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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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वेदों में लिखा है— “धर्मं चर” अर्थात् धर्म का आचरण करो; “धर्मेण सुखमासीत”— धर्म से ही सुख की प्राप्ति होती है; तथा “धर्मान्न प्रमदितव्यम्”— धर्म में प्रमाद या असावधानी कदापि नहीं करनी चाहिए।
अब विचारणीय प्रश्न यह है कि वह धर्म क्या है, जिससे सुख प्राप्त होता है। इस पर विचार करने के लिए सर्वप्रथम ‘धर्म’ शब्द के अर्थ पर ध्यान देना आवश्यक है।
‘धर्म’ शब्द व्याकरण की रीति से ‘धृञ् धारणे’ धातु में ‘मन्’ प्रत्यय लगाने से बनता है। इसकी व्युत्पत्ति तीन प्रकार से की जाती है—
१. ध्रियते लोकः अनेन इति धर्मः — जिससे लोक धारण किया जाता है, वही धर्म है।
२. धरति धारयति वा लोकम् इति धर्मः — जो लोक को धारण करता है, वही धर्म है।
३. ध्रियते यः स धर्मः — जो अन्य द्वारा धारण किया जाता है, वही धर्म है।
महाभारत में धर्म का लक्षण इस प्रकार कहा गया है—
“धारणाद्धर्ममित्याहुर्धर्मो धारयते प्रजाः।
यत् स्याद्धारणसंयुक्तं स धर्म इति निश्चयः॥” (कर्णपर्व ६९।५८)
अर्थात्— “धारण करने के कारण लोग इसे धर्म कहते हैं। धर्म प्रजा को धारण करता है। जो धारण के साथ संयुक्त हो, वही धर्म है—यह निश्चित है।”
इससे स्पष्ट होता है कि ‘धर्म’ अत्यन्त व्यापक शब्द है। अमरकोशकार के अनुसार ‘धर्म’ शब्द के अनेक अर्थ हैं, जैसे—
१. सुकृत अथवा पुण्य,
२. वैदिक विधि (यज्ञादि),
३. यमराज,
४. न्याय,
५. स्वभाव,
६. आचार,
७. सोमरस का पान करने वाला।
अन्य कोशों में धर्म के जो अर्थ मिलते हैं, वे हैं—
१. शास्त्रोक्त कर्मानुष्ठान से उत्पन्न होने वाले भावी फल का साधन रूप शुभ-अदृष्ट या पुण्यापुण्य रूप भाग्य,
२. श्रौत और स्मार्त धर्म,
३. विहित क्रिया से सिद्ध होने वाला गुण अथवा कर्मजन्य अदृष्ट,
४. आत्मा,
५. देह को धारण करने वाला जीवात्मा,
६. आचार या सदाचार,
७. वस्त्र का गुण,
८. स्वभाव,
९. उपमा,
१०. यज्ञ आदि,
११. अहिंसा,
१२. न्याय,
१३. उपनिषद्,
१४. धर्मराज अथवा यमराज,
१५. सोमाध्यायी,
१६. सत्संग,
१७. धनुष,
१८. ज्योतिषशास्त्र में लग्न से नवम स्थान (भाग्य-भवन),
१९. दान आदि।
किंतु ‘धर्म’ शब्द का धातुगत मूलार्थ तो “धारण करना” ही है। निरुक्त में ‘धर्म’ का अर्थ ‘नियम’ कहा गया है। इन दोनों को मिलाकर धर्म का वास्तविक अर्थ यही होता है कि जिस नियम ने इस लोक अथवा इस संसार को धारण कर रखा है, वही धर्म है।
आगे बताया जाएगा कि वह नियम कौन-सा है जिसने इस लोक अथवा संसार को धारण कर रखा है और किन नियमों के अनुसार आचरण करने से सुख की प्राप्ति होती है; क्योंकि वेद में स्पष्ट कहा गया है कि धर्म से सुख प्राप्त होता है। लोक में भी प्रचलित है— “धनाद्धर्मः ततः सुखम्”— अर्थात् धन से धर्म की साधना होती है और धर्म से सुख की प्राप्ति होती है।
