- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
- लिंक पाएं
- X
- ईमेल
- दूसरे ऐप
By 🖋️दीपक कुमार द्विवेदी
भारत का जीवन सदा से धर्मप्रधान रहा है। यहाँ धर्म केवल पूजा-पद्धति, मत या संप्रदाय का नाम नहीं है, बल्कि यह जीवन का शाश्वत नियम, समाज की रीढ़ और राष्ट्र की आत्मा है। धर्म वह शक्ति है जो व्यक्ति, परिवार, समाज और राष्ट्र को संतुलित रखती है और जिसे हम धारण करते हैं। धर्म का आधार ईश्वर है, परंतु यह केवल ईश्वर की आज्ञा तक सीमित नहीं है। धर्म ईश्वर से भी श्रेष्ठ है, क्योंकि ईश्वर स्वयं धर्म के नियमों का पालन करते हैं। कभी श्रीराम के रूप में, कभी कृष्ण या बुद्ध के रूप में ईश्वर धर्म का पालन कर लोगों को प्रेरित करते हैं।
धर्म सृष्टि का शाश्वत नियम है। सूर्य अपने प्रकाश का धर्म निभाता है, नदी और समुद्र अपने प्रवाह का धर्म निभाते हैं, पृथ्वी अपने घूर्णन का धर्म निभाती है। इसी प्रकार, प्रत्येक व्यक्ति का धर्म उसके जीवन, चरित्र और समाज के प्रति कर्तव्य में प्रकट होता है। व्यक्ति के स्वधर्म से राष्ट्रधर्म जन्म लेता है और राष्ट्रधर्म से विश्वधर्म की दिशा तय होती है। धर्म अल्पमत में भी श्रेष्ठ है, क्योंकि उसकी शक्ति संख्या या लोकप्रियता से नहीं, बल्कि उसके सत्य, न्याय और नैतिक मूल्यों से मापी जाती है।
यहाँ धर्म और रिलीजन में स्पष्ट अंतर करना आवश्यक है। रिलीजन या पश्चिमी ‘Religion’, केवल किसी विशिष्ट उपासना और आस्था की प्रणाली है—“Religion means a system of faith and worship”। यह केवल निजी श्रद्धा और पूजा तक सीमित है। जबकि धर्म व्यक्ति, परिवार, समाज, राष्ट्र और सृष्टि के समग्र नियम, मूल्य, कर्तव्य और आचरण का समुच्चय है। उपासना केवल धर्म का एक अंग मात्र है।
भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय सम्भवामि युगे युगे॥
ईश्वर स्वयं धर्म की स्थापना के लिए अवतरित होते हैं। यह स्पष्ट करता है कि धर्म पूजा या आस्था से ऊपर है; यह जीवन और सृष्टि के नियमों से जुड़ा है।
स्वधर्म से राष्ट्रधर्म की यात्रा स्पष्ट है। व्यक्ति का स्वधर्म उसके परिवार, समाज और राष्ट्र के प्रति कर्तव्यों में प्रकट होता है। जब व्यक्ति अपने कर्तव्यों का पालन करता है, तब ही समाज और राष्ट्र संतुलित रहता है। श्रीराम का वनवास इसका जीवंत उदाहरण है। उन्होंने अपने राजसुख का त्याग किया, पिता की आज्ञा का पालन किया और धर्म की रक्षा के लिए कठिन निर्णय लिए। यही स्वधर्म आगे चलकर राष्ट्रधर्म बनता है। राष्ट्रधर्म वह है जो समाज को जोड़ता, नीति और मर्यादा का पालन कराता और राष्ट्र को प्राण देता है।
धर्म और अधर्म का अंतर स्पष्ट है। धर्म जोड़ता है, अधर्म तोड़ता है। धर्म सत्य, न्याय और करुणा का मार्गदर्शन करता है, जबकि अधर्म स्वार्थ और असत्य का रास्ता है। रावण विद्वान था, पर उसका कर्म अधर्म था क्योंकि उसने मर्यादा भंग की। वहीं श्रीराम और कृष्ण के कर्म धर्म के पालन के लिए थे।
