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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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🖋️दीपक कुमार द्विवेदी
हिंदू की परिभाषा पर विचार करते समय अक्सर प्रश्न उठते हैं। कई विचारकों ने इसे भौगोलिक सीमाओं के आधार पर निर्धारित किया। उनके अनुसार सिंधु नदी से लेकर हिंदुकुश पर्वत शृंखला और वर्तमान दक्षिणी सीमा तक रहने वाले लोग ही हिन्दू हैं, अर्थात् भारतीय उपमहाद्वीप में निवास करने वाले। इसके बाहर रहने वालों को अहिन्दु माना गया।
लेकिन जब हम यह मानते हैं कि सारे प्राणी अपने आप में एकसमान नहीं हैं, तब हमारे ऋषियों ने उद्घोष किया—“नेकृण्वन्तो विश्वमार्यम्”, अर्थात् अपने जीवन में श्रेष्ठता और धर्म का पालन करने वाले सभी विश्व के लोग आदरणीय हैं। ऐसे में हम उन्हें कैसे अहिन्दु कह सकते हैं?
वास्तविकता यह है कि भारत में रहने वाले बहुत से लोग अधर्म और पैशाचिक कृत्यों में लिप्त हैं। वे मनु स्मृति में उल्लिखित धर्म के दस लक्षणों—करुणा, दया, नैतिक मूल्य, उत्तरदायित्व, कर्तव्य-बोध आदि—का पालन नहीं करते। वहीं, अमेरिका या अन्य देशों में रहने वाला कोई व्यक्ति, जो जन्मतः क्रिश्चियन है, लेकिन उसके अंदर धर्म के ये लक्षण मौजूद हैं, धर्म का पालन करता है और सनातन हिन्दू धर्म की गहन समझ प्राप्त करने का प्रयास करता है, तो क्या उसे हम अहिन्दु कहेंगे? वह ब्रह्म, आत्मा, पुनर्जन्म और कर्म-सिद्धांत में विश्वास रखता है। इसे क्या अहिन्दु कहा जा सकता है?
दूसरी ओर, भारत में रहने वाले म्लेच्छ, असुर, दानव और दैत्य जैसे व्यवहार करने वाला व्यक्ति क्या वास्तव में हिन्दू हो सकता है? यहां धर्म और अधर्म के बीच स्पष्ट रेखा है। धर्म के पक्ष में खड़ा होने वाला, ईश्वर के साथ खड़ा होता है। धर्म की संस्थापना और रक्षा के लिए ईश्वर बार-बार अवतार लेते हैं और सज्जन शक्ति की रक्षा करते हैं। धर्म, ईश्वर से भी श्रेष्ठ है।
इसलिए वर्तमान समय में हमें सर्वव्यापक हिन्दू परिभाषा की आवश्यकता है। यह स्पष्ट हो कि हिन्दू कौन है, धर्म क्या है, अधर्म क्या है, देव कौन हैं और असुर, दानव, दैत्य कौन हैं। असुर कुल के जन्म से भी देवत्व को प्राप्त किया जा सकता है। इसी प्रश्न के समाधान के लिए हिन्दू की सर्वव्यापक परिभाषा आवश्यक है। साथ ही धर्म और अधर्म की भी स्पष्ट परिभाषा होनी चाहिए।
आधुनिक काल में आब्राहमिक, पैशाचिक मत—इस्लाम, क्रिश्चियनिटी, यहूदी धर्म, और वामपंथ, जो क्रिश्चियनिटी के पापों को प्रक्षालित करते हैं—ये धर्म नहीं, बल्कि अधर्म हैं। न ये कोई पंथ हैं, न कोई संप्रदाय। ये असुरी, पैशाचिक मत हैं। यदि हम इन्हें धर्म के रूप में मानते रहेंगे, तो फर्जी धर्मनिरपेक्षता के नाम पर बार-बार अपने जैसे मानने की भूल करेंगे। यही कारण है कि पिछले हजार वर्षों से वैचारिक और मानसिक युद्ध में हमें लगातार पराजय का सामना करना पड़ा है, और आगे भी पड़ेगा।
इस संदर्भ में हिंदू और धर्म की परिभाषा को स्पष्ट करना अनिवार्य है, ताकि समाज में वास्तविकता की समझ स्थापित हो और अधर्म के विरुद्ध सतत वैचारिक सजगता बनी रहे।
धर्म का स्वरूप और उसका महत्व
वेदों में स्पष्ट लिखा है—“धर्म चर”, अर्थात् धर्म का पालन करो; “धर्मेण मुखमासीत”, धर्म से सुख प्राप्त होता है; और “धर्मान्न प्रमदितव्यम्”, अर्थात् धर्म में प्रमाद या असावधानी नहीं करनी चाहिए।
अब प्रश्न उठता है—वह धर्म कौन सा है जिससे सुख की प्राप्ति होती है। इसे समझने के लिए सबसे पहले ‘धर्म’ शब्द के वास्तविक अर्थ की ओर ध्यान देना आवश्यक है।
