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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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डॉ. नितिन सहारिया , महाकौशल
भारतीय आर्ष वान्ग्ड़मय दुनिया का सबसे प्राचीन साहित्य है, जिसमें 'ऋग्वेद' संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ है। भारतीय आर्ष वान्ग्ड़मय में दुनिया के समस्त प्रश्नों का उत्तर मौजूद है। आर्यावर्त के ऋषियों ने तपश्या के द्वारा अध्यात्म विद्या से सारे विश्व ब्रह्मांड के रहस्यों को जान लिया था। संपूर्ण विश्व ब्रह्मांड का दिग्दर्शन करके अपने शोध निष्कर्ष को आर्ष ग्रंथो में लिख दिया। संसार का सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में विश्व की उत्पत्ति के पूर्व का वर्णन 'नासदीय ' सूक्त में आता है। *नासदीय सूक्त कहता है- " सृष्टि की उत्पत्ति के पूर्व न सत था ,न असत था, न अंधकार था ,न प्रकाश था, पृथ्वी ,सूर्य ,चंद्र ,अंतरिक्ष, पदार्थ कुछ भी नहीं था सिर्फ एक विराट चैतन्य युक्त तत्व -विराट ब्रह्म ही मात्र मौजूद था, जिनके संकल्प से सृष्टि की उत्पत्ति हुई।* " अर्थात *परमात्म चेतना Divine energy से सृष्टि की उत्पत्ति हुई यानि सूक्ष्म से स्थूल की, चेतना से पदार्थ की उत्पत्ति हुई ।* आज का आधुनिक विज्ञान पश्चिमी जगत के वैज्ञानिक भी इसी सत्य का पता लगाने में जुटे हुए हैं, उनके इस कार्य में भारतीय आर्ष वान्ग्ड़मय - वैदिक साहित्य बहुत अधिक मार्गदर्शन, मदद कर सकता है।
परमात्मा के संकल्प ' *एकोस्य्हं बहुष्याम्* ' से सृष्टि - चक्र प्रारंभ हुआ। विराट ब्रह्म -परमात्मा जो ओमकार ( ॐ) स्वरूप है ने अपने आप को एक से तीन त्रिदेव के रूप में प्रकट किया और त्रिदेव से ही सृष्टि चक्र में संतानोत्पत्ति् की प्रक्रिया प्रारंभ हुई। "आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसिन्नान्यकिंचन मिषत्त।
स ईक्षत लोकान्नु सृजा इति "
( ऐतरेय उपनिषद एक 1/1/1 )
अर्थात पूर्व में एक आत्मा ही थी, अन्य कोई तत्व न था,उसी ने अपनी इच्छा से लोक रचे। सब प्राणियों में व्याप्त यही जानने योग्य है।
सनातन- हिंदू धर्म के अनुसार 'आर्य' ब्रह्मा, विष्णु; महेश और ऋषि मुनियों की संतानें हैं । ब्रह्मा, विष्णु और महेश के कई पुत्र और पुत्रियां थी। इन सभी के पुत्रों और पुत्रीयों से ही देव (सुर), दैत्य (असुर), दानव ,राक्षस, गंधर्व, यक्ष, किन्नर ,वानर, नाग ,चारण ,निषाद ,मातंग ,रीक्ष, भिल्ल,किरात,अप्सरा, विद्याधर ,सिद्ध, निशाचर, वीर ,गुहाक, कुलदेव, स्थानदेव, ग्रामदेवता, पितर, भूत, प्रेत, पिशाच, कूष्मांडा, ब्रह्मराक्षस, वैताल, क्षेत्रपाल, मानव आदि की उत्पत्ति हुई।