यह सुख दो प्रकार का है— एक इस लोक का सुख और दूसरा परलोक का सुख। अतः जिससे इन दोनों प्रकार के सुखों की प्राप्ति हो, वही धर्म है।
सभी मनुष्य सुख की प्राप्ति के लिए ही प्रयत्नशील रहते हैं और उसका साधन धर्म है। इसीलिए वैशेषिक दर्शन के आचार्य पूज्यपाद महर्षि कणाद ने धर्म का यह लक्षण प्रतिपादित किया है—
“यतोऽभ्युदयनिःश्रेयससिद्धिः स धर्मः।”
अर्थात्— “जिससे इस लोक में उन्नति (अभ्युदय) और परलोक में कल्याण या मोक्ष की प्राप्ति हो, वही धर्म है।”
इस धर्म का मूल अथवा जड़ वेद है। मनु महाराज ने कहा है—
“वेदोऽखिलो धर्ममूलम्” (मनु० २।६)
“समस्त वेद अर्थात् ऋक्, यजुः, साम और अथर्ववेद धर्म का मूल हैं।”
श्रीमद्भागवत में भी स्पष्ट कथन है—
“वेदप्रणिहितो धर्मो ह्यधर्मस्तद्विपर्ययः” (भागवत ६।१।४४)
“वेद में जो प्रतिपादित है वही धर्म है और उसका विपरीत आचरण अधर्म है।”
दूसरा लक्षण इस प्रकार है—
“चोदनालक्षणोऽर्थो धर्मः।”
“वेद में जिसकी प्रेरणा की गयी है, वही धर्म है।”
अर्थात् वेदविहित कर्म करना धर्म है और वेदमना निषिद्ध कर्म का त्याग करना भी धर्म है।
धर्म का तृतीय लक्षण है—
“वेदविहितत्वम्।”
“जो वेद में विहित है, वही धर्म है।”
धर्म का चतुर्थ लक्षण इस प्रकार निरूपित है—
“क्रियासाध्यत्वे सति श्रेयस्करत्वमिति लौकिकाः।”
“क्रिया अथवा कर्म के द्वारा सिद्ध होकर जो श्रेयस्कर हो, वही धर्म है— यह लौकिक पुरुषों की धारणा है।”
धर्म का पाँचवाँ लक्षण है—
“सत्याज्जायते, दयया दानेन च वर्धते, क्षमायां तिष्ठति, क्रोधान्नश्यति।”
“धर्म की उत्पत्ति सत्य से होती है, दया और दान से वह पुष्ट होता है, क्षमा में निवास करता है और क्रोध से उसका नाश हो जाता है।”
मनुस्मृति में धर्म का षष्ठ लक्षण इस प्रकार कहा गया है—
“वेदः स्मृतिः सदाचारः स्वस्य च प्रियमात्मनः।
एतच्चतुर्विधं प्राहुः साक्षाद्धर्मस्य लक्षणम्॥”
अर्थात्— “वेद, स्मृति अथवा धर्मशास्त्र, सदाचार (सज्जनों का आचरण) और आत्मा की प्रसन्नता— ये चार धर्म के लक्षण कहे गये हैं।”
इसी भाव को और स्पष्ट करते हुए कहा गया है—
“श्रुतिस्मृतिभ्यामुदितं यत् स धर्मः प्रकीर्तितः।”
“श्रुति और स्मृति में जो प्रतिपादित है, वही धर्म है।”
“श्रुतिस्मृत्युदितं धर्ममनुतिष्ठन् हि मानवः।
इह कीर्तिमवाप्नोति प्रेत्य चानुत्तमं सुखम्॥” (मनु० २।९)
“श्रुति और स्मृति में वर्णित धर्म का पालन करने वाला मनुष्य इस लोक में यश और परलोक में उत्तम सुख अथवा मोक्ष प्राप्त करता है।”
फिर कहा गया है—
“आचारः प्रथमो धर्मः श्रुत्युक्तः स्मार्त एव च।