संस्कृत व्याकरणानुसार ‘धर्म’ शब्द धृञ् (धारण करना) धातु से उत्पन्न हुआ है और ‘मन्’ प्रत्यय से बनता है। इसका व्युत्पत्ति अर्थ तीन प्रकार से समझा जा सकता है—
1. ध्रियते लोकः अनेन इति धर्मः — जिससे लोक धारण होता है, वही धर्म है।
2. धरति धारयति वा लोकम् इति धर्मः — जो लोक को धारण करे, वही धर्म है।
3. ध्रियते यः स धर्मः — जो दूसरों द्वारा धारण किया जाए, वही धर्म है।
महाभारत में भी धर्म का यही लक्षण बताया गया है—
“धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः। यत् स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः।”
अर्थात् जो धारणा से लोक और प्रजा को स्थिर बनाए, वही धर्म है।
इससे स्पष्ट होता है कि ‘धर्म’ अत्यंत व्यापक और बहुआयामी शब्द है। अमरकोष के अनुसार धर्म के अनेकार्थ हैं—सुकृत या पुण्य, वैदिक विधि, यमराज, न्याय, स्वभाव, आचार, सोमरस आदि। अन्य कोषों में इसे कर्मफल, श्रौत एवं स्मार्त धर्म, गुण या कर्मजन्य अदृष्ट, आत्मा, सदाचार, वस्त्र का गुण, उपमा, याग, अहिंसा, न्याय, उपनिषद, धन, दान आदि के रूप में भी वर्णित किया गया है।
लेकिन मूलतः ‘धर्म’ का अर्थ धारण करना ही है। निरुक्त में इसे ‘नियम’ कहा गया है। इन दोनों अर्थों का संगम यह बताता है कि जिस नियम ने इस लोक और संसार को धारण कर रखा है, वही धर्म है।
धर्म से सुख की प्राप्ति होती है—वेदों में यह स्पष्ट कहा गया है। और लोक में भी कहा जाता है—“धनाद्धर्म ततः सुखम्।” अर्थात् धन से धर्म और धर्म से सुख। यह सुख दो प्रकार का है—इस लोक का सुख और परलोक का सुख। जिसे पाने से दोनों प्रकार के सुख की प्राप्ति हो, वही धर्म है।
वैशेषिक दर्शन के प्रवर्तक महर्षि कणाद ने भी धर्म का यही लक्षण स्पष्ट किया है—
“यतोऽभ्युदयनिः श्रेयससिद्धिः स धर्मः।”
अर्थात् जिससे इस लोक में उन्नति और परलोक में कल्याण या मोक्ष की प्राप्ति होती हो, वही धर्म है।
धर्म का मूल वेद है। मनु स्मृति में कहा गया है—“वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।” अर्थात् ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद ही धर्म के मूल स्रोत हैं। श्रीमद्भागवत में भी लिखा है—“ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः।” अर्थात् वेद में निर्दिष्ट धर्म का विपरीत ही अधर्म है।
धर्म का एक और लक्षण है—चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः।
अर्थात् वेद में जिसकी प्रेरणा दी गई है, वही धर्म है। इसमें निषिद्ध कर्म का त्याग और निर्देशित कर्म का पालन करना शामिल है।
जैसे-जैसे जीव अधिक सत्त्वगुणी कर्म करेगा, उसे चैतन्य और मुक्ति की ओर उन्नति प्राप्त होगी; और जितना अधिक तमोगुण और अज्ञान से प्रभावित होगा, उतना ही वह जड़ता की ओर खिंचता जाएगा। इसी प्रकार सभी कर्मों को कसौटी पर कसकर धर्म और अधर्म का निर्णय किया जा सकता है।
भगवान स्वयं ही धर्मरूप हैं। भगवद्गीता में कहा गया है—
“धर्मोऽहं वृषरूपधृक्।”
अर्थात् तप, शौच, दया और सत्य के रूप वाले वृष के रूप में धर्म मैं स्वयं हूँ।
विष्णुसहस्त्रनाम में भी लिखा है—“धर्मगुब्धर्मकृद्धर्मी।”
अर्थात् धर्म की रक्षा करने वाले, धर्म की स्थापना करने वाले और समस्त धर्मों के आधार स्वयं भगवान हैं।
शास्त्रों में कहा गया है—“धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः।”
अर्थात् धर्म का परित्याग करने से व्यक्ति नष्ट होता है, और उसका पालन करने से व्यक्ति सुरक्षित रहता है।
भगवान ने धर्म रूप नियम की स्थापना की, स्वयं उसका पालन किया और दूसरों से भी करवाया। भगवद्गीता में कहा गया—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥ परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।”
