सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

कर्तव्य, अधिकार और भारतीय चेतना का संकट


🖋️दीपक कुमार द्विवेदी 

भारत आज एक चौराहे पर खड़ा है — जहाँ विकास की गति तो तेज़ है, पर वैचारिक दिशा कहीं धुंधली होती जा रही है। पिछले एक दशक में देश ने अभूतपूर्व परिवर्तन देखे हैं। आर्थिक आत्मनिर्भरता, विदेशी नीति में दृढ़ता, और वैश्विक मंच पर भारत की प्रतिष्ठा — सबने एक नई राष्ट्रीय चेतना को जन्म दिया।
परंतु इसी कालखंड में कुछ निर्णय ऐसे हुए, जिन्होंने इस चेतना के प्रवाह को आंशिक रूप से बाधित किया है। यह केवल राजनीति की भूल नहीं, बल्कि सामाजिक मनोवृत्ति के संकट का संकेत भी है।

न्याय से ऊपर दबाव की राजनीति

2018 में जब सर्वोच्च न्यायालय ने एससी-एसटी एक्ट के दुरुपयोग पर नियंत्रण के लिए कुछ संशोधन सुझाए, तो वह न्यायिक संतुलन की दिशा में एक आवश्यक कदम था। परंतु देशभर में भड़की हिंसा और राजनीतिक दबाव के चलते सरकार ने न्यायालय के निर्णय को पलट दिया। यह घटना केवल एक कानून तक सीमित नहीं थी — यह उस वैचारिक दृढ़ता की परीक्षा थी, जो “सत्यनिष्ठ शासन” का प्रतीक मानी जाती है।

जनभावना का सम्मान आवश्यक है, पर जब जनदबाव न्याय से ऊपर आ जाए, तो लोकतंत्र भीड़तंत्र बन जाता है। इस एक निर्णय ने यह संदेश दिया कि न्याय अब नीतियों का नहीं, नारों का विषय बन गया है। शासन की नीति का आधार विवेक होना चाहिए, भय नहीं।

कृषि सुधारों की वापसी : अल्पमत की जीत, बहुमत की हार

2020 में पारित तीन कृषि कानून देश के कृषि क्षेत्र को 21वीं सदी की अर्थव्यवस्था से जोड़ने का प्रयास थे। इनमें किसानों को मंडियों से बाहर सीधे व्यापार की स्वतंत्रता, कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग में पारदर्शिता, और कृषि में निजी निवेश के अवसर जैसे प्रावधान थे।
लेकिन आंदोलन की आड़ में गलत सूचनाओं का ऐसा माहौल बना कि सुधारों को ‘कॉर्पोरेट गुलामी’ के रूप में प्रस्तुत कर दिया गया।

जब सरकार ने 2021 में इन कानूनों को वापस लिया, तो यह केवल एक नीति की वापसी नहीं थी, बल्कि राजनीतिक दबाव के आगे आत्मसमर्पण था। यही कारण है कि भारत आज भी कृषि के उस ढांचे में बंधा हुआ है, जहाँ किसान उत्पादन तो करता है, पर मुनाफा नहीं कमाता। यदि इन कानूनों को टिकाऊ समर्थन मिला होता, तो भारत की अर्थव्यवस्था 12–13% विकास दर तक पहुँच सकती थी।

समस्या यह है कि हम राष्ट्र से अधिकार तो मांगते हैं, पर राष्ट्र के प्रति कर्तव्य निभाने की भावना कम होती जा रही है। भाषा, जाति, और क्षेत्र के नाम पर अधिकारों की राजनीति हमें राष्ट्रभाव से दूर ले जा रही है। जब किसी समाज में कर्तव्य का बोध समाप्त हो जाता है, तब उसका अस्तित्व केवल टुकड़ों में बचता है।

तुष्टिकरण का नया रूप : जाति आधारित राजनीति

स्वतंत्रता के बाद दशकों तक भारत में मुस्लिम तुष्टिकरण राजनीति का प्रमुख औजार रहा। पर अब उसका स्थान जातिगत तुष्टिकरण ने ले लिया है। एससी, एसटी, और ओबीसी पहचान की राजनीति जिस तेजी से बढ़ी है, उसने हिंदू समाज की एकात्मता को चुनौती दी है।