पश्चिमी सेकुलरिज़्म का अनुकरण भारत के लिए घातक है। पश्चिम में इसका जन्म मध्ययुगीन यूरोप में चर्च और राज्य के अत्याचारों के विरोध में हुआ। वहाँ धर्म सत्ता का साधन बन चुका था, इसलिए राज्य और धर्म को अलग करने की आवश्यकता थी। परंतु भारत में धर्म सत्ता का नहीं, जीवन और नीति का आधार है। मनुस्मृति में लिखा है—
> “राजा धर्मेण भूमिं पालयेत्।”
राजा धर्म के अनुसार शासन करता है। भारत में धर्म और राज्य पूरक हैं। पश्चिमी सेकुलरिज़्म का अनुकरण करना धर्म को जीवन और सार्वजनिक व्यवस्था से अलग करना है, जो भारतीय समाज और राष्ट्र के लिए विनाशकारी है।
धर्म केवल उपासना या श्रद्धा का नाम नहीं है। वह जीवन की नीति है, जो व्यक्ति, परिवार और समाज को एक सूत्र में बाँधती है। अहिंसा, सत्य, करुणा और न्याय धर्म की प्रवृत्ति को बढ़ाते हैं। महर्षि अरविंद ने 1911 में कहा था कि भारत का उत्थान तभी संभव है जब सनातन धर्म पुनः अपने तेजस्वी रूप में स्थापित होगा। जब धर्म उठेगा, भारत उठेगा; जब धर्म गिरेगा, भारत गिरेगा।
धर्म का प्रसार केवल भारत तक सीमित नहीं है। ऋषियों ने कहा—
> “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति।”
सत्य एक है, ज्ञानी उसे अनेक रूपों में व्यक्त करते हैं। यही भारतीय धर्म का सार्वभौमिक संदेश है। भारत का धर्म केवल अपने नागरिकों के लिए नहीं, बल्कि सम्पूर्ण मानवता के लिए मार्गदर्शक बन सकता है।
ईश्वर हमारे यहाँ केवल सातवें आसमान में विराजमान नहीं हैं। वह घर के बड़े, मित्र, भाई, पिता—सभी रूपों में हमारे जीवन के प्रत्येक पहलू में मौजूद हैं। इसलिए हमारी संस्कृति किसी मत या संप्रदाय से तुलनीय नहीं है। धर्म केवल आस्था या पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि यह जीवन, समाज और राष्ट्र की संरचना है।
यदि हम धर्म और संस्कृति की गहनता को समझे बिना पश्चिमी सेकुलरिज़्म अपनाएँ, तो भ्रम, विघटन और आत्मविस्मृति हमारे हिस्से में आएगी। समाज की नैतिक दिशा धुंधली होगी, परिवार विघटित होंगे, और राष्ट्र दुर्बल हो जाएगा। धर्म ही भारत की आत्मा है, राष्ट्र का प्राण है। धर्म का पालन न करना केवल व्यक्तियों या समुदाय का नहीं, पूरे राष्ट्र का विनाश है।
स्वधर्म का पालन, राष्ट्रधर्म का सशक्तिकरण और विश्वधर्म की दृष्टि ही भारत को स्थिर, शक्तिशाली और जीवित रख सकती है। धर्म के बिना भारत केवल भौगोलिक क्षेत्र बनकर रह जाएगा, जीवित राष्ट्र नहीं। धर्म का पालन न केवल जीवन और समाज को दिशा देता है, बल्कि राष्ट्र और विश्व को संतुलन प्रदान करता है। यही कारण है कि धर्म हमारे लिए केवल आस्था या उपासना का विषय नहीं है, बल्कि जीवन, समाज, राष्ट्र और विश्व का शाश्वत आधार है।
टिप्पणियाँ
एक टिप्पणी भेजें