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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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एक राहुल गांधी समर्थक इस समय कह रहे कि वे पूंजीवाद के पक्षधर हैं, लेकिन मित्र मंडली वाले पूंजीवाद का विरोध करते हैं। आज वास्तव में वही मित्र मंडली वाला पूंजीवाद चल रहा है। कांग्रेस वर्तमान नेतृत्व को यह साहस दिखाना चाहिए कि यदि वे भविष्य में सत्ता में आएंगे, तो पूरी अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करेंगे। यदि यह साहस नहीं दिखाया गया, तो कम्युनिस्ट और साम्यवाद को नए रूप में—पूंजीवाद के नाम पर—लोगों को मूर्ख बनाने का प्रयास जारी रहेगा। यह वही चाल है, जो नेहरू ने अपनाई थी, जब उन्होंने साम्यवाद और समाजवाद को रिब्रांडिंग करके भारत में बेच दिया।
यह सुनकर मुझे याद आया कि जब स्वदेशी आर्थिक चिंतन आधारित मॉडल की संकल्पना महात्मा गांधी जी प्रस्तुत करते थे, तब वे विकेंद्रीकृत आर्थिक मॉडल और मुक्त बाजार व्यवस्था की वकालत करते थे। गांधी जी का मानना था कि भारत की अर्थव्यवस्था का मूल लक्ष्य ग्राम स्वराज, स्थानीय उत्पादन और जन-जन की भागीदारी होना चाहिए। उनका दृष्टिकोण यह था कि आर्थिक समृद्धि तभी स्थायी हो सकती है जब वह हर गांव और नागरिक तक पहुँचे, और किसी एक वर्ग या केंद्रित सत्ता के हाथ में न रहे।
लेकिन इसके विपरीत, जवाहरलाल नेहरू ने स्वतंत्र भारत में 1955 में पंचवर्षीय योजनाओं को लागू किया। यह रूसी समाजवाद से प्रेरित केंद्रीय योजना आधारित मॉडल था, जिसने अर्थव्यवस्था में निजी क्षेत्र और उद्यमिता की भूमिका सीमित कर दी। नेहरू के समय भारत की औसत वार्षिक आर्थिक वृद्धि दर लगभग 3.5% थी, जिसे पश्चिमी अर्थशास्त्री मजाक में “हिंदू ग्रोथ रेट” कहते थे। पंचवर्षीय योजनाओं ने उद्योग और वित्त पर केंद्रीकृत नियंत्रण और सरकारी हस्तक्षेप को बढ़ावा दिया, जिससे निजी क्षेत्र का विकास धीमा पड़ गया।
नेहरू जी की मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री जी ने आर्थिक सुधारों की योजना बनाई थी। ताशकंद समझौते से लौटने के कुछ समय पश्चात उनकी रहस्यमय मृत्यु हुई। कई विद्वान मानते हैं कि उनकी हत्या इसलिए करवाई गई क्योंकि वे बड़े आर्थिक सुधार लागू करने वाले थे, जो देश की अर्थव्यवस्था को खोलने वाले थे। शास्त्री जी के बाद इंदिरा गांधी ने सत्ता संभाली और उन्होंने बैंकों का सरकारीकरण किया। इसके परिणामस्वरूप अर्थव्यवस्था और अधिक लालफीताशाही, लाइसेंस-कोटा और केंद्रीकृत नियंत्रण के जाल में फंस गई।
इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी ने सत्ता संभाली, लेकिन उनकी नीतियों में भी बड़े आर्थिक सुधार और निजी क्षेत्र को सशक्त करने की दिशा में सीमित पहल हुई। इस कालखंड में भारत की औसत आर्थिक विकास दर कभी 3.4% से अधिक नहीं रही। उत्तर प्रदेश और मध्यप्रदेश जैसे राज्य उस समय विशेष रूप से पिछड़े और बिमारू थे। कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों की सरकारों ने विकास को प्राथमिकता नहीं दी।