सरकार के स्तर पर जातिगत संतुलन के नाम पर जो नीतियाँ बन रही हैं, वे कहीं-न-कहीं समाज को स्थायी वर्गों में बाँटने की दिशा में जा रही हैं। संविधान को ‘कुरानीकरण’ की ओर ले जाना — अर्थात् उसे एक स्थायी और अपरिवर्तनीय ग्रंथ के रूप में प्रस्तुत करना, और डॉ. आंबेडकर को ‘पैगंबर’ के समान स्थापित करना — बौद्धिक दृष्टि से भी अनुचित है। डॉ. आंबेडकर का सम्मान विचारों के कारण है, न कि उपासना के लिए।

यह राजनीति पश्चिम की Critical Race Theory और Identity Politics जैसी अवधारणाओं से प्रेरित है, जो समाज को ‘शोषक’ और ‘शोषित’ वर्गों में बाँटकर स्थायी संघर्ष का वातावरण बनाती हैं। यही विचारधारा अब भारत में “सामाजिक न्याय” के नाम पर फैल रही है।

परंतु सनातन दृष्टि में समाज कभी संघर्ष का नहीं, कर्तव्य का तंत्र रहा है। वर्ण-व्यवस्था का मर्म कार्य-प्रणाली था, अधिकार-प्राप्ति नहीं। आज राजनीति ने इस आधार को पलट दिया है — हर समूह अधिकार की मांग करता है, पर अपने कर्तव्य की चर्चा कोई नहीं करता। 

जातिगत राजनीति और “कास्ट रेस थ्योरी” का भारतीय रूप 

“क्रिटिकल रेस थ्योरी” (Critical Race Theory) का उद्भव अमेरिका में 1970–80 के दशक में हुआ। इसका उद्देश्य अमेरिकी समाज में व्याप्त नस्लीय असमानता को उजागर करना था। परंतु शीघ्र ही यह सिद्धांत केवल सामाजिक न्याय का माध्यम न रहकर राजनीतिक औज़ार बन गया। मार्क्सवादी विचारधारा ने “वर्ग संघर्ष” की अवधारणा को अब “जाति, लिंग और नस्ल” के संघर्ष में बदल दिया। इसे ही “कल्चरल मार्क्सवाद” कहा गया — जहाँ संघर्ष का केंद्र उत्पादन नहीं, पहचान (Identity) बन गई।

भारत में इसी सिद्धांत को “कास्ट रेस थ्योरी” (Caste Race Theory) के रूप में रूपांतरित किया गया। इसमें जाति को “रेस” यानी नस्ल के समान मान लिया गया — और यह धारणा स्थापित की गई कि भारतीय समाज में सवर्ण जातियाँ “जन्मजात शोषक” हैं जबकि अनुसूचित जातियाँ, जनजातियाँ और पिछड़े वर्ग “जन्मजात पीड़ित” हैं। यह विचार अंग्रेजों की नीति से प्रेरित था, जिन्होंने 1857 के स्वातंत्र्य संग्राम के बाद भारतीय समाज की एकता तोड़ने के लिए जातिगत जनगणना आरंभ की। 1871 की जनगणना में “जाति” को पहली बार औपनिवेशिक प्रशासनिक वर्गीकरण का हिस्सा बनाया गया। इससे हिंदू समाज की एकात्मता को गहरा आघात पहुँचा।

आरक्षण की आरंभिक संरचना और उसका विस्तार

स्वतंत्रता के समय संविधान में अनुसूचित जातियों और जनजातियों के लिए 22% आरक्षण का प्रावधान किया गया। यह कदम सामाजिक उत्थान के उद्देश्य से उठाया गया था, किंतु समय के साथ यह राजनीतिक साधन बन गया।
वास्तव में 1947 में एससी और एसटी की सम्मिलित जनसंख्या लगभग 16–17% थी।
इससे अधिक आरक्षण दर निर्धारित करना उस समय एक उदार निर्णय था, पर यह “अस्थायी व्यवस्था” आगे चलकर राजनीतिक स्थायित्व का रूप ले गई।