तस्मादस्मिन् सदा युक्तो नित्यं स्यादात्मवान् द्विजः॥” (मनु० १।१०८)
“श्रुति और स्मृति दोनों में वर्णित सदाचार ही परम धर्म है। अतः आत्मज्ञानी द्विज सदा सदाचार से युक्त रहे।”
धर्म का एक और स्वरूप इस प्रकार बताया गया है—
“एक एव सुहृद् धर्मो निधनेऽप्यनुयाति यः।
शरीरेण समं नाशं सर्वमन्यत्तु गच्छति॥”
“एक धर्म ही ऐसा मित्र है, जो मृत्यु के पश्चात भी जीवात्मा के साथ जाता है, अन्य सब कुछ तो शरीर के नाश के साथ ही नष्ट हो जाता है।”
वेद में धर्म के तीन स्कन्ध वर्णित हैं—
“प्रयो धर्मस्कन्धा यज्ञोऽध्ययनं दानमिति प्रथमः।
तपो द्वितीयः। ब्रह्माचार्याचार्यकुलवासी तृतीयः।
एते सर्वे पुण्यलोकाः भवन्ति।
ब्रह्मसः स्थोऽमृतत्वमेति॥” (छान्दोग्योपनिषद् २।२३।१)
अर्थात्— “धर्म के तीन स्कन्ध हैं। यज्ञ, स्वाध्याय और दान— यह प्रथम स्कन्ध है। तप दूसरा स्कन्ध है। आचार्यकुल में निवास करने वाला ब्रह्मचारी, जो अपने शरीर को आचार्यकुल में क्षीण करता है— यह तृतीय स्कन्ध है। ये सभी पुण्यलोक के भागी होते हैं और ब्रह्मनिष्ठ संन्यासी अमृतत्व को प्राप्त होता है।”
इसी ‘धर्म’ शब्द के पहले ‘स्व’ जोड़ने से ‘स्वधर्म’ शब्द बनता है, जिसका अर्थ है— “अपना वर्णाश्रम-धर्म”। इसी प्रकार, ‘पर’ जोड़ने से ‘परधर्म’ बनता है। इसका तात्पर्य है— अपने स्वधर्म को छोड़कर अन्य पुरुष के वर्णाश्रम-धर्म का पालन करना।
यदि ‘वि’ उपसर्ग लगाया जाए तो ‘विधर्म’ शब्द बनता है। इसका अर्थ है— “विगतः धर्मेण विधर्मः”, अर्थात् जो अपने धर्म से गिर जाए या जो धर्मान्तरित हो जाए, वह विधर्म कहलाता है। श्रुति-स्मृति में प्रतिपादित धर्मों को छोड़कर सभी अन्य धर्म विधर्म हैं। अतः अपने धर्म को छोड़कर अन्य धर्म को स्वीकार करनेवाला व्यक्ति ‘विधर्मी’ कहलाता है।
यदि ‘कु’ उपसर्ग लगाया जाए तो ‘कुधर्म’ शब्द बनता है। इसका अर्थ है— “कुत्सितः धर्मः”, अर्थात् जो धर्म निंदनीय हो, वह कुधर्म है। कुधर्म पापाचरण या बुरे आचरण से संबंधित है। इसके अतिरिक्त, कुधर्म का एक अर्थ यह भी है कि जो धर्म अन्य धर्मों में बाधा डालता है, वह भी कुधर्म कहलाता है। जैसे—
“धर्म यो बाधते धर्मो न स धर्मः कुधर्म तत्।
अविरोधी तु यो धर्मः स धर्मः सत्यविक्रमः॥”
“जो धर्म दूसरे धर्म को बाधित करता है, वह धर्म नहीं, किंतु कुधर्म है। जो धर्म समस्त धर्मों का अविरोधी है, वही यथार्थ धर्म है।”
धर्म के पहले ‘नञ्’ जोड़ने से ‘अधर्म’ शब्द बनता है। इसका अर्थ है— धर्म से बिलकुल विपरीत जो कार्य हो, वह अधर्म कहलाता है। अधर्म के पाँच भेद हैं—
१. विधर्म –
