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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
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औद्योगिक क्रांति के बाद यूरोप में पूंजीवाद तेज़ी से फैला, लेकिन इसके साथ ही श्रमिक वर्ग में असमानता और असंतोष भी बढ़ा। इसी माहौल में कार्ल मार्क्स और फ्रेडरिक एंगेल्स ने उन्नीसवीं सदी के मध्य में ‘वैज्ञानिक समाजवाद’ का सिद्धांत दिया। उनका मानना था कि समाज की बुनियाद आर्थिक ढांचा है, और उत्पादन के साधनों पर नियंत्रण बदलते ही पूरी सामाजिक व्यवस्था बदल जाएगी। यह विचार आगे चलकर साम्यवाद में बदला, जिसने दावा किया कि श्रमिक क्रांति के बाद वर्गहीन और राज्यविहीन समाज बन सकता है।
बीसवीं सदी की शुरुआत में रूस की बोल्शेविक क्रांति ने इसे अमल में उतारा, लेकिन यह जल्द ही एक कठोर और अधिनायकवादी शासन में बदल गया। सोवियत संघ, चीन और अन्य देशों में हुए साम्यवादी प्रयोगों ने राजनीतिक दमन, व्यक्तिगत स्वतंत्रता पर अंकुश और आर्थिक असफलताओं को जन्म दिया। इससे मार्क्सवादियों को एहसास हुआ कि केवल आर्थिक क्रांति से स्थायी बदलाव संभव नहीं है—इसके लिए समाज की सांस्कृतिक संरचना को भी बदलना होगा।
यहीं से ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ की शुरुआत हुई। फ्रैंकफर्ट स्कूल के विचारकों—अंतोनियो ग्राम्शी, हर्बर्ट मारक्यूज़, मैक्स होर्खाइमर, थिओडोर अडोर्नो आदि—ने समझा कि चर्च, परिवार, राष्ट्रवाद, नैतिकता, कला, साहित्य और शिक्षा जैसी संस्थाएँ पारंपरिक मूल्यों की रक्षा करती हैं। अगर इन संस्थाओं की नींव को धीरे-धीरे हिला दिया जाए, तो समाज खुद ही परंपरा से दूर होकर वामपंथी विचारधारा को अपना लेगा।
इसके लिए उन्होंने मीडिया, शिक्षा, कला, साहित्य, फ़िल्म, संगीत और लोकप्रिय संस्कृति को हथियार बनाया। यह कोई अचानक होने वाली क्रांति नहीं थी, बल्कि पीढ़ियों तक चलने वाला ‘संस्कृति युद्ध’ था। इसमें नारीवाद, लैंगिक स्वतंत्रता, बहुसंस्कृतिवाद, नस्लीय पहचान और ‘राजनीतिक शुद्धता’ जैसे नारे दिए गए। देखने में यह प्रगतिशील लगे, पर धीरे-धीरे इन्होंने परिवार, धर्म और राष्ट्रीय पहचान को कमजोर कर दिया।
बीसवीं सदी के उत्तरार्ध में यह विचार अमेरिका और यूरोप में गहराई से जम गया। विश्वविद्यालयों में क्रिटिकल थ्योरी, जेंडर स्टडीज़ और पोस्टमॉडर्निज़्म पढ़ाया जाने लगा। मीडिया और मनोरंजन जगत ने इन्हें लोकप्रिय बनाकर आम जनता को विश्वास दिलाया कि यह बदलाव स्वाभाविक और आधुनिक जीवन का हिस्सा हैं—जबकि यह एक योजनाबद्ध वैचारिक परियोजना थी।
वैश्विक परिदृश्य – कल्चरल मार्क्सवाद का प्रभाव
चीन में मार्क्सवाद का मूल रूप राजनीतिक क्रांति और एकदलीय शासन के रूप में लागू हुआ, लेकिन सांस्कृतिक नियंत्रण भी उतना ही कठोर रहा। 1949 में माओ त्से-तुंग के नेतृत्व में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद ‘सांस्कृतिक क्रांति’ (1966-1976) चलाई गई, जिसमें परंपरागत चीनी कला, साहित्य, दर्शन और धार्मिक संस्थाओं को नष्ट किया गया। आज भी चीन में इंटरनेट, मीडिया और शिक्षा पर सख्त वैचारिक सेंसरशिप है, ताकि सरकारी विचारधारा को कोई चुनौती न दे सके।
अमेरिका में यह विचार विश्वविद्यालयों और मीडिया के जरिए फैला। 1960 और 70 के दशक में ‘नागरिक अधिकार आंदोलन’, ‘नारीवाद’, ‘यौन क्रांति’ और ‘वियतनाम युद्ध-विरोधी आंदोलन’ ने परिवार, चर्च और राष्ट्रवाद जैसे पारंपरिक मूल्यों को चुनौती दी। आज यह प्रवृत्ति ‘वोक कल्चर’ और ‘जेंडर आइडेंटिटी’ जैसे मुद्दों में दिखती है, जहां असहमति पर सामाजिक बहिष्कार या पेशेवर नुकसान झेलना पड़ सकता है।
जापान ने द्वितीय विश्व युद्ध के बाद अमेरिकी प्रभाव में तकनीकी और आर्थिक प्रगति की, लेकिन 1980 के दशक के बाद पश्चिमी सांस्कृतिक प्रभाव और मीडिया के कारण पारिवारिक व्यवस्था में गिरावट आने लगी। विवाह और परिवार से दूरी, जन्मदर में कमी और युवाओं में व्यक्तिवाद का बढ़ना इसी बदलाव का संकेत है।