ओबीसी आरक्षण — सशक्त जातियों को “पिछड़ा” सिद्ध करने की प्रक्रिया

मंडल आयोग की सिफ़ारिशें (1980) लागू होने के बाद ओबीसी वर्ग को 27% आरक्षण मिला।
यहाँ एक गहरी विडंबना थी — जिन जातियों को “पिछड़ा” घोषित किया गया, वे वस्तुतः हिंदू समाज की आर्थिक, राजनीतिक और सामाजिक दृष्टि से सबसे सशक्त जातियाँ थीं।

इनमें से कई जातियाँ राजवंशों और सामंतों के वंशज थीं, जिनके पास हजारों एकड़ भूमि थी, जो व्यापार, उद्योग, कृषि और सामाजिक नेतृत्व में अग्रणी थीं।
राजनीतिक शक्ति में भी इनका वर्चस्व रहा — स्वतंत्रता संग्राम से लेकर आज़ादी के बाद तक अनेक नेता इन्हीं समुदायों से आए।
परंतु मंडल राजनीति के दौर में उन्हें “पिछड़ा” घोषित किया गया, ताकि वे आरक्षण की राजनीति में शामिल होकर संख्यात्मक बहुमत की पहचान बन जाएँ।

इस नीति के परिणामस्वरूप भारत की लगभग 85% जनसंख्या “शोषित, वंचित या पिछड़ा वर्ग” घोषित कर दी गई, और शेष 15% सवर्ण समाज को “जन्मजात शोषक” के रूप में चित्रित किया गया।
यह विचार केवल राजनीतिक नहीं था — यह कल्चरल मार्क्सवाद और क्रिटिकल रेस थ्योरी की अवधारणाओं पर आधारित था, जिसमें समाज को स्थायी संघर्ष की स्थिति में बाँटना ही परिवर्तन का माध्यम माना जाता है।

कल्चरल मार्क्सवाद और “कास्ट रेस थ्योरी”

पश्चिम की “क्रिटिकल रेस थ्योरी” ने जिस प्रकार अमेरिका में नस्ल के आधार पर समाज को शोषक और पीड़ित वर्गों में बाँटा, उसी सिद्धांत को भारत में जाति के आधार पर लागू किया गया।
इसका नया नाम दिया गया — “कास्ट रेस थ्योरी”।
यह सिद्धांत कहता है कि भारतीय समाज में शोषण जन्म से निर्धारित है — सवर्ण सदैव शोषक और दलित-पिछड़ा सदैव पीड़ित।

यह दृष्टि न केवल ऐतिहासिक रूप से असत्य है, बल्कि समाज की वास्तविक संरचना के भी विपरीत है।
भारत में आर्थिक या सामाजिक स्थिति कभी जन्म से निर्धारित नहीं रही — शूद्र राजा बने, ब्राह्मण दारिद्र्य में रहे, और व्यापार का नेतृत्व किसी एक वर्ण तक सीमित नहीं रहा।
लेकिन अब इस सिद्धांत के माध्यम से हिंदू समाज को शाश्वत संघर्ष की मानसिकता में ढकेला जा रहा है — जिससे धर्म, संस्कृति और राष्ट्र की एकता कमजोर होती जा रही है।

आधुनिक राजनीति और जातिगत तुष्टिकरण

2024 के आम चुनावों में जातिगत जनगणना का मुद्दा पुनः राष्ट्रीय विमर्श का केंद्र बना। कांग्रेस, राजद, जद(यू) जैसे दलों ने इसे अपने घोषणापत्र में प्रमुखता से शामिल किया। दुर्भाग्य से, 2024 के चुनाव परिणामों के बाद हिंदूनिष्ठ कहे जाने वाले दलों की ओर से भी जातिगत जनगणना कराने का निर्णय उसके बाद सामाजिक समीकरणों की चर्चा बढ़ी। राजनीतिक दृष्टि से यह रणनीतिक हो सकता है, पर वैचारिक दृष्टि से यह “कास्ट रेस थ्योरी” की वैधता को और मजबूत करता है।

