सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

सनातन दृष्टि बनाम अब्राह्मिक दृष्टि : हिन्दू समाज के समक्ष वर्तमान वैचारिक संघर्ष और वैदिक समाधान



🖋️दीपक कुमार द्विवेदी 

कभी-कभी लगता है कि हम एक ऐसे दौर से गुज़र रहे हैं जहाँ सोचने और समझने की क्षमता तो बची है, पर दिशा खो गई है। हिन्दू समाज का वैचारिक वर्ग आज पहले से कहीं अधिक सक्रिय है, परंतु उतना ही दिशाहीन भी। सोशल मीडिया पर हर दिन कोई नया “समस्या विमर्श” सामने आता है — कोई इस्लाम की विस्तारवादी प्रवृत्ति पर बोलता है, कोई ईसाई मिशनरियों की षड्यंत्रकारी नीति पर, कोई वामपंथ के झूठे इतिहास-वाचन पर, और अब तो नवबौद्ध आंदोलन की विभाजनकारी सोच पर भी चर्चा होने लगी है।

लेकिन दुखद यह है कि इन सब चर्चाओं में समस्या तो खूब गिनाई जाती है, समाधान शायद ही कभी सामने आता है।
ऐसा लगता है जैसे हमने “आलोचना” को ही “बौद्धिकता” मान लिया हो।
यह प्रवृत्ति खतरनाक है — क्योंकि समाज की गति केवल विचारों से नहीं, समाधान से चलती है।



हिन्दू — केवल मत नहीं, एक जीवन-दृष्टि 

हिन्दू होना कोई जन्म से प्राप्त उपाधि नहीं है, यह एक जीवन-दृष्टि है — आत्मा, ब्रह्म, कर्म-सिद्धान्त और पुनर्जन्म के शाश्वत सत्य में विश्वास करने का भाव है।
वह व्यक्ति जो इन सिद्धान्तों को स्वीकार करता है, वह हिन्दू है — चाहे वह भारतभूमि में जन्मा हो या पृथ्वी के किसी भी कोने में रहता हो।
हिन्दू शब्द किसी भूगोल की सीमा में नहीं बंधा; यह एक चेतना है, एक अनुभूति है — जो जीवन को केवल भौतिक नहीं, बल्कि आध्यात्मिक यात्रा के रूप में देखती है।


विविधता में एकत्व — सनातन दृष्टि की आत्मा 


इस व्यापक परिभाषा में बौद्ध, जैन, और यहाँ तक कि चार्वाक जैसी नास्तिक परंपराएँ भी सम्मिलित हैं, क्योंकि हिन्दू दर्शन का आधार अस्वीकार नहीं, स्वीकृति है।
यह ऐसी संस्कृति है जो प्रश्न पूछने को पाप नहीं मानती, बल्कि उसे ज्ञान की पहली सीढ़ी मानती है।
हिन्दू दर्शन विविधता में विरोध नहीं, सामंजस्य देखता है — यही इसकी अद्वितीयता है।

मनुस्मृति में धर्म के दस लक्षण बताए गए हैं —

> “धृतिः क्षमा दमोऽस्तेयं शौचमिन्द्रियनिग्रहः।
धीर्विद्या सत्यमार्जवं दशकं धर्मलक्षणम्॥”

अर्थात् — धैर्य, क्षमा, आत्मसंयम, चोरी न करना, शुचिता, इन्द्रिय-निग्रह, बुद्धि, विद्या, सत्य और सरलता — ये दस धर्म के लक्षण हैं।
जो इन गुणों को अपने आचरण में धारण करता है, वही वास्तव में धर्मात्मा है, वही सच्चे अर्थों में हिन्दू है।

