सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिन्दू : परिभाषा, कर्म और पुनर्जन्म का सनातन सिद्धान्त



🖋️ दीपक कुमार द्विवेदी

आज की विचार गोष्ठी का विषय था — कर्म सिद्धान्त और पुनर्जन्म।
सभी विद्वानों ने एक स्वर में इस विषय पर जब विद्वानों ने अपने विचार रखे, तो एक बात स्पष्ट रूप से सामने आई — कि यह केवल आध्यात्मिक विषय नहीं, बल्कि हमारे समूचे धर्मशास्त्रीय चिंतन की रीढ़ है।
हमारे वेद, उपनिषद, मनुस्मृति, याज्ञवल्क्य स्मृति, महाभारत, गरुड़ पुराण, बौद्ध त्रिपिटक और जैन आगम — सभी ग्रंथों में कर्म और पुनर्जन्म को जीवन-सिद्ध सत्य के रूप में प्रतिपादित किया गया है।

मनुस्मृति (12.3–12.85) में स्पष्ट कहा गया है —

“कर्मणा जायते जन्तुः कर्मणैव वियुज्यते।
सुकृतं दुःकृतं वा च तदेव फलमश्नुते॥”
अर्थात् मनुष्य अपने कर्मों से ही जन्म लेता है और उन्हीं से मुक्त होता है। जो जैसा कर्म करता है, वैसा ही फल पाता है।

याज्ञवल्क्य स्मृति भी यही कहती है —

 “कर्मजं हि शुभाशुभं यत्र यत्रोपपद्यते।
तत्र तत्रानुभुङ्क्ते तद्भोगान् कर्मसनोद्धृतः॥”
अर्थात् मनुष्य जहाँ भी जन्म लेता है, वहाँ अपने कर्मों के अनुसार ही सुख-दुःख भोगता है।

इन शास्त्रों का यह सुसंगत दर्शन इस बात को स्थापित करता है कि कर्म और पुनर्जन्म का सिद्धान्त केवल दार्शनिक विचार नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व का सनातन विधान है।

भारत की भूमि पर यह विचार केवल किसी ग्रंथ में नहीं, बल्कि जीवन के प्रत्येक कर्म में, मृत्यु के प्रत्येक मौन में, और हर युग की चेतना में विद्यमान रहा है।

पश्चिम ने जब इस विषय पर अनुसंधान प्रारम्भ किया, तो उन्हें अनुभव हुआ कि मृत्यु अंत नहीं है — वह केवल संक्रमण है, एक देह से दूसरी देह की यात्रा। कर्म और पुनर्जन्म केवल दर्शन नहीं, बल्कि वह नैतिक विज्ञान है जो बताता है कि मनुष्य अपने कर्मों का निर्माता स्वयं है। जो जैसा करता है, वैसा ही भोगता है। यही वह भाव है जो मनुष्य को उत्तरदायी, सजग और ईश्वराभिमुख बनाता है।

किन्तु दुःख इस बात का है कि यह महान सिद्धान्त, जो भारतीय चिंतन का प्राण है, आज हमारे ही विश्वविद्यालयों में उपेक्षित है।
हमारे विश्वविद्यालयों में समाजशास्त्र से लेकर राजनीति-विज्ञान तक, हर विषय के सिद्धान्त पश्चिम के विचारकों से लिये गये हैं। दर्शनशास्त्र में कार्ल मार्क्स का ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ और ‘वर्ग-संघर्ष’ पढ़ाया जाता है — वह मार्क्स, जिसने धर्म को ‘अफीम’ कहा था। हम उन्हीं सिद्धान्तों को गर्व से उद्धृत करते हैं, पर अपने वेद-उपनिषदों के गूढ़ विज्ञान को भूल गये हैं।

हमने अपनी सैकड़ों पीढ़ियों की दार्शनिक परंपरा — अद्वैत, द्वैत, विशिष्टाद्वैत, सांख्य, योग, न्याय, वैशेषिक, मीमांसा, तंत्र, कश्मीर शैव, बौद्ध, जैन और चार्वाक तक — को आधुनिक शोध के क्षेत्र से लगभग बाहर कर दिया है। परिणाम यह हुआ कि हमारे विचारों का स्थान पाश्चात्य अवधारणाओं ने ले लिया।

अब समय आ गया है कि हम इस स्थिति को बदलें।
हमें अपने सिद्धान्तों को आधुनिक अकादमिक जगत में पुनर्परिभाषित करना होगा — तर्क के साथ, प्रमाण के साथ, और आत्मविश्वास के साथ।