1991 में यदि गांधी परिवार का कोई प्रधानमंत्री होता, तो देश में आर्थिक सुधार कभी संभव नहीं हो पाते। उस समय कांग्रेस के प्रिय साथी कम्युनिस्ट आर्थिक सुधारों का पुरजोर विरोध कर रहे थे, जबकि अटल बिहारी वाजपेयी ने आर्थिक सुधारों का समर्थन किया। इसने स्पष्ट किया कि कांग्रेस नेतृत्व और उसके सहयोगी दल देश की आर्थिक स्थिरता और विकास में बाधक बने रहे।
हमारे मध्यप्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह ने स्वयं कहा था कि “चुनाव विकास से नहीं, बल्कि मैनेजमेंट से जीते जाते हैं।”
आज कांग्रेस पूरी तरह वामपंथी हो चुकी है। 2024 के कांग्रेस घोषणापत्र में वही एजेंडे हैं, जो नव वामपंथ के हैं—अर्थव्यवस्था को तबाह करना, परिवार और समाज व्यवस्था को तहस-नहस करना, LGBTQ जैसी अवधारणाओं का प्रसार करना, और जाति आधारित विभाजनकारी योजनाओं को बढ़ावा देना। ऐसे एजेंडे स्पष्ट रूप से यह दर्शाते हैं कि कांग्रेस मित्र मंडली वाले पूंजीवाद का विरोध करती है और वास्तविक आर्थिक सुधारों से बचती रही है।
वास्तव में हिंदू आर्थिक चिंतन विकेंद्रीकृत था। उस समय भारत की अर्थव्यवस्था सरकारी हस्तक्षेप से मुक्त थी और वैश्विक अर्थव्यवस्था में उसका योगदान लगभग 33% था। आज के कांग्रेस नेतृत्व को साहस दिखाना चाहिए और पूरे देश की अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करना चाहिए। पूंजीवादी आर्थिक मॉडल तभी सफल होता है जब इसमें सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम हो। 1970 के दशक में भारत में आर्थिक सुधार शुरू होने चाहिए थे, लेकिन वास्तविक सुधार 1991 में ही शुरू हो सके। कृषि, उद्योग और सेवा क्षेत्रों में व्यापक सुधार अभी भी आंशिक ही हैं। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी ने 2021 में कृषि सुधार लागू करने का प्रयास किया, जिसे कांग्रेस ने रोकने का प्रयास किया।
कम्युनिस्ट और साम्यवादी पूंजीवाद में अर्थव्यवस्था तबाह हो जाती है। गरीब और गरीब होते जाते हैं, केवल सत्ता-समर्थक वर्ग अपनी जेबें भरता है। ऐसे मॉडल में न केवल आर्थिक बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक विनाश भी होता है—सेम-सैक्स विवाह, हिंदू परिवार व्यवस्था का विखंडन, धर्म और त्योहारों के प्रति विश्वास को कमजोर करना, और अर्थव्यवस्था पर चोट करना। यही वह “कम्युनिस्ट पूंजीवाद” है जिसने यूरोप और अमेरिका को भी बर्बाद कर दिया।
कांग्रेस ने 1970 से समाजवाद के नाम पर दलाली संस्कृति को बढ़ावा दिया। उदाहरण के लिए, राजीव गांधी ने लाल किले से अपने भाषण में कहा कि “हम दिल्ली से एक रुपये भेजते हैं, उसमें से केवल 15 पैसे ही पहुँचते हैं, बाकी 85 पैसे विचौलियों द्वारा खा जाते हैं।” राहुल गांधी के समर्थक आज मित्र मंडली वाले पूंजीवाद का आरोप लगाते हैं, लेकिन वे भूल जाते हैं कि नेहरू जी के समय से “गरीबी हटाओ” का नारा चलता रहा, और कांग्रेस 1947 से 2014 तक 60 वर्षों तक सत्ता में रहते हुए भी गरीबी को कम नहीं कर पाई।
