सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

कुआर आने को है



बादल अब आकाश से उतर कर तालों में आ गए हैं, कुछ दिन यहीं रहेंगे फिर धरती के अंदर शीतनिद्रा में चले जाएंगे। भादों का आखिरी पाख फूलों को लेकर आता है, देवी के आगमन से पहले प्रकृति पंखुड़ियों को रंगने में जुट जाती है। यह रंगावट समृद्धता का द्योतक है। इन फूलों की गंध वैसे है जैसे त्रिवेणी में सरस्वती, इनकी महक से आपकी थाली महकती है, इनकी महक से आप पोषित होते हैं।

छज्जे पर लौकी की बेलों के सफेद फूल, लदे फंदे तुरई और कुम्हड़े के हरित पीत पुष्प बरसात में भीग कर स्फीत और चमकदार हो जाते हैं, दीवार के किनारे गुड़हल, दरवाजे पर खिली लाल, नारंगी, पीली, श्वेत, नीली गंगा दूब, पगडंडी के किनारे किनारे सिवान भर मिलते कांस के रुपहले धागों वाले फूल मन मोहते हैं। कांस के रंग बिरंगे बल्ले से सिकाहुल और मौनी बनाती मां की उंगलियों में फूल छप जाते हैं।

खेतों में खड़े ज्वार, बाजरा की लहराती जुंडियां, सनई,तिलहन और पटसन के रंगीन फूल, धान के डंठलों से निकलते कोमल पंख धरती पर रंगीन चादर बिछा देते हैं। बाग के पत्ते बंदनवार के लिए तैयार हैं।

धुला हुआ नीला आकाश, ताल में खिले कुमुदुनी के फूल, किनारे किनारे गिरे मोरपंख, पानी में खड़े बैजंती के फूल, उनका जायजा लेती तितलियां कैनवास के किसी पेंटिंग सरीखे दिख रहे। जल के अंदर क्रीड़ा करते नन्हे नन्हे पाटलों के सहारे तैरते, बुलबुले छोड़ते शैवाल को देखकर लगता जैसे कोई नन्हा शिशु नींद में हंस देता हो।

मिट्टी नम है, नए पौधे अपने फोहे जैसी जड़ों से धरती मां को वैसे ही पकड़ लिए हैं जैसे बालक अपनी मां की उंगलियों को अपनी नन्ही उंगलियों से पकड़ लेता है।

सुबह की लालिमा सांझ होते होते सिंदूरी हो जाती है। चांद अपना सुनहला मुख बार बार फूलों से भरे ताल में देखकर निहाल होता है, रात को चलती हवाओं में एक राग बजता है और कहता है, कुआर आने वाला है।

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