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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भारतीय आर्थिक चिंतन पर प्रायः यह कहा जाता है कि 1991 के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण (LPG) की नीतियों के बाद भारत में पूँजीवाद आ गया। परंतु यह धारणा वास्तविकता से कोसों दूर है। पूँजीवादी व्यवस्था की पहली शर्त है कि अर्थव्यवस्था पर सरकारी नियंत्रण न्यूनतम हो तथा सबको समान अवसर उपलब्ध हों। परंतु भारत की वास्तविक स्थिति देखें तो यहाँ रेलवे, दूरसंचार, रक्षा, पेट्रोलियम, कृषि जैसे कई महत्वपूर्ण क्षेत्रों में आज भी सरकारी एकाधिकार है। ऐसे में यह कहना कि भारत पूरी तरह पूँजीवादी व्यवस्था अपना चुका है, इतिहास और तथ्य दोनों से अन्यथा होगा।
भारत के संविधान की प्रस्तावना में समाजवाद अंकित है। यह समाजवादी अवधारणा किसी भी रूप में भारतीय परंपरा का अंग नहीं, बल्कि साम्यवादी-मार्क्सवादी आर्थिक विचारधारा से प्रेरित है। परम पूज्य गुरुजी माधव सदाशिव गोलवलकर ने अपनी पुस्तक विचार नवनीत में इसे भारतीय समाज-विन्यास के प्रतिकूल बताया था। उन्होंने स्पष्ट कहा कि भारतीय समाज धर्म-आधारित है, जहाँ पुरुषार्थ चतुष्टय — धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — जीवन का आधार है। यहाँ अर्थ की साधना धर्म के पश्चात आती है, न कि उससे पृथक होकर।
भारत का गौरवपूर्ण आर्थिक इतिहास भी इसी सत्य का प्रमाण है। इस्लामिक आक्रमणों से पूर्व भारत विश्व अर्थव्यवस्था में 30 से 33 प्रतिशत योगदान देता था, और अंग्रेजों के आगमन के पूर्व भी यह अनुपात 24 प्रतिशत था। भारतीय व्यापारी विश्वभर में वाणिज्य करते थे। किंतु अंग्रेजों ने भारत की संपूर्ण आर्थिक तंत्र को योजनाबद्ध ढंग से ध्वस्त कर दिया। भुखमरी और गरीबी को यहाँ कृत्रिम रूप से उत्पन्न किया गया। एक अनुमान के अनुसार अंग्रेज भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर की संपत्ति लूटकर ले गए—जो आज अमेरिका और चीन दोनों की अर्थव्यवस्थाओं को मिलाकर भी उससे अधिक नहीं होता।
पूँजीवाद के सिद्धांत का प्रतिपादन एडम स्मिथ ने 1776 में किया, किंतु उससे लगभग एक शताब्दी पूर्व ही भारत की समृद्धि ऐसी थी कि वह वैश्विक अर्थव्यवस्था का चौथाई हिस्सा अकेले योगदान देता था। किंतु केवल तीन शताब्दियों के भीतर ही भारत का योगदान घटकर 4 प्रतिशत रह गया। इसमें सबसे बड़ी भूमिका अंग्रेजी उपनिवेशवाद की रही, और स्वतंत्र भारत में कांग्रेस के नेतृत्व ने समाजवादी मॉडल को लागू कर उद्यमिता और निजी निवेश का गला घोंटकर स्थिति को और विकट बना दिया।
इस पृष्ठभूमि में श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी और परम पूज्य गुरुजी का आर्थिक दृष्टिकोण विशेष महत्त्वपूर्ण हो जाता है। वे जिस हिंदू आर्थिक चिंतन की बात करते थे, उसका आधार रामराज्य और विक्रमादित्य के समय का विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल था। इस सनातनी आर्थिक मॉडल में राज्य और समाज की भूमिकाएँ सदा स्पष्ट रहीं। राज्य का कार्य व्यापार करना नहीं था। न ही सरकार को शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी सेवाओं पर एकाधिकार प्राप्त था। यह कार्य समाज करता था, और वह भी पूर्ण दक्षता तथा नैतिकता के साथ।
