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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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By 🖋️ दीपक कुमार द्विवेदी
पुराणों के इतिहास को देखते समय हमें इतिहास सम्बन्धी भारतीय परिभाषा का भी ध्यान अवश्य रखना चाहिए। आज के युग में “इतिहास” का अर्थ प्रायः यह मान लिया गया है कि किसी व्यक्ति के जन्म-मरण की तिथि तथा घटनाओं को एक निश्चित उद्देश्य के अनुरूप प्रस्तुत कर देना। जो चरित्र उस निश्चित उद्देश्य के अनुकूल न हों, वे चाहे कितने ही महत्त्वपूर्ण क्यों न हों, उन्हें उपेक्षित कर दिया जाता है। भारत में अंग्रेज़ों ने जो इतिहास के पाठ्यग्रन्थ निर्धारित किए, वे उनके स्वार्थ और लाभ की दृष्टि से रचे गए थे। अब इतिहास को ‘नव’ दृष्टिकोण से लिखा जा रहा है; किन्तु भारतीय इतिहास की अपनी एक निश्चित परिभाषा है—
> “धर्मार्थकाममोक्षाणामुपदेशसमन्वितम्।
पूर्ववृत्तकथायुक्तमितिहासं प्रचक्षते॥” (महाभारत)
अर्थात्— “जो ग्रन्थ धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के उपदेशों सहित प्राचीन चरितों का वर्णन करता है, वही ‘इतिहास’ कहलाता है।”
विष्णुपुराण की टीका में श्रीधराचार्य ने भी यह श्लोक उद्धृत किया है—
> “आर्यादि बहुव्याख्यानं देवर्षिचरिताश्रयम्।
इतिहासमिति प्रोक्तं भविष्याद्भुतधर्मभुक्॥”
अर्थात्— “ऋषियों द्वारा कथित नाना उपदेशों, देवताओं और ऋषियों के चरित्रों तथा अद्भुत धर्म-कथाओं से युक्त ग्रन्थ को इतिहास कहा जाता है।”
इस परिभाषा के आलोक में यह स्मरण रखना आवश्यक है कि पुराणों का इतिहास केवल मर्त्यलोक का नहीं, अपितु देवलोक और मर्त्यलोक का सम्मिलित इतिहास है। देवलोक के सम्बन्ध में यहाँ विस्तार से विवेचन का स्थान नहीं है; तथापि इतना समझ लेना चाहिए कि जैसे आज आवागमन के साधनों के कारण किसी महत्त्वपूर्ण व्यक्ति या घटना का इतिहास एक देश तक सीमित नहीं रह सकता, उसी प्रकार सत्ययुग से द्वापर के अन्त तक मनुष्य का देवलोक से प्रत्यक्ष सम्बन्ध था। देवता पृथ्वी पर अवतरित होते थे और मनुष्य देवलोक की सशरीर यात्रा करते थे। फलतः उस समय के इतिहास में पृथ्वी और देवलोक का समन्वित वर्णन स्वाभाविक था।
जो लोग इस दिव्य सम्पर्क को न समझकर सम्पूर्ण इतिहास को केवल भौतिक धरातल पर घटित मानते हैं और देवताओं को भी मनुष्य अथवा राजा मानने का प्रयत्न करते हैं, वे घटनाओं का समाधान न पाकर उन्हें कल्पित कहने लगते हैं। आज का मनुष्य दुर्बल, हीन-वीर्य, हीन-शक्ति और हीन-संकल्प हो गया है, इसलिए वह देवलोक की स्थिति का विचार भी नहीं कर पाता। किन्तु भारतीय परम्परा में केवल पाँच सहस्र वर्ष पूर्व तक मनुष्य उस दिव्य लोक से प्रत्यक्ष सम्पर्क में था। पुराणों के इतिहास को इस दृष्टि से देखने पर ही उसका वास्तविक तात्पर्य समझ में आता है।
