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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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इनके व्लॉग देख–देख कर बच्चे अपने जीवन में संतोष प्रवृति खोते जा रहे हैं ।
एक समय मैंने नोट किया कि मेरी बेटी शिकायती लहजे में कुछ न कुछ डिमांड करती रहती है..........
पापा हम लोग कब आयु–पीहू के जैसे डिफेंडर गाड़ी लेंगे ?
पापा सौरभ जोशी का कितना बड़ा मकान बन रहा है ? आप इतना बड़ा मकान कब बनवाओगे ?
पापा वो व्लॉगर घूमने के लिए मॉरिशस गया है । हम कब जायेंगे ?
एक दिन मेरी बेटी पूछ रही थी कि पापा मेरा जन्मदिन मनाने आप कब दुबई ले जा रहे हैं हमें ?
मेरी तो हालत खराब हो जाती है ये सवालात सुनकर........ ऊपर से अलग–अलग फरमाइशें । हमें ऐपल का फोन चाहिए । हमें वीडियो गेम स्टेशन चाहिए । हमें आई पैड चाहिए । पापा ये चाहिए वो चाहिए ।
अगर मना करो तो पापा कंजूस है । पापा हमें प्यार नहीं करते । मुंह फूला लें सो अलग.........
अबे कौन हैं ये आयु–पीहू , सौरभ जोशी , ट्रिगर इंसान , लखन–नीतू , डिम्पल मलहान । क्या चरस बो दी हैं इन्होंने मेरे घर में ?
फिर मैने भी बच्चों के साथ इनके व्लॉग देखने शुरू किए कि आखिर होता क्या है इनके व्लॉग में ?
होता ये है.......... हेलो गाइज हम उठ गए हैं । हम वॉक पर जा रहे हैं । हम नाश्ता कर रहे हैं । हम डिनर कर रहे हैं । हम घूमने के लिए दुबई/बैंकॉक/ सिंगापुर/ मॉरिशस जा रहे हैं । हम यहां खा रहे हैं , हम ये पहन रहे हैं , हम ये खरीद रहे हैं..........
ऊपर से व्यूज देखें तो एक–एक व्लॉग पर– 50 लाख , 80 लाख , 1.5 करोड़ , 2 करोड़ या 3 करोड़ व्यूज । घूम–फिर कर के व्लॉग बना–बना कर ये तो खूब पैसा कमा रहे हैं आफत अपनी आ रक्खी है........... इनके दैनिक दिनचर्या वाले व्लॉग के दर्शक छोटे बच्चे हैं । वो भी बहुत बड़ी संख्या में । फिर अपने बच्चे इनके जैसे एलीट क्लास जीवन की कल्पना करने लगते हैं । दिक्कत तब आती है जब मिडल क्लास एलीट क्लास के सपने देखने लगता है.......
इनका खूब पैसा खर्च कर विदेशों में घूमना , मंहगे शॉपिंग मॉल्स से खरीददारी करना , फाइव स्टार होटलों में खाना मिडल क्लास के बच्चों को बहुत आकर्षित करता है.......... लेकिन छोटे बच्चे जो इतने समझदार भी नहीं है कि कम उम्र में अपनी क्षमताओं और हैसियत के हिसाब से जीना सीखें............. व्लॉगर्स की चकाचौंध भरी दुनिया से बच्चों की दुनिया प्रभावित हो रही हैं । बच्चों में स्वयं के और अपने माता–पिता के प्रति हीन भावना पनप रही है ।
इन व्लागर्स के जैसी हाई–फाई जिंदगी नहीं लेकिन इतनी बुरी भी नहीं है...... पर बच्चे क्या समझें ? बच्चों की कल्पना का संसार बहुत अलग है । बचपन में मैं राज कॉमिक्स काफी पढ़ता था । सोचता था एक दिन बढ़ा होकर मैं भी डोगा बनूंगा । अपराधियों को मारूंगा । कानून तोड़कर कानून की रक्षा करुंगा । जब थोड़ा बड़े हुए तो समझा कि हम जो सोच रहे थे वो अखंड क्यूतियापा था । ये तो सिर्फ एक कॉमिक्स है । असल जिंदगी तो इससे बहुत अलग है...........
इनके व्लॉग देख–देखकर एक दिन मैंने खुद से कहा– ओ भाई ये तो भारी गड़बड़ चल रही है । हमें तो बचपन में जैसा मिला , जितना मिला उससे संतुष्ट थे लेकिन यहां तो बच्चों का बचपन छीना जा रहा है ।
उसी दिन से घर में इन भूतिए ब्लागर्स के व्लॉग देखने बंद करवाए । बच्चों को सिखाना शुरू किया कि हमें ईश्वर ने जो दिया है जितना दिया है उसमें खुश रहना चाहिए । आपके पास जितना है उतना आपके बाप के पास उसके बचपन में भी नहीं था............. इसलिए जो मिला है उसे भगवान का धन्यवाद देते हुए स्वीकार करना चाहिए ।
तब से अपने बच्चों को इन झंडू व्लॉगर्स के वीडियो दिखाना बंद कर दिया है........... यू ट्यूब पर देश–धर्म से संबंधित , नॉलेज से भरपूर , ज्ञान–विज्ञान से सम्बंधित बहुत से चैनल हैं उन्हें दिखाता हूं । अब आराम है ।
ये तो मेरे साथ हुआ । अब सवाल ये है कि मेरे जैसे कितने परिवार होंगे जहां ये व्लागर्स बच्चों के मासूम बचपन को तहस–नहस किए हुए होंगे............??
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