प्राचीन भारत में गुरुकुलों की व्यवस्था राजा और समाज के सामूहिक सहयोग से चलती थी। वहाँ शिक्षा का उद्देश्य केवल जीविका नहीं, बल्कि जीवन की पूर्णता प्राप्त करना था। विलियम एडम्स जैसे विद्वानों की रिपोर्टें इस बात का स्पष्ट प्रमाण हैं कि अठारहवीं सदी के पूर्वार्ध तक भारत में ग्राम स्तर पर हज़ारों पाठशालाएँ कार्यरत थीं, जहाँ सभी जातियों और वर्गों के बालक विद्या प्राप्त करते थे—बिना किसी शुल्क के, बिना किसी बाज़ारवादी दबाव के।
आर्थिक व्यवस्था केवल धनार्जन की यांत्रिक प्रक्रिया नहीं है, बल्कि यह समाज के मूल्य, संस्कृति और दृष्टिकोण को भी प्रतिबिंबित करती है। यदि हम पूँजीवादी, समाजवादी और सनातनी आर्थिक मॉडल की तुलना करें तो यह स्पष्ट हो जाता है कि इन तीनों की आत्मा एक-दूसरे से सर्वथा भिन्न है।
पूँजीवाद का जन्म पश्चिम में हुआ और इसे एडम स्मिथ ने अठारहवीं शताब्दी में व्यवस्थित रूप दिया। इसका मूल सिद्धांत था कि राज्य अर्थव्यवस्था में न्यूनतम हस्तक्षेप करे और बाजार की शक्तियाँ — माँग और आपूर्ति — स्वयं मूल्य और वितरण तय करें। पूँजीवाद व्यक्ति और पूँजी को सर्वोपरि मानता है। निजी संपत्ति, लाभ की आकांक्षा और प्रतिस्पर्धा इसमें प्रमुख आधार हैं। औद्योगिक क्रांति के बाद इस व्यवस्था ने अभूतपूर्व विकास तो दिया, परंतु साथ ही अमीरी-गरीबी की गहरी खाई भी पैदा कर दी। श्रमिक शोषण, उपभोक्तावाद और नैतिकता-विहीनता पूँजीवादी अर्थव्यवस्था की स्थायी समस्या बन गई।
पूँजीवादी व्यवस्था में बाज़ार की शक्तियों को पूर्ण स्वतंत्रता देने से आर्थिक गतिविधियाँ तेज़ी से बढ़ती हैं, किंतु इसका दूसरा पक्ष यह है कि यह व्यवस्था अत्यधिक अस्थिर भी है। इतिहास साक्षी है कि लगभग प्रत्येक 25–30 वर्षों में पूँजीवादी देशों को गहरी आर्थिक मंदी या कहें आर्थिक सुनामी का सामना करना पड़ा है। 1929 की महामंदी, 1970 का ऑयल क्राइसिस, 2008 का सब-प्राइम संकट और अब 2020 के कोरोना काल की मंदी—ये सभी इसी अस्थिर पूँजीवादी ढाँचे की उपज हैं। लाभ और उपभोग की अंधी दौड़ अंततः बाजार को असंतुलित कर देती है और करोड़ों लोग अचानक बेरोज़गार व निर्धन हो जाते हैं।
इसके विपरीत, समाजवादी आर्थिक मॉडल साम्यवाद से प्रेरित होकर उभरा। कार्ल मार्क्स और लेनिन की विचारधारा से प्रभावित इस व्यवस्था ने राज्य को सर्वशक्तिमान बना दिया। उत्पादन, वितरण और संसाधनों पर सरकारी नियंत्रण इसकी विशेषता है। निजी संपत्ति को या तो समाप्त कर दिया गया या बहुत सीमित कर दिया गया। समानता इसका सर्वोच्च आदर्श था, परंतु समानता की इस चाह में स्वतंत्रता और नवाचार का गला घोंट दिया गया। सोवियत संघ और चीन जैसे देशों ने समाजवादी मॉडल से प्रारंभिक विकास तो किया, किंतु शीघ्र ही वहाँ ठहराव, भ्रष्टाचार और दमनकारी तंत्र हावी हो गए। भारत में भी नेहरूवादी समाजवाद के कारण लाइसेंस-परमिट-कोटा राज ने निजी उद्यम और उद्यमिता का दम घोंट दिया। परिणाम यह हुआ कि प्राकृतिक संपदा और मानव-शक्ति से परिपूर्ण भारत, गरीबी और पिछड़ेपन में जकड़ा रहा।
