सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

माथे से गायब होती बिंदी और मिटती जाती पहचान”

आज का समय विचित्र विरोधाभासों से भरा हुआ है। एक ओर हम स्वयं को “आधुनिक” कहने में गर्व महसूस करते हैं, तो दूसरी ओर, अपनी उसी पहचान की जड़ों को काटते जा रहे हैं, जिसने हमें हजारों वर्षों तक सभ्यताओं में सबसे ऊँचा स्थान दिलाया। आधुनिकता की अंधी दौड़ में हमने अपने जीवन से न जाने कितनी ऐसी परंपराएँ छोड़ दीं, जो केवल धार्मिक नहीं, बल्कि वैज्ञानिक और आध्यात्मिक आधार पर निर्मित थीं।
कभी हमारे घरों की महिलाएँ माथे पर पल्लू रखती थीं, साड़ी उनकी मर्यादा की पहचान थी, बिंदी उनका आत्मगौरव थी। आज न पल्लू है, न साड़ी, न बिंदी। किसने रोका उन्हें? किसी ने नहीं। यह अधोपतन हमने स्वयं स्वीकार किया है— आधुनिकता के नाम पर, फैशन के नाम पर, और कभी-कभी “फॉरवर्ड” दिखने की होड़ में।

💥 पहचान से विमुखता का प्रारंभ
कभी तिलक, बिंदी, शिखा, चूड़ी, मंगलसूत्र — यह सब हमारी संस्कृति की भाषा हुआ करते थे। माथे का तिलक केवल सजावट नहीं, बल्कि हमारे भीतर की ऊर्जा का प्रतीक था। भौहों के मध्य जो बिंदु है, उसे संस्कृत में “आज्ञा चक्र” कहा जाता है— यही वह स्थान है, जहाँ से मनुष्य की चेतना, आत्मसाक्षात्कार और एकाग्रता का मार्ग खुलता है।
आधुनिक विज्ञान भी यह स्वीकार करता है कि इस बिंदु के नीचे पिट्यूटरी और पीनियल ग्रंथियाँ होती हैं, जो हमारे हार्मोन, नींद, मानसिक स्थिरता और भावनाओं का संचालन करती हैं। जब चंदन, कुमकुम, भस्म या हल्दी का तिलक वहाँ लगाया जाता है, तो यह स्थान ठंडक पाता है, तनाव घटता है और मस्तिष्क शांत होता है।
यह केवल आस्था नहीं। योग, आयुर्वेद और विज्ञान का समन्वित ज्ञान है।

योग और आयुर्वेद की दृष्टि से
योगशास्त्र कहता है कि आज्ञा चक्र ध्यान का केन्द्र है। साधक जब ध्यान में अपनी दृष्टि इस बिंदु पर टिकाता है, तो उसकी चेतना स्थिर होती है, स्मरणशक्ति और अंतर्ज्ञान बढ़ता है। आयुर्वेद बताता है कि यह बिंदु “पित्त दोष” को नियंत्रित करता है, जिससे तनाव, क्रोध और मानसिक उष्णता कम होती है।
तिलक लगाने से यह स्थान बार-बार सक्रिय रहता है, जिससे शरीर, मन और आत्मा के बीच सामंजस्य बना रहता है। इसलिए हमारे पूर्वजों ने इसे दैनिक जीवन में सम्मिलित किया— न केवल धर्म के लिए, बल्कि स्वास्थ्य और आत्मसंयम के लिए भी।

💥नारी की बिंदी- सौंदर्य नहीं, चेतना का प्रतीक
भारतीय स्त्रियों के लिए बिंदी केवल श्रृंगार नहीं, यह उनके मानसिक संतुलन और ऊर्जा का प्रतीक है। लाल बिंदी आत्मविश्वास और शक्ति की अभिव्यक्ति है, काली बिंदी शीतलता और सुरक्षा का प्रतीक, और चंदन की बिंदी पवित्रता और शांति का द्योतक। जब कोई स्त्री बिंदी लगाती है, तो उसके भीतर की ऊर्जा केंद्रित होती है, उसकी उपस्थिति में सौम्यता और गरिमा का विस्तार होता है।

💥 समाज में बदलते संस्कार
लेकिन दुख इस बात का है कि आज जिन परंपराओं ने हमें आत्मबल दिया, उन्हीं को हमने बोझ समझ लिया। विवाह-सगाई जैसे संस्कारों में पारंपरिक परिधान और रीति की जगह आज “प्री-वेडिंग शूट” और फूहड़ विदेशी रस्मों ने ले ली है।
जन्मदिन अब “बर्थ-डे पार्टी” बन गया, विवाह-वर्षगांठ “एनिवर्सरी” कहलाने लगी, और नमस्कार की जगह “हाय-हैलो” ने ले ली।
हमारे बच्चे आज मंदिर से अधिक मॉल को जानते हैं। उन्हें न मालूम कि मंदिर में क्यों जाना है, वहाँ क्या करना है। उनकी शिक्षा पश्चिमी पाठ्यक्रम से होकर गुजरती है, लेकिन उसमें अपने श्लोक, अपने नवकार मंत्र, अपनी संस्कृति का कोई अंश नहीं होता।
क्योंकि हमने स्वयं यह सब छोड़ दिया।