हिन्दू वह है जो पृथ्वी को माता मानता है, नदियों में मातृत्व देखता है, अग्नि में देवत्व और प्रत्येक जीव में आत्मभाव का अनुभव करता है।
जो दया, करुणा और सत्य के मार्ग पर चलता है, जो संसार को प्रतिस्पर्धा नहीं, परिवार के रूप में देखता है — वही हिन्दू है।
हिन्दू होना केवल किसी मत का अनुयायी होना नहीं, बल्कि “नर से नारायण” बनने की साधना है; यह ‘शिवोऽहम्’ के आत्मबोध की यात्रा है, जहाँ मनुष्य अपने भीतर के दिव्य तत्व को पहचानता है।

हिन्दू होना आर्यत्व का पुनर्जागरण है — उस संस्कृति की पुनः स्मृति जो कहती है, “आ नो भद्राः क्रतवो यन्तु विश्वतः” — अर्थात् सभी दिशाओं से शुभ विचार हमारे पास आएँ।
यही हिन्दू का आत्मस्वरूप है — समावेश, करुणा, सत्य और आत्मज्ञान का जीवंत प्रतीक।

अब्राह्मिक दृष्टि बनाम वैदिक दृष्टि 

हिन्दू समाज ने सृष्टि के हर रूप में उसी एक परम चेतना का दर्शन किया है — चाहे वह अग्नि हो या वायु, सूर्य हो या चन्द्रमा, जल हो या पृथ्वी। प्रत्येक तत्व में उसी एक सत्ता की छवि झलकती है। इसीलिए हमारे यहाँ देवताओं की बहुलता है, पर यह बहुदेववाद नहीं है; यह अनेक रूपों में एक ही सत्य की अनुभूति है। ऋग्वेद में कहा गया है —

> “एकं सत् विप्रा बहुधा वदन्ति” — सत्य एक ही है, पर ज्ञानी उसे अनेक नामों से पुकारते हैं।

यही भाव हमारी आराधना की विविधता का मूल है। कुलदेवता की पूजा से लेकर 33 कोटि देवताओं के वंदन तक — हर उपासना उसी एक ब्रह्म की स्वीकृति है। कोई देवता वायु का प्रतीक है, कोई अग्नि का, कोई पृथ्वी का; सब उसी परम चेतना के भिन्न-भिन्न रूप हैं। विष्णु, शिव और ब्रह्मा — त्रिदेव के रूप में वही एक शक्ति सृष्टि, पालन और संहार का संचालन करती है। वही शक्ति नव रूपों में नवदुर्गा बनकर जीवन के हर आयाम में हमें दर्शन देती है।
यह विविधता किसी मतभेद की नहीं, बल्कि एक ही ब्रह्म की अनंत अभिव्यक्तियों की स्वीकृति है। यही हिन्दू दृष्टि की आत्मा है — यहाँ न बहुदेववाद है, न एकेश्वरवाद; यहाँ तो एकत्व में अनेकत्व और अनेकत्व में एकत्व का अद्भुत अनुभव है।

अब्राह्मिक दृष्टि कहती है — “There is one God, and all else is false.”
पर वैदिक दृष्टि कहती है — “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” — यह सम्पूर्ण जगत ही ब्रह्म है।
वहाँ ईश्वर सृष्टि से बाहर है, यहाँ ब्रह्म स्वयं सृष्टि में व्याप्त है। इसी कारण हिन्दू धर्म में विरोध और अस्वीकार तक को स्थान मिला — क्योंकि अस्वीकार भी उसी चेतना की अभिव्यक्ति है। चार्वाक जैसा भौतिकवादी दर्शन भी यहाँ नकारा नहीं गया, बल्कि ज्ञान की एक वैकल्पिक शाखा माना गया।

आज की सबसे बड़ी भूल यह है कि हम हिन्दू धर्म को अब्राह्मिक चश्मे से देखने लगे हैं — जैसे कि धर्म केवल पूजा-पद्धति या किसी आस्था-केन्द्रित संस्था का नाम हो। जबकि हिन्दू धर्म पूजा से पहले जीवन का विज्ञान है, सृष्टि की समझ है, अस्तित्व का अनुभव है। यह किसी ईश्वर में विश्वास करने का आदेश नहीं देता, बल्कि यह कहता है — “तत्त्वमसि” — तू वही है।