पश्चिमी आर्थिक प्रतिमानों के विपरीत, भारतीय या सनातनी आर्थिक दृष्टिकोण का स्वरूप सर्वथा भिन्न रहा है। यहाँ न तो पूँजी को जीवन का परम लक्ष्य माना गया, न ही राज्य को सर्वशक्तिमान बनाने की प्रवृत्ति रही। इस समूचे तंत्र का आधार धर्म था—वह धर्म जो जीवन को संतुलित और मर्यादित बनाता है। भारतीय परंपरा में पुरुषार्थ चतुष्टय—धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—को जीवन का मार्गदर्शक स्वीकार किया गया। अर्थ की साधना धर्म से नियंत्रित रहती थी और यही मर्यादा उसे शोषण से बचाती थी तथा समाज को नैतिक आचरण की दिशा देती थी।
प्राचीन भारत में आर्थिक तंत्र विकेंद्रीकृत था। ग्राम समाज इस व्यवस्था की मूल इकाई था, जो आत्मनिर्भर और सामुदायिक सहयोग पर आधारित रहता था। गाँव और नगर के बीच संतुलन बनाकर सामाजिक तथा आर्थिक जीवन का संचालन होता था। राज्य का कार्य सीमित था—वह केवल न्याय की स्थापना और बाह्य आक्रमण से सुरक्षा सुनिश्चित करता था। किंतु शिक्षा, स्वास्थ्य, सेवा और सामाजिक उत्तरदायित्व समाज स्वयं निभाता था। परिवार और कुटुंब व्यवस्था ही आर्थिक-सामाजिक जीवन की धुरी थे, जहाँ प्रत्येक व्यक्ति स्वयं को समुदाय का अभिन्न अंग मानता था।
इस प्रकार सनातनी आर्थिक मॉडल ने व्यक्ति, समाज और राज्य के बीच सामंजस्य स्थापित किया। उसने न तो भोगवादी पूँजीवाद को स्वीकार किया, न ही कठोर समाजवाद को, बल्कि धर्माधारित संतुलन के माध्यम से लोककल्याण की ओर अग्रसर हुआ।
यहाँ धनार्जन केवल व्यक्तिगत विलास के लिए नहीं, बल्कि समाज और धर्म की सेवा के लिए होता था। व्यापारी वर्ग दुनिया भर में व्यापार करता था, किंतु उसका उद्देश्य केवल लाभ अर्जित करना नहीं था; वह धर्म, सेवा और सहकारिता से बंधा रहता था। यही कारण था कि भारत शताब्दियों तक विश्व की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बना रहा, और उसकी समृद्धि के पीछे केवल बाजार या राज्य नहीं, बल्कि समाज और धर्म का संतुलन था।
स्पष्ट है कि पूँजीवाद स्वतंत्रता तो देता है पर असमानता को जन्म देता है; समाजवाद समानता का स्वप्न दिखाता है पर स्वतंत्रता का गला घोंट देता है। जबकि सनातनी आर्थिक मॉडल धर्म पर आधारित होकर संतुलन स्थापित करता है — राज्य और समाज की भूमिकाएँ स्पष्ट रखता है, धन को साधन मानता है न कि लक्ष्य, और जीवन की पूर्णता को अंतिम ध्येय बनाता है। यही वह व्यवस्था है जिसे श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी और परम पूज्य गुरुजी ने भारतीय समाज के लिए उपयुक्त बताया।
भारतीय इतिहास में शासन की आदर्श छवि दो रूपों में सबसे स्पष्ट दिखाई देती है—एक रामराज्य और दूसरा विक्रमादित्य का काल। दोनों की परिस्थितियाँ अलग थीं, लेकिन मूल ध्येय एक ही था—प्रजा का सुख, न्याय और आत्मनिर्भरता।