मित्र मंडली वाले पूंजीवाद का आरोप लगाने वाले भूल जाते हैं कि कांग्रेस के बड़े नेता बड़े उद्योगपतियों से गुपचुप मिलते और समाजवादी होने का दावा करते थे। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी जी द्वारा उद्यमियों का सार्वजनिक समर्थन करने पर इसे क्रोनी कैपिटलिज्म कह दिया जाता है, जबकि असली मित्र मंडली वाला पूंजीवाद कांग्रेस और उसके सहयोगी दलों के शासन में चलता रहा।
1990 के बाद बीजेपी कई राज्यों में लंबे समय तक सत्ता में रही। केंद्र में अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार (1999–2004) और नरेंद्र मोदी जी की सरकार (2014–अब तक) ने देश की अर्थव्यवस्था, अवसंरचना, स्वास्थ्य, शिक्षा, मेक इन इंडिया, नई शिक्षा नीति और सांस्कृतिक पुनर्जागरण में अभूतपूर्व योगदान दिया। बीजेपी ने कभी आर्थिक सुधारों का विरोध नहीं किया, बल्कि हमेशा उनका समर्थन किया। आज मध्यप्रदेश और उत्तर प्रदेश जैसे राज्य तेजी से विकास की राह पर हैं।
कांग्रेस के समर्थक यह कहकर स्वयं ही यह सिद्ध कर रहे हैं कि कांग्रेस की वही विकास-विरोधी मानसिकता आज भी मौजूद है, जो 1960 के दशक में थी। इसमें कोई वास्तविक परिवर्तन नहीं हुआ है। यह वही पुरानी बोतल है, जिसमें नई शराब परोसने का प्रयास किया जा रहा है—लोगों को भ्रमित करने और मूर्ख बनाने के लिए।
यदि कांग्रेस नेतृत्व में यह साहस है, तो 2029 के घोषणापत्र में इसे स्पष्ट रूप से शामिल किया जाना चाहिए कि वे सत्ता में आने पर अर्थव्यवस्था को सरकारी नियंत्रण से मुक्त करेंगे और निजीकरण को बढ़ावा देंगे। उन्हें यह स्पष्ट करना चाहिए कि वे कम्युनिज्म और सम्मवादी समाजवादी सिद्धांतों को पूरी तरह त्याग चुके हैं। अन्यथा, यह केवल जनता के साथ छल और भ्रम का खेल होगा, जिसमें वास्तविक आर्थिक सुधार और विकास की राह अवरुद्ध रहती है।
भारत की वास्तविक समृद्धि और स्थिरता तभी संभव है, जब अर्थव्यवस्था में निजी उद्यम, प्रतिस्पर्धा और विकेंद्रीकृत विकास को प्रोत्साहन मिले, और समाजवाद या साम्यवाद के पुराने या नए रूपों से पूरी तरह मुक्त होकर नीति बनाई जाए।
आज भारत के सामने केवल आर्थिक सुधार की आवश्यकता ही नहीं, बल्कि वैचारिक और रणनीतिक सतर्कता की भी मांग है। यदि हमारी नीतियाँ केंद्रीकृत नियंत्रण और बाहरी विचारधाराओं के प्रभाव में रहकर बनाई जाएँ, तो वे केवल भ्रम, अस्थिरता और सामाजिक विखंडन को जन्म देंगी। इसलिए असली परिवर्तन तभी संभव है जब हमारी सोच, हमारी नीतियाँ और हमारी विकास योजनाएँ स्वतंत्र, विवेकपूर्ण और सनातन मूल्यपरक दृष्टि से संचालित हों।
यही मार्ग है, जो भारत को वास्तविक समृद्धि, स्थिरता और आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर करेगा। केवल आर्थिक ही नहीं, बल्कि सामाजिक और सांस्कृतिक मजबूती भी तभी सुनिश्चित होगी जब परिवार व्यवस्था, धर्म, ग्राम-आधारित संरचनाएँ और सांस्कृतिक मूल्यों की रक्षा सुनिश्चित हो। यही चेतावनी और मार्गदर्शन है जो हमारे देश के समृद्ध और सतत् भविष्य के लिए अनिवार्य है।
✍️दीपक कुमार द्विवेदी
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