जब हम कहते हैं कि हिन्दू अनेक देवताओं को मानता है, तो उसका अर्थ यह नहीं कि हम अनेक ईश्वरों में बँटे हैं; बल्कि यह कि हम उस एक ही परम सत्य को हर रूप में पहचानने की क्षमता रखते हैं। यही सहिष्णुता, यही विविधता और यही आध्यात्मिक स्वतंत्रता हिन्दू धर्म की आत्मा है।

यह दृष्टि आज के युग में मानवता के संघर्षों का वास्तविक समाधान प्रस्तुत करती है। इस्लाम और क्रिश्चियनिटी जहाँ अस्वीकार और वर्चस्व की धारणाओं पर आधारित हैं, वहीं सनातन धर्म स्वीकार और समन्वय का मार्ग दिखाता है।
जो धर्म जोड़ता है, वही सच्चा धर्म है — और हिन्दू धर्म उसी जोड़ने की, समाहित करने की, और एकत्व में विश्व देखने की परंपरा का नाम है।

आज हिन्दू समाज को उसी आत्मबोध की आवश्यकता है। उसे समझना होगा कि उसका धर्म भय या आदेश से नहीं चलता, बल्कि आत्मानुभूति से चलता है। हिन्दू होना किसी मत को मानना नहीं, बल्कि सत्य की अनंत संभावनाओं को स्वीकार करना है। वही “एकोऽहम् बहुस्याम्” की चेतना — जहाँ एक से सब और सबमें वही एक — हिन्दू जीवनदर्शन का शाश्वत आधार है।

वैदिक परंपरा की सह-अस्तित्वशीलता


इस्लाम और क्रिश्चियनिटी दरअसल धर्म नहीं, बल्कि मत हैं — ऐसे मत जो एक किताब, एक पैगंबर और एक खुदा पर टिके हैं। वहाँ सत्य को एक ही रास्ते से देखने की अनुमति है, बाकी सब गलत ठहराया जाता है। लेकिन हमारे यहाँ का मार्ग वैसा नहीं है। हमारा धर्म सनातन है, वैदिक है, क्योंकि वह किसी एक समय या व्यक्ति से नहीं शुरू हुआ, वह तो अस्तित्व के साथ स्वयं जन्मा है।

भगवान हमारे लिए कोई अदृश्य सत्ता नहीं हैं, जो केवल किसी पुस्तक या पैगंबर के ज़रिए बोले हों। हमारे भगवान स्वयं बोलते हैं, स्वयं सिखाते हैं — गीता में श्रीकृष्ण ने कहा, “अहं सर्वस्य प्रभवो, मत्तः सर्वं प्रवर्तते” — मैं ही सबका मूल हूँ, सब कुछ मुझसे ही चलता है। यह वाक्य किसी आस्था की घोषणा नहीं, बल्कि एक दार्शनिक सत्य है — कि वही एक है, और उसी से सब कुछ प्रकट हुआ है।
वह एक है, पर उसके अनेक रूप हैं — अनेक बन नहीं जाता, बल्कि अपने भीतर अनेकता को समेटे हुए वही एक बना रहता है। यही सनातन का मर्म है — एकोऽहम् बहुस्याम्, मैं एक हूँ, पर अनेक रूपों में प्रकट होता हूँ।

हमारे यहाँ कुलदेवता हों या त्रिदेव, नवदुर्गा हों या तैंतीस कोटि देवता — सब उसी एक परम तत्व के रूप हैं। यह विविधता कोई भ्रम नहीं, बल्कि हमारी चेतना का विस्तार है। पश्चिम की या आब्राहमिक दृष्टि इस गहराई को नहीं समझ पाती, क्योंकि वहाँ एक किताब, एक पैगंबर और एक खुदा का दायरा है — जहाँ प्रश्न करना अपराध है, और भिन्न मत रखने वाला “काफ़िर” या “पापी” ठहराया जाता है। इसीलिए वहाँ जब किसी ने पैगंबर या जीसस पर प्रश्न उठाया, तो उसके बदले में सिर कलम करने की बातें होने लगीं।