यह एक खतरनाक प्रवृत्ति है — क्योंकि यह हिंदू समाज को दो विरोधी खेमों में बाँट देती है:
एक ओर “जन्मजात शोषक सवर्ण” और दूसरी ओर “जन्मजात शोषित” वर्ग।
जबकि वास्तविकता यह है कि हिंदू समाज का कोई भी वर्ग शोषक नहीं, बल्कि परस्पर पूरक है।

जातिगत जनगणना : समाज को खंडित करने का औजार

2027 में आने वाली जातिगत जनगणना के आँकड़े भारत के भविष्य की दिशा तय करेंगे। इसकी वैचारिक नींव 2024 में कांग्रेस के “जिसकी जितनी आबादी, उसकी उतनी हिस्सेदारी” वाले नारे से रखी जा चुकी है। यह नारा केवल चुनावी नहीं, बल्कि एक नए वैचारिक संघर्ष की घोषणा है।

जब संख्या को शक्ति और अधिकार का आधार बना दिया जाता है, तब समाज में एक नई प्रतिस्पर्धा जन्म लेती है — “संख्या बनाम संपत्ति।” यही विचार मार्क्सवाद की “क्लास स्ट्रगल” अवधारणा का भारतीय संस्करण है, जिसे अब “कास्ट स्ट्रगल” के रूप में लागू किया जा रहा है।

आज कई दल जातिगत आंकड़ों के आधार पर नीतियाँ बना रहे हैं — बिहार, कर्नाटक तेलंगाना,मध्यप्रदेश और झारखंड इसके उदाहरण हैं। इन नीतियों का परिणाम यह हो रहा है कि व्यक्ति अब समाज का नहीं, अपनी जाति का प्रतिनिधि बनकर उभर रहा है।
जो पहले केवल “हिंदू” था, अब “फलां जाति का हिंदू” बन गया है। यह स्थिति केवल राजनीतिक नहीं, सभ्यतागत संकट है।

अधिकार से अधिक कर्तव्य की आवश्यकता

भारत की सनातन परंपरा में अधिकार से पहले कर्तव्य को स्थान दिया गया है। गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं —
“कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।”
अर्थात मनुष्य का अधिकार केवल कर्म करने पर है, फल की अपेक्षा पर नहीं।

परंतु आधुनिक भारत ने इस सूत्र को उलट दिया है — अब हर नागरिक अधिकार मांगता है, पर कर्तव्य से कतराता है। राजनीति भी इसी अधिकारवाद को पोषित कर रही है, क्योंकि अधिकार मांगने वाला व्यक्ति वोट देता है, जबकि कर्तव्य निभाने वाला नहीं।
पर यही अधिकारवाद भविष्य में सामाजिक विघटन का सबसे बड़ा कारण बनेगा।

धर्माधारित संविधान की आवश्यकता

भारत का संविधान यदि भारत के समाज के लिए है, तो उसमें भारत की आत्मा — धर्मबोध — का समावेश होना चाहिए। धर्म का अर्थ यहाँ संप्रदाय नहीं, बल्कि वह जीवन-दृष्टि है जो संतुलन, कर्तव्य और सामंजस्य सिखाती है।
बिना धर्म के संविधान केवल अधिकारों का संग्रह बन जाता है, और अधिकार बिना कर्तव्य के — अराजकता का मार्ग।

सनातन चेतना का पुनर्जागरण

भारत जैसे विविधतापूर्ण समाज में “संख्या आधारित राजनीति” विनाशकारी सिद्ध होगी।
भारत की आत्मा संख्या में नहीं, बल्कि सामंजस्य में है। यह देश गणना से नहीं, भावना से जुड़ा है।
पर जब गणना ही पहचान बन जाएगी, तब पहचान ही संघर्ष का कारण बन जाएगी।

अब समय है कि हर नागरिक अपने भीतर यह प्रश्न उठाए —
“मैं राष्ट्र से क्या पा सकता हूँ?” नहीं, बल्कि “मैं राष्ट्र के लिए क्या कर सकता हूँ?”

कर्तव्य ही वह सेतु है जो अधिकारों को धर्म से जोड़ता है। यही भाव भारत को पुनः उसके वैदिक स्वभाव की ओर ले जाएगा —
और यही, भारतीय चेतना का सच्चा पुनर्जागरण होगा।


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