थिक विकास का आधार केवल उत्पादन नहीं बल्कि संतुलन और समरसता हो।
संघ को अब उस शिक्षा-दर्शन को पुनर्स्थापित करना होगा जो मनुष्य को केवल नौकरी का साधन नहीं, बल्कि जीवन का उद्देश्य सिखाए।

परिवार, समाज और राष्ट्र की पुनर्रचना

सहस्राब्दी दृष्टि का अर्थ केवल नीति नहीं, बल्कि संस्कारों की पुनःस्थापना है। संघ को भारत के परिवार-तंत्र को बचाना होगा, क्योंकि परिवार ही हमारी सभ्यता की मूल इकाई है। जिस दिन भारत का परिवार तूटेगा, उस दिन भारत अपनी आत्मा खो देगा। इसलिए संघ का अगला चरण परिवार-केन्द्रित समाज की पुनर्संरचना का होना चाहिए, जहाँ माता-पिता, शिक्षक और स्वयंसेवक मिलकर अगली पीढ़ी को केवल तकनीकी दक्ष नहीं, बल्कि संस्कारवान नागरिक बनाएँ।

विश्व के लिए भारत का संदेश

संघ की सहस्राब्दी दृष्टि केवल भारत के लिए नहीं, बल्कि विश्व के कल्याण के लिए है। जिस प्रकार वैदिक ऋषियों ने कहा था — “सर्वे भवन्तु सुखिनः, सर्वे सन्तु निरामयाः”, उसी भाव से भारत को विश्व के लिए नैतिक मार्गदर्शक बनना है। संघ का कार्य केवल राष्ट्रीय नहीं, बल्कि वैश्विक भी है — क्योंकि भारत का उत्थान मानवता की दिशा तय करेगा।
संघ को इस दिशा में विश्व संवादों, शैक्षणिक विमर्शों और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के माध्यम से वैदिक-मानवतावाद की नई परिभाषा देनी होगी।

सहस्राब्दी की रूपरेखा : एक जीवंत संकल्प

संघ की यह शताब्दी वस्तुतः सहस्राब्दी की भूमिका है। अब आवश्यक है कि संघ अपने भविष्य-दृष्टि दस्तावेज में यह स्पष्ट करे कि अगले हजार वर्षों के लिए भारत की दिशा क्या होगी —

कैसा होगा उसका समाज-तंत्र?

कैसी होगी उसकी अर्थनीति?

क्या होगा उसका सांस्कृतिक मिशन?

और किस रूप में वह विश्व को नेतृत्व देगा?

यह दृष्टि केवल संघ की नहीं, बल्कि पूरे हिन्दू समाज की सामूहिक चेतना बननी चाहिए। यही “पंचप्रण” की अगली यात्रा होगी — जहाँ भारत का लक्ष्य केवल स्वावलंबन नहीं, बल्कि स्वाभिमान और स्वसंस्कृति पर आधारित विश्व नेतृत्व होगा।

हिन्दू समाज के एकीकरण के प्रयासों को अब सनातन चिंतन के आधार पर संचालित किया जाना चाहिए। हमारी सामाजिक-आर्थिक संरचना सदैव विकेंद्रीकृत रही है — ग्राम, परिवार और समुदाय आधारित। इस विकेंद्रीकृत जीवनदर्शन को और अधिक सशक्त बनाना, समाज को आत्मनिर्भर, आत्मसंतुष्ट और समरस बनाना संघ का आगामी कार्य होना चाहिए।

इस दिशा में शाखा से लेकर साप्ताहिक हनुमान चालीसा पाठ, भजन मंडलियाँ, छोटे वैचारिक समूह, ग्राम स्तर पर कार्यशालाएँ और आत्मविकास केन्द्र जैसे प्रयोग समाज में नई चेतना भर सकते हैं।

अब समय आ गया है कि संघ केवल प्रतिक्रिया में न चले, बल्कि लक्ष्य आधारित, दीर्घकालिक रणनीतिक योजना के साथ आगे बढ़े। संघ के विचारक यह चिंतन करें कि “आने वाले एक सहस्र वर्ष बाद भारत कैसा होगा?” और हम उसे कैसे अधिक भव्य, विराट और दिव्य बना सकते हैं। भारत को अब्राह्मिक असुरी शक्तियों की वैचारिक दासता से मुक्त कराने के लिए एक सुविचारित कार्ययोजना आवश्यक है।

केवल तभी पंच परिवर्तन — व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और मानवता — के माध्यम से युग परिवर्तन का स्वप्न साकार हो सकेगा। यही कलियुग में सतयुग की स्थापना का संघ का लक्ष्य होना चाहिए।

संघ यदि इस कार्य को अपने हाथ में नहीं लेता, यदि वह केवल संगठनात्मक विस्तार तक सीमित रहता है, तो वही स्थिति उत्पन्न हो सकती है जो कभी आर्य समाज या हिन्दू महासभा जैसी संस्थाओं की हुई — वैचारिक तेज मंद पड़ गया और धर्म कार्य लोकजागरण न बन सका।

धर्म ही भारत राष्ट्र की आत्मा है। धर्म व्यक्तिवाद से समष्टिवाद की ओर ले जाता है, “मैं नहीं — हम” का भाव देता है। यही भाव राष्ट्रकल्याण का मूल है। संघ के प्रत्येक प्रकल्प, अनुसांगिक संगठन और स्वयंसेवक का उद्देश्य धर्म संस्थापना होना चाहिए।

आज जब औपनिवेशिक विचारधाराएँ और वैचारिक दासता हमारे चिंतन को जकड़े हुए हैं, तब संघ को सनातन धारा से पुनः जोड़ने का नेतृत्व करना होगा। हमारी विविधता — मत, पंथ, संप्रदाय और परंपराएँ — भले ही अलग प्रतीत हों, किंतु उनका अंतिम लक्ष्य एक ही है — परम ब्रह्म की प्राप्ति।

प्रत्येक स्वयंसेवक का धर्म यह होना चाहिए कि वह भौतिकतावाद की अंधी दौड़ से समाज को निकालकर सनातन मूल्यों की स्थापना करे। हिंदुत्व की विचारधारा को लोकन और वैश्विक बनाना अब समय की आवश्यकता है, जिससे भारत वसुधैव कुटुम्बकम् के भाव का नेतृत्व कर सके।

हिन्दू समाज में तीन वर्ग हैं — धर्मनिष्ठ, अधर्मनिष्ठ और प्रमादनिष्ठ। संघ का लक्ष्य होना चाहिए कि धर्मनिष्ठ हिन्दुओं की संख्या निरंतर बढ़े — अर्थात सज्जन शक्ति का विस्तार हो। जब सज्जन शक्ति सशक्त होगी, तब लोकतंत्र में भी वास्तविक परिवर्तन संभव होगा।

संघ को चाहिए कि वह संख्या नहीं, गुण और लक्ष्यनिष्ठा को प्राथमिकता दे। भले ही स्वयंसेवक एक प्रतिशत हों, पर यदि वे लक्ष्याभिमुख, अनुशासित और धर्मनिष्ठ हैं — तो वही भारत के भावी युग निर्माण के शिल्पी होंगे।



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