पर हमारे यहाँ तो ऋषियों ने देवताओं तक से प्रश्न किए। यहाँ चार्वाक जैसे भौतिकवादी भी स्थान पाते हैं, जिन्होंने वेदों तक की आलोचना की, फिर भी उन्हें “ऋषि” कहा गया। यहाँ तक कि देवताओं के गुरु बृहस्पति ने भी भौतिक दर्शन लिखा — पर उन्हें बहिष्कृत नहीं किया गया। क्योंकि यह भूमि मानती है कि सत्य एक है, पर उसे देखने के मार्ग अनेक हैं। यही सह-अस्तित्व का भाव है, जो वैदिक और श्रमण परंपरा की आत्मा है।

और यही अंतर इस्लाम, क्रिश्चियनिटी और सनातन धर्म के बीच की सबसे बड़ी रेखा खींचता है। वे “एक जीवन और एक जजमेंट डे” जैसे मिथकों में जीते हैं, जबकि हमारे यहाँ आत्मा, पुनर्जन्म, और कर्म के सिद्धांत की स्पष्ट, तर्कपूर्ण और अनुभूतिपरक व्याख्या है। हमारे यहाँ जीवन केवल एक अवसर नहीं, बल्कि निरंतर चलने वाली यात्रा है — जहाँ कर्म, आत्मा और ब्रह्म तीनों मिलकर अस्तित्व का रहस्य खोलते हैं।


आधुनिक दिग्भ्रम — कल्चरल मार्क्सवाद और अब्राह्मिक प्रभाव 


स्वतंत्र भारत का इतिहास देखें तो एक बात साफ़ दिखती है — विभाजन की राजनीति अब्राह्मिक आक्रांताओं के साथ शुरू हुई थी, पर आज उसी प्रवृत्ति का रूप एससी-एसटी-ओबीसी तुष्टिकरण बन चुका है।
पहले मुस्लिम तुष्टिकरण के नाम पर देश के बहुसंख्यक समाज की उपेक्षा की गई, और अब हिन्दू समाज को भीतर से बाँटने के लिए “समाजिक न्याय” के नाम पर नई खाइयाँ बनाई जा रही हैं।

यह तुष्टिकरण केवल राजनीतिक चाल नहीं है, यह एक वैचारिक हथियार है — जिससे हिन्दू समाज को स्थायी रूप से टुकड़ों में बाँटा जा सके।
हर जाति, हर वर्ग को “पीड़ित” बताकर उनमें असंतोष बोया जा रहा है, और यह विमर्श धीरे-धीरे हिन्दू समाज की एकता को भीतर से खोखला कर रहा है।



सत्य यह है कि हमारी परंपरागत वर्णाश्रम व्यवस्था किसी शोषण की रचना नहीं थी।
वह गुण, कर्म और स्वभाव पर आधारित एक जीवंत सामाजिक अनुशासन था — जहाँ समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने धर्म और क्षमता के अनुसार समाज के कल्याण में योगदान देता था।
मनुस्मृति कहती है — “चातुर्वर्ण्यं मया सृष्टं गुणकर्मविभागशः।”
अर्थात् समाज का वर्गीकरण जन्म से नहीं, गुण और कर्म से होता है।

किंतु औपनिवेशिक काल में अंग्रेजों ने अपनी सत्ता की मजबूती के लिए जाति को स्थायी पहचान बना दिया। उन्होंने भारतीय समाज को कमजोर करने के लिए जाति को जन्माधारित बंधन के रूप में प्रस्तुत किया।
फिर उसी विकृत व्याख्या को वामपंथी इतिहासकारों और तथाकथित समाज सुधारकों ने अपना हथियार बना लिया।
नतीजा — आज हिन्दू समाज अपने ही इतिहास से शर्मिंदा किया जा रहा है, और पीढ़ियों को यह सिखाया जा रहा है कि वे किसी “ब्राह्मणवादी शोषण” के शिकार हैं।