वंश लेखकों, तीर्थ- पुरोहितों, पंडो व वंश -परंपरा के वाचक संवाहकों द्वारा समस्त आर्यावर्त के निवासियों को एकजुट रखने का जो अभूतपूर्व प्रयास किया गया है ,वह निश्चित रूप से वैदिक ऋषि -परंपरा का ही अधतन आदर्श उदाहरण माना जा सकता है।
पुराणानुसार द्रविड़, चोल एव्ं पांडय जातियों की उत्पत्ति में राजा नहुष के योगदान को मानते हैं, जो इलावर्त के चंद्रवंशी राजा थे। पुराण भारतीय इतिहास को जलप्रलय तक ले जाते हैं । यहीं से वैवस्वत मन्वंतर प्रारंभ होता है। *वेदों में पंचनद का उल्लेख है अर्थात पांच प्रमुख कुल से ही भारतीयों के कुलों का विस्तार हुआ।*
विभाजित वंश- संपूर्ण हिंदू- सनातनी वंश वर्तमान में गोत्र, प्रवर, शाखा,वेद, शर्म, गण ,शिखा, पाद, तिलक, छत्र, माला, देवता ( शिव ,विनायक ,कुलदेवी, कुलदेवता ,इष्टदेवता ,राष्ट्रदेवता, गोष्ठदेवता, भूमि देवता, ग्राम देवता, भैरव ,यक्ष) आदि में विभक्त हो गया है। जैसे-जैसे समाज बढ़ा, गण और गोत्र में भी कई भेद होते गए। बहुत से समाज या लोगों ने गुलामी के काल में कालांतर में यह सब छोड़ दिया है तो उनकी पहचान कश्यप गोत्र मान ली जाती है।
हम संपूर्ण अखंड भारत अर्थात अफगानिस्तान ,पाकिस्तान, बांग्लादेश, नेपाल और बर्मा आदि में जो भी मनुष्य निवास कर रहे हैं, वे सभी प्रमुख वंशों से ही संबंध रखते हैं। कालांतर में उनकी जाति ,धर्म और प्रांत बदलते रहे, लेकिन वे सभी एक ही कुल और वंश से हैं । गीता में भगवान श्रीकृष्ण अर्जुन से कहते हैं कि - " कुल का नाश् तब होता है; जबकि कोई व्यक्ति अपने कुलधर्म को छोड़ देता है। इस तरह वे अपने मूल एवं पूर्वजों को हमेशा के लिए भूल जाते हैं। *कुलहन्ता वह होता है ,जो अपने कुल -धर्म और परंपरा को छोड़कर अन्य के कुल, धर्म और परंपरा को अपना लेता है। जो वृक्ष अपनी जड़ों से नफरत करता है, उसका विकास संभव नहीं है।"*
भारत खंड का विस्तार - महाभारत में प्राग्ज्योतिष (असम), किंपुरुष (नेपाल), त्रिविस्टप (तिब्बत), हरिवर्ष (चीन), कश्मीर ,अभिसार (राजौरी) ,दार्द , हूर्ण हुंजा , अम्बिस्ट , आम्ब, पख्तू, कैकेय, गंधार , कंबोज, वाल्हीक , बलख, शिवि, शिवस्थान - सीस्टान सारा बलूच क्षेत्र, सिंध, सौवीर, सौराष्ट्र समेत सिंध का निचला क्षेत्र दंडक, महाराष्ट्र, सुरभिपट्टन मैसूर, चोल ,आंध्र ,कलिंग तथा सिंहल (श्रीलंका) सहित 200 जनपद वर्णित हैं, जो की पूर्णतया 'आर्य' थे या आर्य संस्कृति व भाषा से प्रभावित थे, अथवा सांस्कृतिक भारत के अंग थे । *महाभारत के युद्ध में अरब प्रदेश के एक राजा बिड़ालाक्ष के द्वारा युद्द में कौरवों की ओर से भागीदारी का वर्णन आता है ।*
