सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

रामायण में आदर्श राजा का स्वरूप : वाल्मीकि, नारद, हनुमान और अयोध्यावासियों की दृष्टि


वाल्मीकिके अनुसार आदर्श राजा गुणवान, पराक्रमी, धर्मज्ञ, उपकार माननेवाला, सत्यवक्ता, दृ‌प्रतिज्ञ, सदाचारी, समस्त प्राणियोंका हितसाधक, विद्वान्, सामर्थ्यशाली, प्रियदर्शन, मनपर अधिकार रखनेवाला, क्रोधको जीतनेवाला, कान्तिमान, अनिन्दक और संग्राममें अजेय योद्धा होता है।

नारदद्वारा वर्णित आदर्श राजाके लक्षण शारीरिक, मानसिक और नैतिक विशेषताओंमें विभाजित किये जा सकते हैं। शारीरिक दृष्टिसे आदर्श राजाका व्यक्तित्व आकर्षक एवं प्रभावोत्पादक होता है। उसके कंधे मोटे, भुजाएँ बड़ी-बड़ी, ग्रीवा शंखके समान, ठोढ़ी भरी हुई, छाती चौड़ी, गलेके नीचेकी हड्डी मांससे छिपी हुई, भुजाएँ घुटनोंतक लम्बी, मस्तक सुन्दर, ललाट भव्य, चाल मनोहर, शरीर मध्यम और सुडौल, देहका रंग चिकना, वक्षःस्थल भरा हुआ और आँखें बड़ी होती हैं। मानसिक दृष्टिसे वह बुद्धिमान्, नीतिज्ञ, वक्ता, ज्ञानी, वेद-वेदांगके तत्त्वको जाननेवाला, धनुर्वेदमें प्रवीण, धर्मका ज्ञाता, अखिल शास्त्रोंका मर्मज्ञ, स्मरणशक्तिसे युक्त तथा प्रतिभा सम्पन्न होता है। नैतिक दृष्टिसे वह धैर्यवान्, जितेन्द्रिय, सत्यप्रतिज्ञ, पवित्र, यशस्वी, श्रीसम्पन्न, अच्छे विचार और उदार हृदयवाला होता है।

हनुमान्के अनुसार, आदर्श राजा पूर्णचन्द्रके समान मनोहर मुखवाला; पद्मपत्रके समान विशाल नेत्रोंसे युक्त; रूप और औदार्यसे सम्पन्न; तेज, क्षमा, बुद्धि और यशसे युक्तः सदाचार, धर्म और चातुर्वर्ण्यका रक्षक; परम प्रकाशस्वरूप; राजनीतिमें पूर्ण शिक्षित; ब्राह्मणोंका उपासक; ज्ञानी, शीलवान्, विनम्र, वेद वेदांगका परिनिष्ठित विद्वान् और सामुद्रिक शास्त्रके अनुसार शुभ अंग प्रत्यंगोंसे युक्त होता है।

अयोध्याकी जनताके अनुसार आदर्श राजा वीर्यवान्, स्थिरप्रज्ञ, विद्वान्, सभी विद्याओं और वेद वेदांगोंको भलीभाँति जाननेवाला, मधुरभाषी, सज्जन, ईर्ष्या, असया और मात्सर्यसे दूर, वृद्धों और ब्राह्मणोंका प्रतिपूजक, सदैव शान्त, कृतज्ञ, सदाचारी, शीलसम्पन्न, मार्दव और कोमलतासे युक्त, क्षमावान्, प्रजाप्रिय, दूसरोंके अन्तर्गत विचारोंको तुरंत ताड़नेवाला, दयालु, आलस्य और अभिमानसे शून्य, धर्म, अर्थ और कामका ज्ञाता, गम्भीर मन्त्रको गुप्त रखनेवाला, भाषा-ज्ञानमें निपुण, संगीत वाद्य और चित्रकारीका विशेषज्ञ, शत्रुपर आक्रमण और प्रहार करनेमें कुशल, सेना संचालनमें निपुण, दोषदृष्टिसे रहित, अमित तेजस्वी, रूपवान्, पराक्रमी, बाहर और भीतरसे शुद्ध, युक्तियाँ देनेमें बृहस्पतिके समान, नीरोग, तरुण, असाधारण वक्ता, सुन्दर विग्रहसे सुशोभित, देश-कालके तत्त्वको समझनेवाला और दीनतासे रहित होता है। रामायणके अनुसार उपर्युक्त सभी लक्षण श्रीराममें घटित होते थे।

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