सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

क्या धर्मतंत्र जनमानस का मार्गदर्शन करने में सक्षम है ?

*धर्मेंण जयति राष्ट्रम-11*

(क्या धर्मतंत्र जनमानस का मार्गदर्शन करने में सक्षम है ?)

   -डॉ नितिन सहारिया ,महाकौशल

                  युगऋषि ,वेदमूर्ति, युगद्रष्टा , योगी- तपस्वी, नवयुग के सृजनकार पं. श्रीराम शर्मा आचार्य जी धर्मतंत्र की महत्ता का प्रतिपादन करते हुए लिखते हैं कि - 
             " *मनुष्य को सिरजनहार की सर्वोत्कृष्ट कृति माना गया है। प्राणी जगत में इस नाते उसे एक विशेष स्थान प्राप्त है। यह सब विशेषता उन विभूतियों के कारण है, जो अन्यान्य जीवधारियों के पास नहीं है।* वरिष्ठता का पद, जो मनुष्य को प्राप्त है वह शारीरिक समर्थता ,मानसिक बुद्धिमत्ता, कौशल अथवा आर्थिक संपन्नता के कारण नहीं अपितु उस उत्कृष्टता के कारण है, जिसे सुसंस्कारिता के नाम से जाना जाता है । मानवीय कर्तव्यों, दायित्वों के साथ जुड़ी यही विशिष्टता उसे व्यक्तिक जीवन में नीतिनिष्ठ एवं सामाजिक जीवन में समाजनिष्ठ बनाती है। इसे ही मानवीय गरिमा के अनुरूप जीवन जीना कहा जाता है। यों तो मनुष्य अपने कार्य क्षेत्र में स्वतंत्र ,स्वच्छंद दिखाई देता है, किंतु वह उच्चस्तरीय मर्यादाओं में बंधा हुआ है। यह अनुशासन ही उसे मनुष्य जैसा उच्चस्तरीय गरिमापद प्रदान करता है। संभवत: यही सब सोचकर *ऐतरेय उपनिषदकार* ने कहा है की " *मनुष्य विश्व शक्ति की एक सुकृति है।"* 