इस झूठ के उत्तर में केवल भावनाएँ नहीं, सत्य और साहस चाहिए।
हमें गाँव-गाँव जाकर बताना होगा कि शूद्र केवल सेवक नहीं था — वह समाज की आधारशिला था।
कृषक, शिल्पकार, व्यापारिक वर्ग — ये सब समाज के चलाने वाले थे।
वर्ण व्यवस्था ने किसी को नीचा नहीं ठहराया, बल्कि प्रत्येक व्यक्ति को कर्तव्य का मार्ग दिया।
यही कारण था कि जिस समय वर्णाश्रम व्यवस्था सुचारु थी, भारत दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था था — 17वीं सदी तक विश्व अर्थव्यवस्था में भारत का योगदान 24 प्रतिशत था।
जब यह व्यवस्था टूटी, तब बेरोजगारी, नैतिक पतन और अराजकता बढ़ी।




आज जो “नवबौद्ध आंदोलन” के नाम पर चल रहा है, वह बुद्ध के करुणा और प्रज्ञा के सन्देश से अधिक, हिन्दू समाज के प्रति घृणा फैलाने का साधन बन चुका है।
इसी प्रकार वामपंथी विचारधारा, जो यूरोप में असफल हो चुकी है, भारत में “सामाजिक न्याय” और “समानता” के नाम पर पुनर्जीवित की जा रही है।
दोनों ही विचारधाराएँ हिन्दू समाज की जड़ों को काटने में लगी हैं — एक धर्म के नाम पर, दूसरी तर्क के नाम पर।

इन सबका प्रतिकार केवल क्रोध से नहीं होगा।
हमें अपने शास्त्रार्थ की परंपरा को पुनर्जीवित करना होगा — वैचारिक और बौद्धिक संवाद के माध्यम से।
हिन्दू दर्शन की ताकत इसकी व्यापकता और तर्कसंगतता में है।
जब तक हम उनके झूठ का उत्तर अपने सनातन तर्क से नहीं देंगे, तब तक यह वैचारिक संघर्ष चलता रहेगा।



हमें यह समझना होगा कि किसी की लकीर छोटी करके हम बड़े नहीं बनते।
हमें अपनी लकीर बड़ी करनी होगी — अपने वैदिक, सांस्कृतिक और सामाजिक आदर्शों को पुनः स्थापित करके।
हमारा उत्तर किसी के प्रति घृणा नहीं, बल्कि धर्म आधारित संगठन होना चाहिए।
धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — ये चार पुरुषार्थ हमें यह सिखाते हैं कि जीवन केवल भोग या विरोध का नाम नहीं, बल्कि संतुलन का नाम है।
यही संतुलन समाज में स्थिरता और समरसता लाता है।



अब्राह्मिक मत क्रिश्चियनिटी एक क्रिश्चियनिटी के पापो प्रक्षालन के लिए क्रिश्चियनिटी सॉफ्ट रूप वामपंथ हर वर्ष “विश्व आदिवासी दिवस” मनाती हैं, जो दरअसल मूर्तिपूजक संस्कृतियों के विनाश की याद है।
हमें इस दिन को अपनी दृष्टि से देखना चाहिए — अपने लोक, कुल और ग्राम देवताओं की पुनर्स्मृति का दिन बनाना चाहिए।
यह केवल उत्सव नहीं, बल्कि आत्मचेतना का पुनर्जागरण होगा।
जिस दिन हिन्दू समाज अपनी जड़ों से संवाद करना सीख जाएगा, उसी दिन वह बाहरी विचारधाराओं के बंधन से मुक्त हो जाएगा।