सनातन राजनीतिक विज्ञान : धर्माधारित शासन का तत्त्वदर्शन

हमारा राजनीतिक दर्शन केवल सत्ता या शासन व्यवस्था तक सीमित नहीं है, यह तो धर्म पर आधारित एक जीवन-पद्धति है। भारत की प्राचीन परंपरा में राजनीति का अर्थ था — ‘राजधर्म’, अर्थात वह शासन जो धर्म की रक्षा करे, और जिसके माध्यम से समाज में न्याय, मर्यादा और समरसता बनी रहे।
वेद, उपनिषद, रामायण, महाभारत, मनुस्मृति और याज्ञवल्क्य स्मृति — इन सभी में राजनीति का यही स्वर है कि राजा सत्ता का नहीं, धर्म का प्रतिनिधि होता है।

महाभारत में भीष्म पितामह युधिष्ठिर से कहते हैं —

> “धर्मेणैव राजर्षयो राज्यं पालयन्ति नान्यथा।”
अर्थात् राजर्षि वही है जो राज्य को धर्म के माध्यम से चलाता है, अन्यथा नहीं।

मनुस्मृति में भी स्पष्ट कहा गया है —

> “राजा धर्मेण भूमिं रक्षेत् सर्वं धर्मे प्रतिष्ठितम्।”
राजा धर्म के द्वारा ही भूमि की रक्षा करे, क्योंकि सम्पूर्ण शासन धर्म में प्रतिष्ठित है।

सनातन राजनीतिक विज्ञान का मूल तत्त्व यह है कि शासन राज्य के लिए नहीं, प्रजा के लिए होता है। सत्ता का अर्थ वर्चस्व नहीं, कर्तव्य है; और नीति का अर्थ न्याय।
यह व्यवस्था विकेंद्रीकृत है — ग्राम से लेकर राष्ट्र तक प्रत्येक स्तर पर उत्तरदायित्व और कर्तव्य का स्पष्ट विधान है। रामराज्य इसका जीवंत उदाहरण है, जहाँ शासन धर्म पर आधारित था, न्याय सर्वसुलभ था, और प्रजा ही सर्वोपरि थी।

अतः सनातन राजनीतिक विज्ञान एक ऐसा तत्त्वदर्शन है जो धर्म को शासन का आधार, न्याय को नीति का साधन, और लोककल्याण को शासन का लक्ष्य मानता है। यही वह शासन है जो मनुष्य को केवल नागरिक नहीं, बल्कि धर्मनिष्ठ कर्मयोगी बनाता है।

सनातन आर्थिक मॉडल : धर्माधारित समष्टि-कल्याण का सिद्धांत

सनातन आर्थिक मॉडल केवल उत्पादन, उपभोग या धन-संचय का सिद्धांत नहीं है; यह तो जीवन-संतुलन का दर्शन है।
हमारे वेद, उपनिषद और स्मृतियाँ अर्थ को कभी धर्म से पृथक नहीं मानतीं। याज्ञवल्क्य स्मृति कहती है —

> “अर्थो हि धर्मस्य मूलं, धर्मस्तस्य च रक्षणम्।”
अर्थ धर्म का साधन है, और धर्म उसकी मर्यादा।

मनुस्मृति में लिखा है —

> “धनं भृत्येषु सन्त्यज्यं न तु धर्मे कदाचन।”
धन का त्याग भृत्यों में किया जा सकता है, पर धर्म में नहीं; अर्थात् अर्थ का प्रयोग धर्म-संरक्षण में ही हो।

सनातन आर्थिक दृष्टि में धन साधन है, धर्म उसका मार्गदर्शक है, और समाज-कल्याण उसका उद्देश्य।
यह अर्थव्यवस्था “ऋत” — अर्थात् सृष्टि के नैसर्गिक संतुलन — पर आधारित है। यहाँ अर्थ की गति केवल बाजार में नहीं, बल्कि कर्तव्य और दान के प्रवाह में होती है।
वेदों में कहा गया है — “तेन त्यक्तेन भुञ्जीथाः” — अर्थात त्याग के साथ भोग करो। यही सनातन अर्थनीति का मूल है।

इस दृष्टि से सनातन आर्थिक मॉडल विकेन्द्रीकृत, संतुलित और मानवकेन्द्रित व्यवस्था है, जहाँ गृहस्थ से लेकर राजा तक हर व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करते हुए समाज में संतुलन और समरसता बनाए रखता है।
रामराज्य इसका जीवंत उदाहरण है — जहाँ न कोई अभाव था, न अन्याय; सबको धर्मसम्मत रूप से फल प्राप्त होता था।

सनातन अर्थनीति का उद्देश्य व्यक्ति को उपभोक्ता नहीं, कर्तव्यनिष्ठ साधक बनाना है।
यह मॉडल व्यक्ति, समाज और प्रकृति — तीनों के बीच धर्माधारित संतुलन स्थापित करता है, ताकि जीवन केवल भोग नहीं, बल्कि योग बन सके।

अतः सनातन आर्थिक मॉडल वह तंत्र है जो धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चतुर्वर्गों के संतुलन द्वारा सृष्टि-संरक्षण और समष्टि-कल्याण का मार्ग प्रशस्त करता है।

