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वंशवाद के विरुद्ध आदर्श की मिसाल: सरदार पटेल का परिवार


(31अक्टूबर #सरदार_वल्लभभाई_पटेल जयन्ती पर विशेष)🙏

भारत की राजनीति और सार्वजनिक जीवन में वंशवाद की गंध इतनी गहरी समाई हुई है कि जनता का विश्वास अक्सर व्यक्ति से अधिक उसके उपनाम पर टिक जाता है। आज़ादी के बाद से लेकर अब तक अनेक राजनीतिक घराने अपनी विरासत का लाभ उठाकर सत्ता की सीढ़ियाँ चढ़ते रहे हैं। किंतु इस चमक–दमक से दूर, एक परिवार ऐसा भी है जिसने भारत के इतिहास में अप्रतिम योगदान देने वाले अपने पुरखों की महिमा को कभी अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं भुनाया — वह है सरदार वल्लभभाई पटेल का परिवार।

प्रधानमंत्री जब सरदार पटेल के वंशजों से मिले, तब बहुतों के लिए यह दृश्य नया था। सोशल मीडिया पर अनेक लोगों ने कहा— “शर्त लगा लो, शायद आपने इन्हें पहले न देखा होगा, न नाम सुना होगा।”
और सच यही है। क्योंकि यह परिवार कभी प्रचार–प्रसार की दौड़ में नहीं रहा। न मंचों की शोभा बना, न सत्ता की सीढ़ियों पर चढ़ा। बल्कि इसने अपने पूर्वज के आदर्शों की सच्ची परंपरा निभाई— सेवा, सादगी और संयम।

सरदार पटेल की सुपुत्री मणिबेन पटेल ने जीवनभर अविवाहित रहकर समाज सेवा और राष्ट्र निर्माण में स्वयं को समर्पित किया। उन्होंने कभी अपने पिता की छवि को निजी लाभ के लिए ढाल नहीं बनाया। वहीं पुत्र दह्याभाई पटेल ने भी नगर निगम से लेकर संसद तक जनसेवा की, परंतु कभी अपने पिता की विरासत का राजनीतिक भांडार नहीं बनाया।

दह्याभाई के पुत्र विपिन पटेल और गौतम पटेल- दोनों ही ने राजनीति से दूरी बनाए रखी। आज भी गौतम पटेल सादगीपूर्ण जीवन जीते हैं, बिना किसी सार्वजनिक प्रदर्शन या लाभ की आकांक्षा के।

यही वह अंतर है जो पटेल परिवार के संस्कारों को अन्य तथाकथित “वंशवादी परिवारों” से अलग करता है।
जहाँ एक ओर नेहरू–गांधी परिवार ने अपनी सत्ता की निरंतरता सुनिश्चित करने हेतु “परिवार” को संस्था बना दिया, वहीं पटेल परिवार ने “संस्कार” को विरासत बनाया।
नेहरू से लेकर प्रियंका वाड्रा के बच्चों तक— हर पीढ़ी मीडिया और शासन–संरचना के विशेष संरक्षण में अपनी जीवन-कथा लिखवाती रही। पर सरदार पटेल के परिवार की गाथा किसी प्रचार की मुखरता नहीं, बल्कि मौन की गरिमा में दर्ज है।

यह मौन किसी विस्मृति का नहीं, बल्कि त्याग का प्रतीक है। उस भारतीय मूल्य का, जो कहता है कि “कर्तव्य ही सर्वोच्च धर्म है।”
पटेल परिवार ने अपने पुरखों की छवि को न तो राजनीतिक ब्रांड बनाया, न किसी पद या पुरस्कार की सीढ़ी। उन्होंने उस विरासत का सम्मान करते हुए कहा – ‘वंश नहीं, मूल्य ही पहचान हैं।’

आज जब प्रधानमंत्री जैसे नेतृत्वकर्ता ऐसे परिवार से मिलते हैं, तो यह केवल एक औपचारिक भेंट नहीं होती, बल्कि राष्ट्र के प्रति निःस्वार्थ सेवा की परंपरा को प्रणाम होता है।
यह मुलाकात हमें यह स्मरण कराती है कि राष्ट्र की आत्मा उन लोगों में बसती है, जो नाम नहीं, काम के उत्तराधिकारी बनते हैं।
सरदार पटेल ने भारत को एकता की डोर में बाँधा था, और उनका परिवार आज भी उस एकता का जीता-जागता प्रतीक है —
शांत, विनम्र, परंतु प्रेरणादायक।

🌹 आज के भारत को पटेल परिवार जैसे उदाहरणों से सीखना चाहिए कि विरासत का सम्मान दिखावे से नहीं, चरित्र से होता है।
एक ओर जहाँ वंशवाद अपने नाम से सत्ता खरीदता है, वहीं सरदार पटेल के उत्तराधिकारी अपने मौन से संस्कारों की शक्ति को पुनर्जीवित करते हैं।
भारत के युवाओं के लिए यह परिवार यह संदेश देता है कि सम्मान पाने का नहीं, योग्य बनने का प्रयास करो- इतिहास स्वयं तुम्हें अमर कर देगा।
🌹🙏 #kailash_chandra Kailash Chandra

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