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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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हमारे पतन का एक कारण ये भी है कि हमने अपने कुल देवता, ग्राम देवता, लोक देवता को छोड़ दिया जो हमारे रक्षक थे, हमारी चिंता करते थे, हमारे सौभाग्य की अभिवृद्धि के कारक थे।
शहरों की ओर पलायन से हमारे घर और गांव सूने हुए तो उसके साथ उपेक्षित हो गए उन घरों के अंदर बने कुल देवी या कुल देवता के स्थान, उपेक्षित और सूने हो गए गांव के डीह पर बने ब्रह्म स्थान के ग्राम देवता, पूजा से वंचित हो गए स्थानिक लोक देवता, जो उस गांव या पंचायत या उस क्षेत्र विशेष से संबद्ध थे।
मेरे गांव में "सोखा बाबा" नाम के लोक देवता की पूजा होती है। एक सत्य कथा है कि 70 के दशक में गांव के एक बुर्जुग असम के जंगलों से कहीं जा रहे थे, तभी एक शेर ने उन्हें घेर लिया। शेर इनकी ओर तेजी से हमला करने वाला था, तभी उन्होंने जोर से "जय सोखा बाबा" कहा और उनके ये कहते ही शेर दुगुनी गति से वापस विपरीत दिशा में भाग गया। ऐसी ही कई और सत्य प्रचलित कथाएं आज भी हैं।
हमलोग जब छोटे थे तो सोखा बाबा की वार्षिक पूजा के दिन भगत अपने मुंह में खौलता हुआ घी भरकर चारों ओर खड़ी भीड़ पर फूंकते थे। हमलोगों के चेहरे को पिताजी गमछे या तौलिए से ढंक कर रखते थे। जिसके चेहरे पर वो घी पड़ता था (इस प्रक्रिया को बामर देना कहते थे), माना जाता था कि इससे उसकी बाधाएं और रोग दूर हो जाएंगे। रोचक ये कि वो भगत ब्राह्मणेतर जातियों से होते थे। माने समरसता की छोटी सी पाठशाला वहीं हर वर्ष लग जाती थी, जब भगत जी के मुख से निकले घी के छींटे आशीर्वाद लगते थे।
अब चूंकि हम सबका शहरीकरण हो गया है, हम गांव से दूर हो गए तो अब न सोखा बाबा का आशीर्वाद मिल रहा में हमें और न हमें अपनी कुलदेवी या ग्राम देवता के दर्शन होते हैं।
सैंतालीस के बंटवारे में जिनको अपनी कुलदेवी/ कुलदेवता और ग्राम देवता को छोड़कर आना पड़ा, सोचिए वो ग्राम देवता और कुल देवता आज किन स्थितियों में होंगे या फिर नष्ट विनष्ट कर दिए गए होंगे। उनका अपमान ही आज उन क्षेत्रों की बदहाली, खून खराबा का कारण है।
विभाजन में इधर आये हिंदुओं को तो मजबूरी में सब छोड़ना पड़ा, पर हम किस मजबूरी में अपने गृह, ग्राम और लोक देवता को छोड़ रहे हैं, ये हमको सोचना है।
बिहारियों को चाहे कितनी भी गाली दो, कम से कम छठ में अपने गांव आकर कुल, ग्राम और ग्राम देवता के सम्मान और स्मरण का संस्कार तो उनमें बचा हुआ है। अगर बाकी सब भी अपने- अपने राज्यों के स्थानिक त्योहारों में घर आने का संस्कार और आदत विकसित करें तो हमारे कुल देवता, ग्राम देवता और लोक देवता भी पुनर्जागृत होकर हमारे ऊपर कृपा करना शुरू कर देंगे और हिंदुओं पर छाए दुर्भाग्य के बादल भी छंटने लगेंगे।
उन देवी और देवताओं को जगाइए, हमारा और आपका पुनर्जागरण भी शुरू हो जाएगा। अगली पुस्तक #अमृत_कुंभ में इन विषयों पर भी व्यापक विमर्श है।
अभिजीत सिंह
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