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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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लेखक: - डॉ पवन विजय जी
'माता भूमि: पुत्रो अहं पृथिव्या' यह उद्घोष है अथर्व वेद का। ये धरती हमारी माता है और हम इसके पुत्र है।धरती माता हमारा पोषण उसी प्रकार करती है जैसे माँ अपना दूध पिला कर शिशु का करती है। संतान माँ पर आघात करता है तब भी वह वात्सल्य पूर्वक ही उसे दुग्धपान कराती है, हम धरती पर मल मूत्र रसायन बारूद सब फैलाते हैं पर धरती माँ हमारे पोषण के लिए अन्न उपजाना नही त्यागती, नही रूठती।इसलिए वेद आगे कहते है --- "उप सर्प मातरं भूमिमतोम " -- हे मनुष्यो मातृभूमि की सेवा करो । अपने देश से प्रेम करो।
राष्ट्र के साथ द्रोह करना धर्म के साथ द्रोह करना ही है।अपने देश के प्रति कृतज्ञ बनो।देश के प्रति निष्ठा रखना, अपनी मातृभूमि के श्रद्धा व प्रेमभाव रखना जैसे भाव केवल "सनातन वैदिक धर्म " में ही निर्दिष्ट है । अन्य किसी भी धर्म के ग्रंथ मे धरती माँ और राष्ट्रभक्ति के लिए दो शब्द भी नहीं बोले गए है । "वयं राष्ट्रे जागृयांम पुरोहिता:'
जब हम भारत माता की जय कहते हैं तो उसका तात्पर्य मात्र एक जमीन के टुकड़े की जय नही कर रहे हैं। हम जय कार रहे होते हैं उस सांस्कृतिक विरासत की जिसकी गर्भ से हमारे अस्तित्व का निर्माण होता है। वह संस्कृति जो हमें जीवन जीना सिखाती है।
मनुष्य केवल अपनी मां के ही गर्भ से जन्म नही लेता बल्कि वह एक संस्कृति के गर्भ से भी जन्म लेता है। यदि माँ जीवित है तभी बालक का पोषण हो सकता है। जिस देश की संस्कृति मर गयी तो वहां मुर्दा बालक पैदा होंगे जो आगे चलकर एक मुर्दा नागरिक बनेंगे। मैं जिस संस्कति के गर्भ से पैदा हुआ हूँ उसकी रक्षा करना मेरा धर्म है। मेरा धर्म कोई संगठन या गिरोह नही हो सकता । मेरा धर्म वह सद्गुण है जो शताब्दियों से मेरे पूर्वजों के माध्यम से मेरे रक्त में सनातन प्रवाहित हो रहा है।
कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी कटक से लेकर अटक तक फैली भारतीय संस्कृति मेरा सांस्कृतिक ब्लड ग्रुप है। भारत माता की जय कहना मेरे लिए उसी भारतीय संस्कृति के दर्शन, विज्ञान, अध्यात्म, जड़, चेतन का ही जय घोष है।
भारत माता की जय 🙏❤
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