ताभ्य: पुरुषमानयत्ता अब्रुवन सुकृतं ।
बतेति पुरुषो व सुकृतम् ।।

               आप्त वचनों के आधार पर तो जन्म से सभी असंस्कृत, असभ्य अथवा शूद्र होते हैं, किंतु शरीर यात्रा के साथ संस्कारों का समावेश होते-होते वे क्रमशः ब्राम्हणत्व को ,श्रेष्ठता को प्राप्त होते चले जाते हैं। वातावरण भी इसमें मदद करता है तथा *धर्म- अध्यात्म के माध्यम से बनाया गया वह अद्भुत तंत्र भी जो जीवन यात्रा के महत्वपूर्ण मोड़ो पर संस्कारों को समाविष्ट करने की व्यवस्था करता है। जब-जब भी यह व्यवस्था गड़बड़ाती है, इसमें कोई अवरोध पैदा होता है, अनगढ़ मानवों की संख्या समाज में बढ़ने लगती है एवं इस कुसंस्कारी समुदाय के बाहुल्य के कारण नैतिक मूल्यों का हास होते-होते आस्था संकट की विपति आ खड़ी होती है। आज की परिस्थितियों की समीक्षा इन्हीं तथ्यों के संदर्भ में की जानी चाहिए।* 
                   मानवी कायाधारी इस संसार में करोड़ों- अरबो हैं। असंख्यो जन्म लेकर मृत्यु को प्राप्त हो चुके तथा असंख्यो अगले दिनों जन्म लेने की प्रतीक्षा में है । जो आने वाले हैं या जो अभी हैं, यदि उनमें मानवोचित उत्कृष्टता का समावेश न हो सका तो इतना ही समझना चाहिए की धरती के लिए संकट बनने की अतिरिक्त बे और कुछ कर न सकेंगे। यह इस धरती का दुर्भाग्य ही है की अपेक्षाकृत अधिक साधन- संपन्न होते हुए भी मनुष्य को अनगढ़ ,असभ्य बने रह निकृष्टता का कलंक लाद कर जीना पड़े। *असभ्य, अशिष्ट, दुगुर्णी , दुर्व्यसनी ,अनाचारी स्तर के मनुष्य अपने लिए और दूसरों के लिए विपत्तियों के ही कारण बनते हैं। वे बदनाम भी होते हैं तथा सहयोग, सम्मान से भी वंचित बने रहते हैं* अनगढ़,कुसंस्कारी प्रवृत्तियों के कारण उन्हें नर- वानर की यदि युक्ति भी देनी पड़ी तो वह सही है,डार्विन के विकासवाद के आधार पर न सही, भारतीय अध्यात्म प्रकृति में साम्य के कारण नर तन धारी जीवों की एक श्रेणी यह भी ठहराती है। एक दूसरा तबका नर पशुओं का वह है, जिन्हें कर्तव्यों का ज्ञान नहीं, मानवीय गरिमा के अनुरूप जीना, अनुशासित स्थिति में रह पाना, जिन्हें राज नहीं आता। भारतीय संस्कृति के अनुसार एक तीसरी श्रेणी और इन्हीं जीव धारीयों की है, जो और भी निकृष्ट है। भाव संवेदनाओं की दृष्टि से जो शून्य है,जिन्हें भ्रष्टचिंतन व दुष्ट आचरण में ही रस आता है, वैसा ही कुछ घिनौना जो करते कराते रहते हैं । इन्हें नरपिशाचों का दर्जा दिया गया है। *प्रश्न यह है कि इन सभी जीवधारियों जिन्हें मनुष्य तन व मस्तिष्क प्राप्त है, के रहते हुए यह सृष्टि श्रेष्ठ बने तो कैसे? यदि इन सबके व्यक्तित्व के स्तर को ऊंचा उठाने के प्रयास न किए जाएं तो यह धरती देखते-देखते अगणित ,अनगढ नर पशुओं के हजूम में बदलती चली जाएगी* ,जहां जन्म लेना संभवत: तब देवता भी स्वीकार न करें।
                     *कारण इन सबका एक ही समझ में आता है। वह है व्यक्तित्व के स्तर को उत्कृष्ट बनाने के लिए जरूरी प्रयासों की उपेक्षा।* वस्तुत: मनुष्य असामान्य है व उसकी गरिमा सुसंस्कृति के साथ जुड़ी हुई है। *कहां से उपलब्ध हो यह सुसंस्कारिता ?* *मनीषियों के अनुसार इसे दूरदर्शिता, विवेकशीलता के आधार पर उपलब्ध किया जाता है।* यह विभूति स्व- उपार्जित भी हो सकती है तथा दूसरों के द्वारा अनुदान में भी दी जा सकती है। जो भी हो, प्रयास अपना हो अथवा समर्थ के अवलंबन से मिला हो, *मानव जीवन की सार्थकता और सराहना सुस्कारिता की बड़ी- चढ़ी उपलब्धि के सहारे ही हस्तगत होती है।