एक बात और ध्यान देने योग्य है— भारतीय पौराणिक इतिहास अथवा भूगोल में वर्णन समस्त विश्व का है, परन्तु घटनाओं का विस्तार मुख्यतः भारतवर्ष का ही है। अन्य देशों में भारतवासी गए, वहाँ के नरेशों के साथ युद्धों में सम्मिलित हुए— यह सब वर्णन मिलता है; किन्तु वंश-परम्परा और घटनाओं का सविस्तार वर्णन केवल भारतवर्ष से सम्बन्धित है। भूगोल के प्रसंग में भी वर्णन तो सम्पूर्ण ब्रह्माण्ड का है, पर विस्तृत विवेचन भारत का ही है। इसके दो कारण हैं— प्रथम, भारत से ही मानव-समाज और सभ्यता का प्रसार हुआ; अतः भारत के पूर्ण वर्णन से सम्पूर्ण विश्व का संकेत हो जाता है। द्वितीय, भारत ही पुण्यभूमि है। ऋषियों का उद्देश्य लौकिक विवरण देना नहीं, अपितु पुण्यभूमि, पुण्यतीर्थों और पुण्यपुरुषों का वर्णन करना था, और यह विशेषता केवल भारत में ही उपलब्ध थी।
इतिहास के सम्बन्ध में पुराणों की दीर्घकालीन तपस्या, दीर्घजीवन, दीर्घाकार आकृतियाँ और विशाल संख्याएँ लोगों को उलझन में डालती हैं। दीर्घायु के सम्बन्ध में विशेष विवाद नहीं होना चाहिए; क्योंकि मनुष्य की आयु क्रमशः घटती जा रही है। आज के समाचारपत्रों में भी नौ-दस वर्ष की बालिकाओं के मातृत्व के समाचार मिलते हैं; डेढ़-दो सौ वर्ष आयु के व्यक्ति भी विद्यमान हैं। जब सौ-डेढ़ सौ वर्षों में यह परिवर्तन सम्भव है, तब लाखों वर्ष पूर्व की स्थिति का श्रद्धापूर्वक अनुमान किया जा सकता है। किन्तु कुतर्की व्यक्ति तर्क में उलझा रहकर सत्य को नहीं मानता।
आकृति के सम्बन्ध में भी यही सत्य है। प्रत्येक देश में मनुष्य की कद-काठी क्रमशः लघु होती जा रही है। यूरोप में पुरातनकालीन मानव-कंकालों की खोपड़ियाँ वर्तमान मानव की अपेक्षा लगभग दोगुनी बड़ी पाई गई हैं। दिल्ली के निकट भी एक ऐसी खोपड़ी मिली थी, जिसके नेत्रछिद्रों से आज का मानव-मस्तक सहज ही निकल सकता था। अतः प्राचीन दीर्घाकृतियाँ हमारी सीमित बुद्धि से भले न समझ में आयें, पर वे बुद्धि के परे नहीं हैं; उनकी सत्यता का अनुमान युक्तिपूर्वक किया जा सकता है।
संख्या के विषय में आज यह धारणा कि मनुष्य-जनसंख्या पहले से बढ़ी है, पूर्णतः मिथ्या है। आज जिसे “पृथ्वी” कहा जाता है, वह केवल क्षार-समुद्र से घिरे हुए जम्बूद्वीप का शतांश मात्र भाग है। इसमें भी अफ्रीका के वन, सहारा और मध्य एशिया के मरुस्थल, तथा दक्षिणी ध्रुव प्रदेश— किसी समय उन्नत नगरों से परिपूर्ण थे। वहाँ सभ्यता के अवशेष प्राप्त हो रहे हैं। आज जिन जलराशियों को ‘महासागर’ कहा जाता है, जिन्होंने पृथ्वी का तीन-चतुर्थांश भाग जलमग्न कर दिया है, वे पहले थे ही नहीं। अब यह सिद्ध हो चुका है कि अफ्रीका, ऑस्ट्रेलिया, अमेरिका और यूरेशिया (यूरोप-एशिया) कभी एक ही भूखण्ड थे। इनके मध्य में कोई समुद्र नहीं था। इन सबके नीचे पर्वत-श्रेणियाँ और कहीं-कहीं नगरों के ध्वंसावशेष भी मिले हैं, जैसे जापान के दक्षिण-पूर्व में। ये जलमग्न पर्वत-श्रेणियाँ भूमिगत पर्वत-मालाओं से सम्बद्ध हैं। अतः जब यह सम्पूर्ण जम्बूद्वीप आज की पृथ्वी और समुद्र सहित जनपूर्ण था, तब मानव-संख्या अत्यन्त विशाल रही होगी।
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