रामराज्य में राजा स्वयं को धर्म के अधीन मानता था। शासन का उद्देश्य केवल कर वसूलना या शक्ति बढ़ाना नहीं था, बल्कि यह देखना था कि समाज भयमुक्त और संतुष्ट रहे। गाँव अपने श्रम और संसाधनों से आत्मनिर्भर रहते थे। कृषि, पशुपालन और शिल्प से सबकी आवश्यकताएँ पूरी होती थीं। किसी को न भूख की चिंता थी, न अन्याय का भय। न्याय सुलभ था और शासन मर्यादा से बंधा हुआ।
विक्रमादित्य का काल इसी परंपरा का व्यावहारिक विस्तार था। उज्जयिनी उस समय व्यापार और शिक्षा का बड़ा केंद्र बन चुकी थी। विक्रमादित्य ने शासन को विकेन्द्रित ढाँचे में ढाला—ग्राम और नगर अपनी आवश्यकताओं के अनुसार निर्णय लेते थे। प्रशासन केवल मार्गदर्शन करता था, नियंत्रण नहीं थोपता था। व्यापारिक मार्ग खुले थे, साहित्य और विज्ञान को संरक्षण मिला, और समाज में संस्कृति व समृद्धि साथ-साथ बढ़ी।
राम और विक्रमादित्य के मॉडल में यह समानता थी कि शासन समाज पर बोझ नहीं था, बल्कि उसका सहयोगी था। राज्य की भूमिका मर्यादित थी—सुरक्षा, न्याय और नीति तक सीमित—बाकी जिम्मेदारी समाज स्वयं उठाता था। यही कारण है कि उस समय न बेरोज़गारी का संकट था, न सामाजिक विघटन।
बैंकों द्वारा रिज़र्व फाइनेंसिंग की सहायता से अनियंत्रित रूप से मुद्रा का निर्गम वर्तमान वैश्विक वित्तीय व्यवस्था की मूल समस्या है। प्रारंभिक काल में मुद्रा का आधार स्वर्ण हुआ करता था। इसे ही गोल्ड स्टैंडर्ड कहा जाता था। इस व्यवस्था में प्रत्येक नोट के बदले केंद्रीय बैंक, जैसे RBI, निश्चित मात्रा में स्वर्ण देने का वचन देता था। उदाहरणतः यदि कोई व्यक्ति 5000 रुपये RBI को लौटाता, तो उसे इसके बदले 1 ग्राम स्वर्ण प्राप्त होता। इस व्यवस्था से मुद्रा का मूल्य स्थिर बना रहता था, क्योंकि यदि बाज़ार में रुपये का मूल्य घटता, तो लोग नोट वापस कर स्वर्ण प्राप्त कर सकते थे। किंतु कालांतर में इस गारंटी को समाप्त कर दिया गया और अब केंद्रीय बैंक जितनी चाहे उतनी मुद्रा छाप सकते हैं। यही प्रणाली फ़िएट करेंसी (Fiat Currency) कहलाती है, जिसके कारण मुद्रास्फीति (Inflation) स्वाभाविक रूप से बढ़ती रहती है।
गोल्ड स्टैंडर्ड के समाप्त होने के बाद कंज़म्प्शन और डेब्ट बेस्ड इकॉनमी को बढ़ावा मिला। बैंकों को रिज़र्व फाइनेंसिंग के आधार पर अत्यधिक ऋण बाँटने की छूट दी गई। इसके परिणामस्वरूप विश्व के अधिकांश लोग ऋणग्रस्त हो गए और वैश्विक संपदा कुछ गिने-चुने वित्तीय समूहों तक सिमट गई। यदि गोल्ड स्टैंडर्ड पुनः लागू किया जाए, तो बैंकों की अनियंत्रित ऋण-प्रदान क्षमता पर अंकुश लगेगा और अर्थव्यवस्था पुनः बचत-आधारित मॉडल की ओर लौटेगी।
अत्यधिक उपभोग (Over-Consumption) की यह पश्चिमी अवधारणा प्राकृतिक संसाधनों पर गंभीर दबाव डाल चुकी है। नदियाँ, समुद्र, वन, पर्वत और भूमि प्रदूषण व शोषण के कारण संकट की स्थिति में हैं। इसलिए गोल्ड स्टैंडर्ड जैसे ठोस आधार वाली मौद्रिक प्रणाली पर्यावरणीय संतुलन की दृष्टि से भी महत्त्वपूर्ण हो सकती है।
आज भारत लगभग 4 ट्रिलियन डॉलर के GDP के साथ विश्व की पाँचवीं सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था है। फिर भी बेरोज़गारी दर 7–8% बनी हुई है और ग्रामीण–शहरी आय में गहरी असमानता मौजूद है। वैश्विक वित्तीय संकट औसतन 25–30 वर्षों में एक बार अवश्य आता है, जिससे भारत की विकास दर प्रभावित होती है।