* किंतु जैसा कि प्रारंभ में कहा गया ,हर *मनुष्य को मर्यादाओं के अनुबंधों के निर्वाह में जन्म-जन्मातरों की संचित कुसंस्कारिता से जूझना पड़ता है।* वह आलस्य- प्रमाद के, संकीर्ण -स्वार्थपरता , लिप्सा -लालसा के रूप में भी पुरानी आदतों को इस समय भी कार्यान्वित रखे रहना चाहती है। इसलिए लोभ, मोह ,क्रोध, अहंकार के रूप में वे कुसंस्कार उभरते रहते हैं। इन्हे दबाया- दबोचा न जाए ,तो वह अभ्यास -आदतें शहज छुट्ती नहीं । विचारों को विचारों से काटना पड़ता है। मन को समझाना पड़ता है कि *कुसंस्कारों को अपनाये रहना शरीर में क्षय - कैंसर जैसी घातक व्याधियों के रोगाणुओं को प्रविष्ट कराने के समान हैं। कुसंस्कारों के रहते कोई, व्यक्तित्व के वास्तविक वैभव का धनी नहीं बन सकता।* 
                   *कुसंस्कारों से मुक्ति एवं सुसंस्कारिता के उपार्जन हेतु, मनुष्य रूपी भटके हुए देवता के भटकावों को निरस्त करने हेतु ,एक राजमार्ग देव -संस्कृति के निर्धारकों ,मनीषयों, ऋषिगणों द्वारा निर्धारित किया गया है । वह है धर्मतंत्र के माध्यम से लोक शिक्षण का मार्ग ।* भाषा ,व्यवहार, आहार, रहन-सहन, रीति -रिवाज आचार, गुण- कर्म आदि स्वभावत: बच्चे बड़ों से सीखते हैं। ठीक इसी प्रकार चिंतन, चरित्र, रुचि ,रुझान पर आधारित व्यक्तित्व भी, किन्ही वरिष्ठों के तत्वाधान में उपलब्ध करना पड़ता है। यह वरिष्ठ मार्गदर्शन तंत्र जब-जब जिस भी समज में सुयोग्य स्तर का होता है, वह समाज देवमानवों से भरा प्रगति के पथ पर बढ़ रहा होता है। *इस मार्गदर्शन तंत्र को ऋषि व मुनि संभालते हैं। तथा इसे धर्मतंत्र नाम से संबोधित कर वरिष्ठतम स्थान समाज में दिया जाता है। हर युग में, हर समाज में, हर समय इस तंत्र की एक ही महत्वपूर्ण भूमिका रही है- वह है लोकमानस का परिष्कार, लोकशिक्षण, परिष्कृत स्तर का मार्गदर्शन। चेतना के क्षेत्र में सुसंस्कारिता का संवर्धन ही धर्मतंत्र का युगों -युगों से कार्य क्षेत्र रहा है । व इसी कारण समाज में सतयुगी प्रेरणाओं का बाहुल्य तब तक पाया जाता रहा, जब धर्मतंत्र ने अपनी भूमिका सही ढंग से निभाई।* 
                *धर्मतंत्र के अंतर्गत स्वाध्याय- सत्संग व्यवस्था के अतिरिक्त समर्थ, सुसंस्कृत सज्जन व्यक्ति ढ़ालने वाला, वातावरण बनाने का सुव्यवस्थित तंत्र आता है ।* उच्च स्तरीय वातावरण बनाने हेतु प्राचीनकाल में बालकों के लिए गुरुकुल, तरुणों के लिए तीर्थ तथा प्रोढो के लिए आरण्यक विनिर्मित किए जाते थे । देवालय, आश्रम,धर्म - संस्थान, साधु -ब्राह्मण, वानप्रस्थ- परिब्राजक आदि विभिन्न माध्यम प्रतिको से लेकर आचरण के द्वारा समाज को सुसंस्कारी बनाने के लिए निरंतर प्रयत्नशील रहते थे। सुसंस्कारों के प्रतिस्ठापन और अभिवर्धन के लिए मनोविज्ञान के प्रचंड विद्वान ऋषिगणों ने प्रतिकों के साथ-साथ षोडस संस्कारों की भी अभिनव व्यवस्था की थी। प्रचलन में आई यह प्रक्रिया प्रयोग- परीक्षणों की कसौटी पर खरी उतरी तथा उसे जीवन की आवश्यक कृतियों में महत्वपूर्ण स्थान मिला। इस प्रकार *धर्मतंत्र की एक सशक्त भूमिका देव संस्कृति में लोक- शिक्षण द्वारा समाज के नवनिर्माण की रही है व इसके प्रवक्ताओं ने इसे सुचारु रूप से निभाया है।*