यूरोपीय संघ के देशों में बहुसंस्कृतिवाद के नाम पर आप्रवासियों को खुली छूट दी गई, जिससे राष्ट्रीय पहचान कमजोर हुई। जर्मनी, फ्रांस, स्वीडन और ब्रिटेन में ‘इस्लामीकरण’ और ‘पहचान की राजनीति’ अब गंभीर सामाजिक संकट बन चुके हैं। यहां कल्चरल मार्क्सवाद ने ऐसे समाज बनाए हैं जो अपनी ही सांस्कृतिक जड़ों को लेकर अपराधबोध से ग्रस्त हैं।
भारत में कल्चरल मार्क्सवाद की एंट्री
भारत में इन विचारों का प्रवेश आज़ादी से पहले ही हो चुका था। 1917 की रूसी क्रांति से प्रभावित भारतीय क्रांतिकारियों ने इसे ब्रिटिश राज के खिलाफ प्रेरणा के रूप में देखा। 1920 के दशक में मजदूर संगठनों और ट्रेड यूनियनों के जरिए साम्यवादी विचार फैलने लगे। 1925 में भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) बनी और मार्क्सवाद-लेनिनवाद को अपनाया।
आजादी के बाद पं. नेहरू ने समाजवाद को अपनाया और योजनाबद्ध अर्थव्यवस्था, सरकारी नियंत्रण और भारी उद्योगों को प्राथमिकता दी। यह यूरोपीय साम्यवाद जितना कट्टर नहीं था, लेकिन इसकी वैचारिक जड़ें पश्चिमी समाजवाद में थीं।
केरल, पश्चिम बंगाल और त्रिपुरा में वामपंथी दल लंबे समय तक सत्ता में रहे। उन्होंने भूमि सुधार और शिक्षा के प्रसार जैसे कदम उठाए, लेकिन राजनीतिक हिंसा, वैचारिक असहिष्णुता और आर्थिक ठहराव भी बढ़ा।
1947 से 2014 – कांग्रेस और कल्चरल मार्क्सवाद का पोषण
आज़ादी के समय भारत के सामने दो रास्ते थे—
1. सनातन सांस्कृतिक पहचान पर आधारित आधुनिक भारत का निर्माण।
2. पश्चिमी वैचारिक ढांचों को अपनाकर अपनी जड़ों से दूरी बनाना।
सत्ता में आए नेतृत्व ने दूसरा रास्ता चुना।
नेहरू के दौर में विश्वविद्यालयों में ऐसे बुद्धिजीवी आए, जिन्होंने भारत के गौरवशाली अतीत को संदेह की नजर से देखा। इतिहास का पुनर्लेखन हुआ, जिसमें वेद-उपनिषद, रामायण, महाभारत को ‘किंवदंती’ कहा गया और आक्रांताओं के काल को ‘सांस्कृतिक समृद्धि’ बताकर प्रस्तुत किया गया। धर्मनिरपेक्षता के नाम पर मंदिर सरकारी नियंत्रण में आ गए, लेकिन मस्जिद और चर्च नहीं।
इंदिरा गांधी के समय आपातकाल में स्वतंत्रता कुचली गई, लेकिन वामपंथी विचारकों को खुली छूट मिली। शिक्षा में ऐसे इतिहासकार हावी हुए जो हिंदू गौरव को कमतर दिखाते थे।
राजीव गांधी के दौर में तकनीकी विकास तो हुआ, लेकिन सांस्कृतिक नीति वही रही। शाह बानो मामला दिखाता है कि वोट बैंक के लिए व्यक्तिगत कानून भी बदले जा सकते हैं।
मनमोहन सिंह के समय आर्थिक उदारीकरण हुआ, लेकिन सांस्कृतिक मोर्चा और कमजोर हो गया। विदेशी फंड वाले NGOs को परिवार तोड़ने, अतिवादी नारीवाद फैलाने और पहचान की राजनीति को हवा देने का मौका मिला। 2004-2014 में यूपीए सरकार के दौरान हिंदू समाज को शोषक और आक्रांताओं को सुधारक बताने की प्रवृत्ति सामान्य हो गई।
लगातार 67 वर्षों की इस दिशा ने कल्चरल मार्क्सवाद के लिए भारत में उपजाऊ जमीन तैयार कर दी। विश्वविद्यालय वामपंथी गढ़ बन गए, मीडिया में हिंदू अस्मिता पर उपहास होने लगा और तुष्टिकरण को धर्मनिरपेक्षता का नाम दे दिया गया।
वर्तमान परिदृश्य में - भारत में कल्चरल मार्क्सवाद का प्रभाव
आज कल्चरल मार्क्सवाद भारत में और तेज़ी से दिख रहा है—
विश्वविद्यालयों में ‘जेंडर स्टडीज़’, ‘क्वीर थ्योरी’ और ‘पोस्ट-कोलोनियल स्टडीज़’ के जरिए युवाओं को अपनी पहचान पर सवाल उठाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।
OTT और सोशल मीडिया पर हिंदू प्रतीकों का मजाक बनाने वाले कंटेंट की भरमार है, जबकि अन्य धर्मों पर सवाल उठाना ‘असहिष्णुता’ कहलाता है।
विदेशी फंड से चलने वाले NGOs समाज में विभाजनकारी एजेंडा फैलाते हैं।
शहरी युवाओं में विवाह, परिवार और धार्मिक अनुष्ठानों को ‘पुराना मॉडल’ कहकर हाशिए पर डाला जा रहा है।
परिणामस्वरूप, भारत का वह सांस्कृतिक आत्मविश्वास, जिसने सदियों तक पूरी दुनिया को प्रेरित किया, अब अपनी ही जड़ों पर संदेह करने लगा है। यही कल्चरल मार्क्सवाद की सबसे बड़ी सफलता और समाज के लिए सबसे बड़ा खतरा है।
✍️Deepak Kumar Dwivedi
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