अर्थात् जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेकर आता हूँ। साधुओं की रक्षा, दुष्टों का नाश और धर्म की पुनः स्थापना के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।
ईश्वर द्वारा रचित नियमों में न कभी अंतर आया, न आता है और न कभी आएगा। यही ईश्वर की अद्भुत लीला है, जिसे केवल ईश्वर की कृपा से ही समझा जा सकता है।
हिंदू की सर्वव्यापक पहचान
हिंदू होना किसी भौगोलिक सीमा, जन्मस्थान या जाति पर आधारित नहीं है। यह किसी निश्चित देश या प्रदेश तक सीमित नहीं हो सकता। वीर सावरकर जी ने कहा था—“जब तुम अपने आप को मुस्लिम कहते हो, तब मैं अपने को हिन्दू कहता हूं वैसे मैं विश्व मानव हूँ। हिंदू केवल एक जाति का नाम नहीं, यह श्रेष्ठ मनुष्य बनने की यात्रा का प्रतीक है।”
सच्चा हिंदू वह है जो नर से नारायण बनने का प्रयास करता है। साधारण मनुष्य अपने भीतर दैवी तत्व को पहचानता है और उसे प्रकट करता है; वही शिवोहम—“अहम शिवः”—का अनुभव करता है। हिंदू होना केवल संस्कार, पूजा या कर्मकांड का पालन नहीं, बल्कि अपने भीतर की श्रेष्ठता, विवेक, करुणा और नैतिकता को जीवन में उतारना है।
हिंदू वह है जो अपने जीवन को धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चार पुरुषार्थों के आधार पर व्यवस्थित करता है। वह चाहे ज्ञानमार्गी हो, कर्ममार्गी या भक्तिमार्गी, उसका प्रत्येक कर्म धर्म के अनुरूप होना चाहिए। धर्म केवल पूजा या अनुष्ठान नहीं है; यह कर्तव्य, सत्य, करुणा, संयम और न्याय का पालन है।
सच्चा हिंदू वह है जो संपूर्ण जीव-जगत, वृक्ष, पृथ्वी और प्रकृति के प्रति करुणाशील होता है। वह किसी भी प्रकार की भेद-दृष्टि, हिंसा, लोभ या छल से परे रहता है। वह प्रकृति के त्रिगुणात्मक स्वरूप—सत्व, रज और तम को समझता है और अपने कर्मों व स्वभाव के अनुसार जीवन को संतुलित करता है। वह सृष्टि के तीनों आयाम—आधिभौतिक, आधिदैविक और आध्यात्मिक—को जानता और उनका पालन करता है। यही कारण है कि वह वर्णाश्रम धर्म का सम्मान करता है और समाज एवं सृष्टि के संतुलन में अपनी भूमिका निभाता है।
हिंदू की पहचान धर्मपालन, नैतिकता, करुणा, ज्ञान और जीवन संतुलन से होती है। चाहे वह संसार के किसी भी कोने में क्यों न रहता हो, यदि उसके हृदय में ये गुण हैं, तो वह सच्चा हिंदू है। लेकिन जो व्यक्ति अधर्म के मार्ग पर चलता है, जो असत्य, हिंसा, लोभ और छल में रम जाता है, वह हिंदू नहीं है। ऐसे व्यक्ति को शास्त्रों में असुर या म्लेच्छ कहा गया है।
धर्म ही जीवन का आधार है। वेद कहते हैं—“धर्मेण मुखमासीत”, और मनु स्मृति में लिखा है—“वेदोऽखिलो धर्ममूलम्।” धर्म का पालन करने वाला ही सच्चा हिंदू है। भगवद्गीता में भगवान कहते हैं—
“यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत, अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे।”
अर्थात् जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म बढ़ता है, भगवान स्वयं अवतार लेकर धर्म की पुनः स्थापना करते हैं। यह स्पष्ट करता है कि धर्म केवल नियम नहीं, यह सृष्टि का संतुलन, मानव की श्रेष्ठता और जीवन का आधार है।
हिंदू वह है जो धर्म, करुणा, सत्य, विवेक और नैतिकता के मार्ग पर चलता है; जो प्रकृति, जीव-जगत और सृष्टि के संतुलन को समझता है; जो त्रिगुणात्मक और त्रैविद्यात्मिक सृष्टि का अनुसरण करता है; और जो नर से नारायण बनने की यात्रा में अग्रसर है। जन्म, वंश या निवास स्थान केवल बाहरी पहचान हैं; धर्म और दैवी गुणों का पालन ही सच्चा हिंदू बनाता है।
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