इनमें से आभीर अहीर, तंवर, कंबोज, यवन, शिना , काक, पणि, चुलूक चालुक्य, सरोस्ठ सरोटे , कक्कड़, खोखर, चिंधा, चिंधड़, समेरा ,कोकन, जांगल, शक, पुंड्र , ओड्र, मालव, क्षुद्रक, योधेय, जोहिया, सूर , तक्षक व लोहड आदि 'आर्य' विशेष उल्लेखनीय हैं ।
आज इन सभी के नाम बदल गए हैं। इतिहासकार मानते हैं कि भारत की जाट ,गुर्जर, पटेल, राजपूत, मराठा, धाकड़ ,सैनी ,परमार, पठानिया, अफजल, घोसी, बोहरा ,अशरफ, कसाई, कुला, कुंजरा, नायत, मेंडल,मोची, मेघवाल आदि हिंदू, मुस्लिम, ईसाई, बौद्ध की कई जातियां सभी एक ही वंश से उपजी हैं।
*हिंदुओं (मूलतः भारतीयों) के प्रमुख वंशो के बारे में जिनमें से किसी एक के वंश से हम भी जुड़े हुए हैं। हमारे लिए यह जानकारी महत्वपूर्ण हो सकती है । जो खुद को मूल निवासी मानते हैं वे यह भी जान लें की सृष्टि के प्रारंभ में मानव हिमालय के आस-पास ही रहता था।*
हिमयुग की समाप्ति के बाद ही धरती पर वन क्षेत्र और मैदानो का विस्तार हुआ तब मानव वहां जाकर रहने लगा। हर धर्म में इसका उल्लेख मिलता है कि हिमालय से निकलने वाली किसी नदी के पास ही मानव की उत्पत्ति हुई थी। वहीं पर एक पवित्र वन था, जहां पर प्रारंभिक मानवों का एक समूह रहता था । धर्मों के इतिहास के अलावा धरती के भूगोल और मानव इतिहासकार भी कुछ ऐसा ही मानते हैं।
ब्रह्मा कुल - ब्रह्मा जी की प्रमुख रूप से तीन पत्नियों थी। तीनों से उनको पुत्र और पुत्रियों की प्राप्ति हुई। इसके अलावा ब्रह्मा के मानस पुत्र भी थे, जिनमें से प्रमुख के नाम इस प्रकार हैं - 1. अत्रि 2. अंगिरस 3. भृगु 4.कदर्म 5. वसिष्ठ 6. दक्ष 7. स्वयंभुव मनु 8. कृतु 9. पुलह 10. पुलस्त्य 11. नारद 12. चित्रगुप्त 13. मरीचि 14. सनक 15. सनंदन 16. सनातन 17. सनत्कुमार ।
स्वयंभुव मनु कुल - स्वयंभुव मनु कुल की कई शाखाएं हैं। उनमें से एक प्रमुख शाखा की बात करते हैं। स्वयंभुव मनु समस्त मानव जाति के प्रथम संदेशवाहक हैं। स्वयंभुव मनु एवं सतरूपा के कुल में पांच संताने थी, जिनमें से दो पुत्र प्रियवत एवं उत्तानपाद तथा तीन कन्यायें आकूति ,देवहूति और प्रसूति थीं । आकूति का विवाह रुचि प्रजापति के साथ और प्रसूति का विवाह दक्ष प्रजापति के साथ हुआ। देवहूति का विवाह प्रजापति कदर्म के साथ हुआ। रुचि को आकूति से एक पुत्र उत्पन्न हुआ, जिसका नाम यज्ञ रखा गया। इनकी पत्नी का नाम दक्षिणा था। देवहुति ने नौ कन्याओं को जन्म दिया, जिनका विवाह प्रजापतियों या सप्तर्षियों से किया गया था।
देवहूति ने एक पुत्र को भी जन्म दिया था, जो महान ऋषि कपिल के नाम से जाने जाते हैं। भारत के कपिलवस्तु में उनका जन्म हुआ था और वे सांख्य दर्शन के प्रवर्तक थे। उन्होंने ही सगर के 100 पुत्रों को अपने श्राप के द्वारा भस्म कर दिया था। दो पुत्र - प्रियवत और उत्तानपाद । उत्तानपाद की सुनीति और सुरुचि नामक दो पत्नियों थी। राजा उत्तानपाद की सुनीति से ध्रुव तथा सुरुचि से उत्तम नामक पुत्र उत्पन्न हुए। ध्रुव ने बहुत प्रसिद्दि हासिल की थी।