हिन्दू की परिभाषा

हिन्दू कोई भौगोलिक पहचान नहीं, बल्कि एक जीवन-दर्शन है।
हिन्दू वह है जो आत्मा, ब्रह्म, कर्म-सिद्धान्त और पुनर्जन्म में विश्वास रखता है।
वह चाहे विश्व के किसी भी कोने में क्यों न रहता हो — यदि वह इन सिद्धान्तों को मानता है, तो वह हिन्दू है।
इस परिभाषा में बौद्ध, जैन और यहाँ तक कि चार्वाक जैसी नास्तिक परंपराएँ भी सम्मिलित हैं, क्योंकि हिन्दू दर्शन में अस्वीकार का नहीं, स्वीकृति का भाव है।

मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं —

> “धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमार्जवं दशकं धर्मलक्षणम्॥”

 हिन्दू वह है जो धर्म के दश लक्षणों — धृति, क्षमा, दमन, शौच, अस्तेय, इन्द्रियनिग्रह, धी, विद्या, सत्य और अक्रोध — को जीवन में उतारता है।
जो प्रकृति को माता मानता है, जीवों में आत्मभाव देखता है, दया और करुणा से प्रेरित होता है, और सत्य के मार्ग पर चलता है — वही सच्चा हिन्दू है।
हिन्दू होना नर से नारायण बनने की यात्रा है, ‘शिवोऽहम्’ का भाव है, आर्यत्व का पुनर्जागरण है। यही हिन्दू का आत्मस्वरूप है।

अकादमिक जगत में सनातन सिद्धान्तों की पुनर्स्थापना

आज आवश्यकता है कि राजनीति-विज्ञान, समाजशास्त्र, इतिहास, अर्थशास्त्र, दर्शनशास्त्र और धार्मिक अध्ययन — सबमें हमारे अपने सिद्धान्त पुनः प्रतिष्ठित हों।
हमें अब्राह्मिक ‘One Life’ की सीमित अवधारणा से आगे बढ़ना होगा।
मनुष्य केवल एक बार जन्म नहीं लेता; उसका जीवन निरंतर कर्मों के माध्यम से विकसित होता है। यही कर्म सिद्धान्त का सार है।

जब भारत सहित विश्व के विश्वविद्यालयों में यह सत्य पढ़ाया जाएगा, तब लोग समझेंगे कि धर्म किसी पंथ का नाम नहीं — वह जीवन का शाश्वत विज्ञान है।
हमें सनातन धर्म को ‘लोकल से ग्लोबल’ बनाना है, और इसके लिए पश्चिम की नकल छोड़ अपनी मौलिक दृष्टि जगानी है।
हमारे पास वेदों से लेकर आगमों तक, ऋषियों से लेकर दार्शनिकों तक, अनंत विचार-संपदा है।
अब आवश्यकता है कि हम उसी से अपने सिद्धान्त, अपने मॉडल, और अपनी परिभाषाएँ निर्मित करें।

जो आत्मा, ब्रह्म, कर्म और पुनर्जन्म को नहीं मानते, उन्हें भी सनातन धारा से जोड़ा जा सकता है — जैसे चार्वाक दर्शन भी भारतीय परंपरा का ही एक अंग है।
हमें दूसरों की रेखा छोटी करने की आवश्यकता नहीं; अपनी रेखा इतनी बड़ी करनी है कि वे स्वतः लघु हो जाएँ।
हमें उनके ‘नैरेटिव’ का प्रतिकार नहीं करना, अपना नैरेटिव गढ़ना है।

धर्मरक्षा ही मानवता की रक्षा

जब धर्म का उत्थान होगा, तभी सम्पूर्ण मानवता का उत्थान संभव है।
सज्जन शक्ति को संगठित होना होगा, और दुर्जनों के विनाश का संकल्प भी लेना होगा — यही धर्म की स्थापना का सूत्र है।
श्रीकृष्ण ने गीता में कहा —

> “परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।”

हमें धर्म की पुनः स्थापना के लिए आर्यत्व का पुनर्जागरण करना होगा।
सबको भगवा ध्वज के नीचे लाना, सबको धर्म के पथ पर प्रेरित करना — यही हिन्दू का सामूहिक प्रयास होना चाहिए।

जब हम चरैवेति चरैवेति के मंत्र को जीवन का ध्येय बनाएँगे,
जब हम आत्मा, ब्रह्म और कर्म-सिद्धान्त के सत्य को पुनः प्रतिष्ठित करेंगे,
तब धर्म की पुनः स्थापना और मानव सभ्यता का पुनरुत्थान — दोनों निश्चित हैं।

धर्मो रक्षति रक्षितः — यही हिन्दू का शाश्वत वचन है।

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