💥जड़ों से विमुखता का परिणाम
कभी हमारी वेशभूषा, आचरण और बोली से कोई भी पहचान लेता था कि यह वैश्य या मारवाड़ी परिवार है, यह ब्राह्मण है, यह क्षत्रिय है— क्योंकि हर समाज अपनी विशिष्टता में सुंदर था। आज सब कुछ “कॉमन” हो गया है— भाषा से लेकर भोजन तक।
प्याज-लहसुन, शराब-मांस और पश्चिमी परिधान अब सामान्य हैं, और परंपरागत आचार को “पुराना फैशन” कहकर हंसी में उड़ा दिया जाता है।
पर क्या यह आधुनिकता का चिह्न है या अपने मूल से कटने की प्रक्रिया?
जब पहचान मिटती है, तो आत्मा भी खोने लगती है। यही हमारी सबसे बड़ी समस्या है— हम चाहते हैं कि समाज जागे, पर स्वयं उदाहरण नहीं बनते। हम उपदेश तो देते हैं, पर आचरण में वही नहीं उतारते। यही दोहरा आचरण हमारे समाज में उदासीनता और अविश्वास को जन्म देता है।

💥परंपराओं की व्यावहारिक प्रासंगिकता
आज दीपोत्सव का समय है। यह लक्ष्मीजी का पर्व है — पूर्णता, सौंदर्य और समृद्धि का प्रतीक। क्या हम कल्पना कर सकते हैं कि लक्ष्मीजी बिना बिंदी के हों? फिर भी, आज कई बड़े ज्वेलर्स के दीपावली विज्ञापनों में लक्ष्मी जैसी नारी दिखाई जाती है— बिना बिंदी के!
पैसे तो हिंदू त्योहारों से कमाएंगे, पर परंपरा नहीं निभाएंगे।
यह मात्र एक विज्ञापन नहीं, बल्कि हमारी चेतना पर प्रहार है।
यदि हमारी परंपराएँ विज्ञापनों से मिटाई जा सकती हैं, तो यह हमारी चेतना की शिथिलता है।
क्यों न हम उन पारंपरिक सुनारों, कारीगरों, और स्थानीय कलाकारों को सशक्त करें, जो आज भी अपने कार्य में धर्म और संस्कृति का सम्मान बनाए रखते हैं? क्यों न हम अपनी खरीदारी को भी सांस्कृतिक चेतना से जोड़ें— ताकि आर्थिक समृद्धि उन हाथों तक पहुँचे जो परंपरा को जीवित रखते हैं।

🌹 आत्ममंथन का समय
आज आवश्यकता है आत्ममंथन की। क्या हम अपने बच्चों को केवल “ग्लोबल सिटीजन” बना रहे हैं या “संस्कारवान भारतीय” भी बना रहे हैं?
क्या हमारी आधुनिकता हमारी पहचान को नष्ट कर रही है या उसका विकास कर रही है?
हमें यह स्वीकार करना होगा कि भारतीय संस्कृति केवल पूजा-पाठ नहीं, बल्कि जीवन विज्ञान है। तिलक और बिंदी इसका जीवंत प्रतीक हैं — जो शरीर, मन और आत्मा को एक सूत्र में बाँधते हैं।
जब तक माथे से तिलक और बिंदी नहीं मिटे थे, तब तक हमारी चेतना भी जीवित थी।
अब समय है— हम फिर से अपनी पहचान के उस सरल, सहज और सजीव स्वरूप की ओर लौटें, जहाँ आधुनिकता भी हो, परंपरा भी; विज्ञान भी हो, श्रद्धा भी।
क्योंकि जो अपनी जड़ों से जुड़ा रहता है, वही सशक्त रहता है।
और जो जड़ों को काट देता है, वह चाहे कितना भी आधुनिक क्यों न दिखे, भीतर से खोखला ही रहता है।
– भारतीय संस्कृति के पुनर्जागरण की ओर एक विनम्र आह्वान।
 “तिलक और बिंदी केवल परंपरा नहीं, चेतना के दीप हैं— इन्हें बुझने न दें।” 🌹🙏 #kailash_chandra Kailash Chandra kailashchander74@gmail.com 
(प्रकाशित कर सकते है, छोटा चाहिए तो वो भी ले सकते है।)
Kailash Chandra ज़ी

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