स्वयंभुव मनु के दूसरे पुत्र प्रियवत ने विश्वकर्मा की पुत्री बहिष्मती से विवाह किया था; जिसने आग्नीघ्र, यज्ञबाहू, मेधातिथि आदि 10 पुत्र उत्पन्न हुए। प्रियव्रत की दूसरी पत्नी से उत्तम, तामस और रैवत यह तीन पुत्र उत्पन्न हुए, जो अपने नाम वाले मन्वंतरो के अधिपति हुए । महाराज प्रियवृत के 10 पुत्रों में से कवि, महावीर तथा सवन यह तीन नैस्टिक ब्रह्मचारी थे और उन्होंने संन्यास धर्म ग्रहण किया था।
महाराज मनु ने बहुत दिनों तक इस सप्तद्वीपवती पृथ्वी पर राज्य किया। उनके राज्य में प्रजा बहुत सुखी थी। इन्हीं ने 'मनुस्मृति' के रचना की थी ,जो आज मूल रूप में नहीं मिलती है, अत: कभी-कभी प्रचलित वक्तव्यो पर विरोधाभाष देखने को मिलते हैं किंतु वह संपूर्ण मानव जाति के आचरण की संहिता अवश्य है ।
उस काल में वर्ण का अर्थ रंग होता था और आज जाती। प्रजा का पालन करते हुए जब महाराज मनु को मोक्ष की अभिलाषा हुई तो वे संपूर्ण राज -पाट अपने बड़े पुत्र उत्तानपाद को सौंपकर एकांत में अपनी पत्नी शतरूपा के साथ नैमीषारण्य तीर्थ चले गए ,लेकिन उत्तानपाद की अपेक्षा उनके दूसरे पुत्र राजा प्रियव्रत की प्रसिद्दि ही अधिक रही। सुनंदा नदी के किनारे उन्होंने 100 वर्ष तक तपस्या की। दोनों पति-पत्नी ने नैमिषारण्य नामक पवित्र तीर्थ में गोमती के किनारे भी बहुत समय तक तपस्या की।
प्रियव्रत का कुल- राजा प्रियव्रत्त की ज्येस्ट पुत्र आग्नीघ्र जंबूद्वीप के अधिपति हुए । आग्नीघ्र के नौ पुत्र जंबूद्वीप के नौ खंडो के स्वामी माने गए हैं । जिनके नाम उन्हीं के नामो के अनुसार इलावृत वर्ष, भद्राश्व वर्ष, केतुमाल वर्ष, कुरु वर्ष, हिरण्यमय वर्ष, रम्यक वर्ष, हरिवर्ष , किंपुरुष वर्ष और हिमालय से लेकर समुद्र के भू- भाग को 'नाभि खंड' कहते हैं।
नाभि और कुरु यह दोनों वर्ष धनुष की आकृति वाले बताए गए । नाभि के पुत्र ऋषभ हुए और ऋषभ से भरत एवं बाहुबली का जन्म हुआ । *भरत के नाम पर ही बाद में इस नाभि खंड को 'भारतवर्ष ' कहा जाने लगा।* बाहुबली को वैराग्य प्राप्त हुआ तो ऋषभ ने भरत को चक्रवर्ती सम्राट बनाया । भारत को वैराग्य हुआ तो वह अपने बड़े पुत्र को राज-पाट सौंप कर जंगल चले गए। स्वयंभुव मनु के काल के ऋषि मरीचि, अत्रि,अंगिरस, पुलह, क्रतु, पुलस्त्य और वशिष्ठ हुए। इन्हीं ने मानव को सभ्य, सुविधा संपन्न और सुसंस्कृत बनाने का कार्य किया। इस प्रकार भारतवर्ष की स्थापना में इन महान वंशो का अविस्मरणीय योगदान रहा।
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