सनातनी आर्थिक मॉडल इस स्थिति का विकल्प प्रस्तुत करता है। इसका मूल आधार विकेंद्रीकरण है, जिसमें उत्पादन और वितरण की शक्ति स्थानीय इकाइयों को दी जाती है। इस व्यवस्था में प्रत्येक क्षेत्र उपभोक्ता ही नहीं, बल्कि उत्पादक भी बनता है। उद्देश्य केवल लाभार्जन नहीं, बल्कि न्याय, धर्म और लोककल्याण है। स्थानीय उद्योग, पारंपरिक शिल्प और कृषि को आधुनिक तकनीक से जोड़कर आत्मनिर्भर आर्थिक संरचना विकसित की जा सकती है।
यदि भारत इस मॉडल को आधुनिक तकनीक—जैसे कृत्रिम बुद्धिमत्ता, ब्लॉकचेन और डेटा-साइंस—से जोड़ दे, तो आगामी 15–20 वर्षों में भारत का GDP 16–18 ट्रिलियन डॉलर तक पहुँच सकता है। बेरोज़गारी नगण्य हो जाएगी, प्रति व्यक्ति आय चार से पाँच गुना बढ़ सकती है और वैश्विक व्यापार में भारत की हिस्सेदारी 20% से अधिक हो सकती है।
इसके लिए आवश्यक है कि सरकार शिक्षा और अनुसंधान पर GDP का न्यूनतम 6% व्यय करे, प्रत्येक जिले में कौशल विकास मिशन चलाए, स्थानीय उद्योग और हस्तशिल्प को वैश्विक बाज़ार से जोड़े, कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्र में PPP मॉडल के माध्यम से निवेश बढ़ाए और एक धर्माधारित आर्थिक नीति आयोग गठित करे, जो नीति-निर्माण में नैतिकता और सांस्कृतिक मूल्यों को सम्मिलित करे।
इस मॉडल को एक साथ लागू करना कठिन है। इसलिए इसकी शुरुआत शून्य-तकनीकी उत्पादों से की जानी चाहिए—ऐसे उत्पाद जिनमें भारी पूँजी या जटिल तकनीक की आवश्यकता न हो, बल्कि स्थानीय संसाधन, पारंपरिक ज्ञान और मानव श्रम पर्याप्त हों। उदाहरणतः जैविक कृषि-उत्पाद, हस्तनिर्मित वस्त्र, मिट्टी और बाँस के शिल्प, आयुर्वेदिक औषधियाँ, गोबर-आधारित उत्पाद, प्राकृतिक साबुन-तेल और घरेलू खाद्य सामग्री। इनका उत्पादन गाँव और कस्बों में तत्काल प्रारम्भ किया जा सकता है, जिससे स्थानीय स्तर पर शत-प्रतिशत रोजगार संभव है।
क्रमशः जब ये छोटे आर्थिक केंद्र सफल सिद्ध होंगे, तो इस मॉडल को बड़े पैमाने पर लागू किया जा सकेगा। इससे आत्मनिर्भरता, स्थिरता और दीर्घकालीन संतुलन की ठोस नींव रखी जा सकेगी।
समाजवाद और पूँजीवाद जैसी पश्चिम-प्रेरित अवधारणाओं से मुक्त होने का समय है। यह समय है आर्थिक स्वतंत्रता, धार्मिक स्वाधीनता और जन-जागरण का। यह अपने मूल सनातन धर्म-आधारित आर्थिक सिद्धांतों की ओर लौटने का युग है। यह युग उद्यमिता को प्रोत्साहन देने का, प्रतिभा का सम्मान करने का और एक शक्तिशाली, आत्मनिर्भर भारत के निर्माण का है। अब भारत को केवल “सोने की चिड़िया” बनकर समृद्धि का प्रतीक भर नहीं रहना है, बल्कि “सिंह” बनकर अपने तेज, पराक्रम और स्वाभिमान से विश्व के मंच पर दहाड़ना है। भारत को ऐसा राष्ट्र बनना है जो केवल धन-संपन्न न होकर सामर्थ्य, बल, धर्म और नीति में भी अद्वितीय हो—जो शोषण का शिकार न बने, अपितु अन्याय का प्रतिकार कर सके और विश्व का मार्गदर्शन करने में सक्षम हो।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी
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