विधर्म वह है जो व्यक्ति अपने स्वधर्म से विचलित होकर करता है। अर्थात् जो कर्म अपने वर्ण, आश्रम और अवस्था के अनुसार निर्धारित धर्म से भिन्न हो, वह विधर्म कहलाता है। इसे ‘विगतः धर्मेण विधर्मः’ कहा गया है। यह वह स्थिति है जिसमें कोई व्यक्ति अपने धर्म को छोड़कर अन्य धर्म या अनिष्ट मार्ग की ओर प्रवृत्त होता है।
२. परधर्म –
परधर्म वह है जो व्यक्ति अपने स्वधर्म को त्यागकर किसी अन्य पुरुष के धर्म का अनुकरण करता है। अर्थात् अपने वर्णाश्रम और कर्मधर्म को छोड़कर अनुकूल या असंगत आचरण करना परधर्म है। शास्त्र कहते हैं— “स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः”, अर्थात् अपने धर्म में रहकर मरना श्रेष्ठ है, परधर्म का पालन भयकारी है।
३. धर्माभास –
धर्माभास वह है जब व्यक्ति अपने मन से किसी कृत्य को धर्म मानकर करता है, परन्तु वह वास्तव में धर्मसंगत नहीं है। यह दिखावे, स्वार्थ या गलत अनुमान से किया गया कर्म होता है। जैसे, किसी कर्म को केवल परलोक या लोकलाभ के लिए करना, जबकि उसका उद्देश्य सत्य और धर्मसंगत न हो, वह धर्माभास कहलाता है।
४. उपधर्म –
उपधर्म वह है जिसे पाखण्डाचार या ढोंग से किया जाता है। इसमें व्यक्ति केवल दिखावे या बहुसंख्यक अनुकरण के लिए धर्म का आचरण करता है। उदाहरणतः यज्ञ, दान या व्रत तो करता है, पर मन स्वार्थ, अहंकार या छल से प्रेरित हो। इसे शास्त्र में पाखण्डाचार कहा गया है।
५. छलधर्म –
छलधर्म वह है जिसमें व्यक्ति धर्म का आचरण करता दिखता है, परन्तु वह वास्तविकता में धर्म के विरोध में होता है। यह दूसरों को भ्रमित करने, धर्म का अनुचित लाभ उठाने या धार्मिक शब्दों का दुरुपयोग करने का स्वरूप है। जैसे, धर्म का नाम लेकर अनैतिक कार्य करना, झूठे वचन देना, और नैतिकता का उल्लंघन करना छलधर्म कहलाता है।
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विधर्म और परधर्म का अर्थ ऊपर स्पष्ट किया जा चुका है। पाखण्डाचार या दम्भ अर्थात् ढोंग को उपधर्म कहते हैं। अपने ही मन से किसी कृत्य को धर्म कहकर करना धर्माभास है। प्रचलित अर्थ को छोड़कर अन्य अर्थ करके जिस धर्म की व्याख्या की जाय, वह छलधर्म कहलाता है। उपर्युक्त छहों प्रकार के अधर्मी का परित्याग करना ही धर्म है। अपना स्वधर्म ही सभी के लिए शान्तिदायक होता है। भगवान ने कहा है—
“स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः।”
“स्वधर्म में मरना श्रेष्ठ है, परधर्म भयकारी है।”
समस्त प्राणियों के लिए वही परम धर्म है, जिससे भगवान में निष्काम, अटल और अचल भक्ति हो और जिसके पालन से आत्मा प्रसन्न हो। जैसा कहा गया है—
“धर्मेण हन्यते व्याधिर्धर्मेण हन्यते ग्रहः।
धर्मेण हन्यते शत्रुर्यतो धर्मस्ततो जयः॥”
“धर्म से रोग नष्ट होते हैं, धर्म से ग्रहों की पीड़ा मिटती है, धर्म से शत्रु नाश होते हैं; जहाँ धर्म होता है, वहाँ विजय होती है।”