हिन्दू बौद्धिक वर्ग की कमजोरी — समस्या बिना समाधान 

वर्तमान में हिन्दू समाज की सबसे बड़ी चुनौती है — अपनी परंपरा को वैज्ञानिक और तर्कसंगत रूप में पुनर्परिभाषित करने की क्षमता खो देना। एक ओर इस्लाम और ईसाईयत अपने प्रचारतंत्र, मदरसों और चर्चों के माध्यम से संगठित रूप में कार्य कर रहे हैं, वहीं हिन्दू समाज जातीय, राजनीतिक और भाषाई विभाजनों में उलझा हुआ है। वामपंथी विश्वविद्यालयों ने हिन्दू अस्मिता को ‘ब्राह्मणवाद’, ‘पितृसत्ता’ और ‘हिन्दू राष्ट्रवाद’ जैसे शब्दों में विकृत कर प्रस्तुत किया है। कल्चरल मार्क्सवाद ने हिन्दू परिवार, विवाह, संस्कार और धर्म पर संदेह का वातावरण बनाया है। यहाँ तक कि नवबौद्ध आंदोलन, जो भारतीय चिंतन की ही शाखा है, आज हिन्दू-विरोधी विमर्श का औजार बन चुका है। यह स्थिति केवल बाहरी आक्रमण का परिणाम नहीं, बल्कि आत्मविस्मृति की परिणति है।

वैदिक दृष्टिकोण से समाधान — आत्मबोध की ओर वापसी

हमें अपने समाधान अब्राह्मिक तर्कशास्त्र या मार्क्सवादी भौतिकवाद से नहीं, बल्कि वैदिक युक्ति और उपनिषदों की अंतर्दृष्टि से खोजने होंगे। जब तक हिन्दू समाज यह नहीं समझेगा कि उसका मूल ‘एकत्व’ में है, तब तक वह विभाजन के दलदल से नहीं निकल सकेगा। परिवार, शिक्षा और आस्था — इन तीन स्तंभों पर पुनर्निर्माण आवश्यक है। हिन्दू समाज को अपने बालकों को केवल स्कूलों में नहीं, संस्कार-केंद्रों में शिक्षित करना होगा जहाँ उन्हें यह सिखाया जाए कि जीवन का उद्देश्य केवल सफलता नहीं, बल्कि साधना है। हिन्दू परिवारों को पुनः संस्कार, कृतज्ञता और संयम की भावना से जोड़ना होगा। राजनीति या संगठन का कोई भी प्रयास तभी सफल होगा जब उसके पीछे यह वैदिक दृष्टि जीवित रहेगी।

आत्मजागरण ही सनातन समाधान


हिन्दू समाज के लिए वास्तविक समाधान किसी बाहरी संघर्ष में नहीं, बल्कि अपने भीतर की चेतना को जागृत करने में है। जब हम पुनः यह अनुभव करेंगे कि “अहम् ब्रह्मास्मि”, “सर्वं खल्विदं ब्रह्म”, और “वसुधैव कुटुम्बकम्” केवल मंत्र नहीं, बल्कि जीवन की नीतियाँ हैं — तब हमारा समाज आत्मविश्वास से खड़ा होगा। तब न इस्लाम का विस्तार भय पैदा करेगा, न वामपंथ का प्रपंच, न पश्चिमी भोगवाद की चकाचौंध।


वैदिक चेतना का पुनर्जागरण 

समस्याओं का विश्लेषण बहुत हो चुका। अब समय है कि हम सृजनात्मक प्रतिकार की ओर बढ़ें।
सत्य बोलने का साहस, समाज के भीतर जाकर संवाद करने की तैयारी, और आने वाली पीढ़ियों को सत्य इतिहास बताने की ज़िम्मेदारी — यही हमारे पुनरुत्थान का मार्ग है।
यह संघर्ष एक दिन या एक दशक का नहीं है।
हमें तैयार रहना होगा — दो-तीन पीढ़ियाँ लगेंगी, लेकिन यह कार्य करना ही होगा।

जब हम अपने धर्म, अपने सत्य और अपने कर्तव्य के साथ खड़े होंगे, तभी हिन्दू समाज फिर से वही होगा जो वह कभी था — संगठित, आत्मविश्वासी और तेजस्वी।


Deepak Kumar Dwivedi 

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