सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

प्रस्ताव है मान्यता नही, सत्यापन करिये फिर मानिए



1. आप अपने परिवार से क्षुब्ध हैं, माता पिता भाई पति पत्नी मित्र सबसे किसी न किसी मोड़ पर क्षुब्ध हो सकते हैं। उस मोड़ पर आपको कोई ऐसा मिले जिसके पास आकर आप खुश हो जाएं तो आपको लगता कि यही एक ऐसा जो मुझे समझता बाकी सब मतलबी है। कुछ समय बाद वह व्यक्ति भी थोड़ा थोड़ा मतलबी लगने लगता है। फिर आपको लगता है सारे मर्द या सारी स्त्रियां एक जैसी होती हैं। आप की तलाश कभी खत्म नही होने वाली।

2. आप अमूमन जिसे प्रेम कहते हैं वह दरअसल गिल्ट होता है। आपकी शाम को दोस्त से लड़ाई हो गयी, आपको बुरा लगा सुबह एक गुलदस्ता या चॉकलेट लेकर आप उसे दुगुना तिगुना भाव ज्ञापित करते हैं तो वह प्रेम के वशीभूत होकर नही बल्कि आप गिल्ट में हैं उसके प्रभाव में आप अपने को अभिव्यक्त कर रहे हैं। 

3. प्रेम विश्वास है, सम्मान है, देखभाल है, एक दूसरे के प्रति श्रद्धा है। 

4. प्रेम पात्र का मिलना ईश्वर के मिलने से कम नही होता, दुर्लभ है। मनुष्य में देवत्व की स्थापना प्रेम से ही सम्भव है। 

5. ब्रेक अप, चालाकियां, धोखा यह सब उसी तरह से है जैसे आप खाना खाने बैठें और थाली में कीड़ा गिर जाए, थाली पलट जाए, थाली कोई और उठा ले जाये। उसका सम्बन्ध प्रेम से नही पजेशन से है। 

6. एक बार चित्त से उतरने के बाद कोई दुबारा उस सम्मान और उस विश्वास के साथ प्रेम नहीं प्राप्त कर सकता है।

7. आनंद ही धर्म है। आनंद में रहिये, आनंद बांटिए। जितना बदा है वह मिलेगा बाकी कर्म पर निर्भर है।

नदी के जल में डूबे पत्थर जब भगवान बनने किसी जगह चले जाते हैं तो भी उन्हें प्रतीक्षा होती है कि कोई नेह भरा हृदय एक लोटा जल से उन्हें सींच दे। यही तरलता प्रेम है।

टिप्पणियाँ