अब विचार करने योग्य प्रश्न यह है कि धर्मरूप नियम क्या है जिसने इस सृष्टि-क्रिया को धारण किया है और किस अवस्था को धर्म तथा किस अवस्था को अधर्म कहा जाता है। यह अत्यंत गहन तथा सूक्ष्म विषय है।
सृष्टि के तीन गुण हैं— सत्त्व, रज और तम। ये तीनों गुण समस्त सृष्टि की वस्तुओं में विद्यमान हैं। रजोगुण से सृष्टि की उत्पत्ति होती है, सत्त्वगुण से स्थिति और तमोगुण से संहार या प्रलय होता है। यह समस्त जगत इन तीन अवस्थाओं के अधीन है। कोई भी पदार्थ या जीव इन तीन अवस्थाओं—उत्पत्ति, स्थिति और लय—से अछूता नहीं है।
ईश्वर के रचे हुए अनंत ब्रह्माण्ड हैं, जिनमें ब्रह्माजी से लेकर तृण, मिट्टी के कण और ग्रह समूह तक सभी इन तीन गुणों के अधीन हैं। जीव-प्रवाह भी इसी नियम के अधीन रहता है— जन्म लेता है, बढ़ता है और मरता है। इस अवस्था-भेद से जीव की सृष्टि, स्थिति और मुक्ति भी समझी जा सकती है।
जैसे— अहंकार या अहं-तत्त्व से मोहित होकर जीव कर्म-प्रवाह में बहता है। कालांतर में जब जीव अपने असली स्वरूप अर्थात् ब्रह्म को पहचान लेता है, वह माया-प्रवाह से मुक्त होकर मोक्ष प्राप्त करता है। ये तीन अवस्थाएँ—उत्पत्ति, स्थिति और मोक्ष—प्रत्येक जीव में घटित होती हैं।
अतः धर्म वही है जो इस क्रिया के स्वाभाविक नियम में बाधा न डाले और अधर्म वह है जो इस नियम में बाधा डाले। दूसरे शब्दों में— जीव क्रमशः अपने गुण-भेद के अनुसार उन्नत होता हुआ मुक्त होगा। इस क्रमोन्नति में जो कर्म सहायक हों, वे धर्म हैं; जो बाधा डालें, वे अधर्म हैं।
सनातन धर्मावलंबियों के प्रत्येक कर्म— खाने, पीने, सोने, जागने, उठने, बैठने, कहने, सुनने, पहनने, जाने, आने—के साथ धर्म और अधर्म का घनिष्ठ संबंध रखा गया है। जिस कर्म से तमोगुण और रजोगुण की निवृत्ति हो और सत्त्वगुण की वृद्धि हो, वही धर्मपदवाच्य कर्म होगा। जिस कर्म से सत्त्वगुण की हानि और रज तथा तमोगुण की वृद्धि हो, वह अधर्मपदवाच्य कर्म होगा।
सत्त्वगुण, रजोगुण और तमोगुण के लक्षण श्रीमद्भगवद्गीतामें इस प्रकार वर्णित हैं—
“सत्त्वं सुखे संजयति रजः कर्मणि भारत।
ज्ञानमावृत्य तु तमः प्रमादे संजयत्युत॥” (१४।९)
“हे भरतवंशिन्! सत्त्वगुण सुख में आसक्त करता है; रजोगुण कर्म में प्रवृत्त करता है; और तमोगुण ज्ञान को ढककर प्रमाद, आलस्य और निद्रा में लगाता है।”
उदाहरणार्थ— यदि कोई पुरुष दिन में सोता है, तो दिन में सोना धर्म होगा अथवा अधर्म? इसका निर्णय उसी से होना चाहिए कि इससे किस गुण की वृद्धि और किस गुण की हानि होगी। दिन में सोने से तमोगुण की वृद्धि होती है, जो अज्ञान, प्रमाद, आलस्य और जड़ता का कारण बनता है। अतः यह कर्म जीव की क्रमोन्नति में बाधक है। इसलिए दिन में सोना अधर्म कर्म कहलाएगा।