                 *शासन तंत्र और धर्मतंत्र की तुलना करने पर प्रतीत होता है कि शासन का प्रभाव मात्र भौतिक क्षेत्र पर है ,जबकि धर्म व्यक्तित्व के गहन क्षेत्र में प्रवेश करके ,भाव श्रद्धा, प्रखर- प्रज्ञा और आदर्श कर्मनिष्ठा को उभर कर मनुष्य में देवत्व का उदय करता है।* आस्था में समायी भ्रष्टता- दुष्टता पर शासकीय नियंत्रण नगण्य जितना ही हो पाता है। राजतंत्र में श्रद्धा जगाने तथा संयमी ,उदार जीवन की प्रेरणा देने वाले दूर-दूर तक कहीं नजर नहीं आते ,जबकि धर्म इन्हीं दैवी संपदाओं से लबालब भरा हुआ है। आज धर्म के नाम पर जो चल रहा है क्रिया- कृतियों को मात्र ढकोसला और पंडा वर्ग का स्वार्थ साधन भर मानकर प्रतिगामी स्वरूप प्रस्तुत किया जा रहा है। उसकी भरपूर भर्त्सना करते हुए यह भी समझाया जाना जरूरी है कि *धर्म का वास्तविक स्वरूप क्या है? वस्तुत है वह समाज को धारण करने वाला, उसे मर्यादाओं से बांधने वाला एक सर्वांगपूर्ण तंत्र है । चिंतन और चरित्र में उत्कृष्टता भर देने और समाज को सत्परंपराएं अपनाने हेतु वाध्य करने वाला एक प्रचंड अनुशासन है।* ऐसा अनुशासन जिसके समक्ष ना अनीति ठहरती है न उद्दंड आतताई उच्छ्ंखलता । शासन के बिना भी समाज चल सकता है किंतु धर्म -कर्तव्य को छोड़ बैठने वाले जन समुदाय द्वारा अपनाई गई अराजकता- अनैतिकता को काबू में रखना धर्मांधता जो विवेक से परेय है, जिस पर नियंत्रण करना कठोर से कठोर शासन तंत्र के लिए भी संभव नहीं है। *देव संस्कृति की सबसे बड़ी सेवा और सबसे महान स्थापना धर्मतंत्र ही है।* *यदि वह प्रखर- परिष्कृत हो, लोकमानस का नेतृत्व कर सके -मार्गदर्शन कर सके तो निश्चित ही समाज में सत्प्रवृतियों का बहुल्य होगा।*                        
                  स्वामी विवेकानंद ने दरिद्र नारायण की व्याख्या कर उसे ऊंचा उठाने की बात धर्मतंत्र के ही मंच से कही थी। *धर्मतंत्र के आधार पर जगी आस्थाओं ने राष्ट्रीय पुनर्जागरण की एक प्रचंड लहर पैदा की, जिसकी परिणीति स्वतंत्रता के रूप में हुई।* *आज यदि सांस्कृतिक आजादी इस देश को मिलनी है व उसके माध्यम से सारे विश्व का नेतृत्व होना है तो वह भी सशक्त , परिस्कृत ,जागृत धर्मतंत्र से ही संभव हो सकेगा* । *वास्तविक धर्मतंत्र- अध्यात्म एक नगद धर्म की तरह है, जो बुद्ध, दयानंद, विवेकानंद की तरह वातावरण को बदलता है और ऐसे कार्यों की योजना बनाता है, जिसके साथ लोकमंगल जुडा हो,आत्म कल्याण का पुण्य भी जिससे सिद्ध हो तथा जनकल्याण का परमार्थ भी।*
                           *सद्ज्ञान और सत्कर्म की दर्शनिकता हृदयंगम कर जब लाखों व्यक्ति जागृत धर्मतंत्र के द्वारा समाज में छाई अवांछनीयताओं, अनैतिकताओं मूढ़ मान्यताओं व कुप्रचलनों के विरुद्ध संघर्ष हेतु आगे आने लगे, आत्म निर्माण -परिवार निर्माण की एक सशक्त प्रक्रिया जन्म लेने लगे तो सहज ही सतयुग की वापसी का स्वप्न साकार सा होता दिखाई पड़ने लगता है।* 
                     *रुग्ण समाज का कायाकल्प तथा राष्ट्र का पुनर्निर्माण जागृत धर्मतंत्र द्वारा ही संभव है।*

          *युग निर्माण योजना - अखिल विश्व गायत्री परिवार के कर्तव्यों के माध्यम से इसके सूत्र -संचालकों ने यह पिछले दिनों आंशिक रूप से संपन्न कर दिखाया है व अगले दिनों इसकी पूर्णता की आशा जगाई है, तो यह एक आश्चर्य नहीं तो और क्या है ? "* 
     क्रमशः ........

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