सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

बख्शाली पांडुलिपि



शून्य की कहानी केवल गणित की कहानी नहीं है बल्कि यह भारत की सांस्कृतिक यात्रा की कहानी है। दर्शन और साहित्य में शून्य का सौंदर्य देखते ही बनता है। तीसरी चौथी शताब्दी में सुबंधु द्वारा रचित वासवदत्ता में शून्य बिंदु का अलंकरण देखिए,

विधाता विश्व की गणना करते हैं। उनके पास चाँदरूपी सुधाखण्ड है। अंधकाररूपी स्याही से काला आकाशरूपी मृगचर्म है। गणना करते हुए विधाता को लगता है कि संसार शून्य है। इसमें कुछ नहीं रखा। तब वे सुधाखण्ड की मदद से मृगचर्म पर तारों के रूप में शून्यबिन्दु बना देते हैं। वही तारे उस कालविशेष में प्रकाशित हो रहे थे।

आर्यभट्ट से पहले शून्य गणना करने का एक महत्वपूर्ण सूत्र के रूप में प्रयोग किया जाता था। बख्शाली पाण्डुलिपि जो बर्च की छाल पर लिखा गया वह महावत्पूर्ण ग्रन्थ है जिसने वामपंथियों और टॉक्सिक नव बौद्धों के झूठ को खारिज करते हुए न केवल गणित बल्कि संस्कृत और शारदा लिपि की चमक से धूल हटाता है। 

बख्शाली पांडुलिपि शारदा लिपि में और गाथा बोली जो प्राकृत संस्कृत में लिखी गई है। ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय ने इस पांडुलिपि को प्राप्त किया है और रेडियोकार्बन डेटिंग से पता चला है कि इसके अंश ईस्वी सन् 224 ईस्वी के हैं। 

यह वह गणितीय ग्रंथ है, जो आर्यभट्ट से पहले अंकगणित, बीजगणित और ज्यामिति के उच्चकोटि अध्ययन को लिपिबद्ध करता है। इसमें शून्य के प्रतीक का लिखित भारतीय उपयोग किया गया है, यह भारत में दशमलव प्रणाली और जटिल समीकरणों के हल के विकास को दर्शाता है। बख्शाली पांडुलिपि प्राचीन भारत में विज्ञान और गणित के बारे में जानकारी का एक महत्वपूर्ण स्रोत है।

वर्तमान समय में यह पांडुलिपि ऑक्सफोर्ड विश्वविद्यालय के बोडलियन पुस्तकालय में रखी हुई है। 

मैं बार बार कहता हूं कि भारत का अर्थ निरंतर प्रकाशवान होना है। भारत वह सूर्य है जिसके प्रकाश से अन्य देश प्रकाशित हुए।

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