जो कर्म सत्त्वगुण की वृद्धि करता है, वह जीव को चैतन्य की प्राप्ति और मुक्ति की ओर ले जाता है। इसी प्रकार सभी कर्मों को इस कसौटी पर कसकर धर्म और अधर्म का निर्णय किया जा सकता है। यही धर्म का रहस्य है। इस धार्मिक नियम से सृष्टि का प्रवाह चलता है। भगवान स्वयं धर्मरूप हैं।
भगवान् ने कहा है—
“धर्मोऽहं वृषरूपधृक्।” (भागवत् ११।१७।११)
“तप, शौच, दया और सत्य नामक चार-पैर वाले वृष का रूप धारण करने वाला धर्म मैं स्वयं हूँ।”
विष्णु सहस्रनाम में लिखा है—
“धर्मगुर्द्धर्मकृधर्मी।”
“धर्म की रक्षा करनेवाले, धर्म को स्थापन करनेवाले और समस्त धर्मों का आधार स्वयं भगवान हैं।”
इसीलिए शास्त्र में कहा गया है—
“धर्म एव हतो हन्ति, धर्मो रक्षति रक्षितः।”
“धर्म का परित्याग करने पर वह पुरुष का नाश करता है और रक्षा किया हुआ धर्म उस पुरुष की रक्षा करता है।”
भगवान् स्वयं धर्म के प्रभु, रक्षक और पालनकर्ता हैं।
“आचारप्रभवो धर्मो धर्मस्य प्रभुरच्युतः।”
“धर्म आचार और सदाचार से उत्पन्न होता है। उस धर्म के प्रभु, रक्षक और पालनकर्ता भगवान् हैं। अतः धर्म सदा पालन योग्य है, हँसी या मजाक का विषय नहीं।”
शास्त्रों में लिखा है—
धर्ममूलं हि भगवान् सर्वदेवमयो हरिः।
अर्थात्, सर्वदेवमय भगवान् धर्म की जड़ और आधार हैं। भगवान् स्वयं धर्म हैं और धर्म के जानने वाले भी वही हैं। यथा शास्त्र में कहा गया है—
धर्मो धर्मविदुत्तमः।
अर्थात्— भगवान् धर्म के सर्वोत्तम ज्ञाता हैं। धर्म की रक्षा के लिए भगवान् स्वयं अवतार लेते हैं। भागवत में लिखा है—
धर्मावनायोरुकृतावतारः। (६/८/११)
अर्थात्— धर्म और अधर्म की रक्षा हेतु भगवान् अवतार धारण करते हैं।
भगवान् ने ही धर्मरूपी नियम की स्थापना की है। वे स्वयं उसका पालन करते हैं और दूसरों से भी पालन कराते हैं। जब-जब धर्म की हानि होती है और अधर्म फैलता है, तब-तब भगवान् अवतार लेकर प्रकट होते हैं। जैसा कि भगवद्गीता में कहा गया है—
यदा यदा हि धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत।
अभ्युत्थानमधर्मस्य तदाऽऽत्मानं सृजाम्यहम्॥
परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्।
धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे॥ (४/७–८)
अर्थात्— “जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब मैं अवतार लेकर प्रकट होता हूँ। साधुओं की रक्षा, दुष्टों का नाश और धर्म की पुनः स्थापना—इन तीनों कार्यों के लिए मैं प्रत्येक युग में प्रकट होता हूँ।”
ईश्वर द्वारा स्थापित नियमों में न तो कभी कोई अंतर आया है, न है और न कभी आएगा। यह सर्व ईश्वर की अद्भुत लीला है, जिसे केवल ईश्वर की कृपा और परमज्ञान से ही समझा जा सकता है।
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