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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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तिरंगा यात्रा के शोर में विभाजन-पीड़ित हिंदुओं की वेदना बार-बार उठती है, परंतु हर बार शोर-गुल में गुम हो जाती है। बीते अस्सी वर्षों से यही होता आया है। क्या हम गाँव-गाँव में अखंड भारत संकल्प दिवस नहीं मना सकते? क्या हर नगर और गाँव में विभाजन विभिषिका दिवस की स्मृति जीवित न रखी जाए? जब तक हम अपने इतिहास की पीड़ा और विभाजन के घाव को नहीं समझेंगे, तब तक पूर्ण स्वतंत्रता का बिगुल कैसे फूँक पाएँगे?
आज हम स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर खड़े हैं। कल देश उल्लास से तिरंगा फहराएगा, किंतु हमें स्मरण रखना चाहिए कि हमारी स्वतंत्रता अभी अधूरी है। पिछले सहस्र वर्षों में इस्लामी आक्रांताओं ने हमारे भूभाग छीन लिए, और 1947 का विभाजन उस घाव को और गहरा कर गया। उस विभाजन में असंख्य हिंदुओं का नरसंहार हुआ, करोड़ों विस्थापित हुए और मातृशक्ति की अस्मिता को रौंदा गया। क्या हम इस पीड़ा को भुलाकर केवल उत्सव मना सकते हैं?
आज भारत पर बाहरी और भीतरी दोनों प्रकार के खतरे मँडरा रहे हैं। चर्च-प्रेरित धर्मांतरण, इस्लामी जिहाद, भाषा, जाति और क्षेत्रवाद पर आधारित राजनीति—ये सब मिलकर हिंदू समाज को खंडित करने में लगे हैं। कल्चरल मार्क्सवाद परिवार और संस्कृति पर हमला कर रहा है, वोकिज़्म समाज में असंस्कार और असंयम की विचारधारा भर रहा है, और ग्लोबल मार्केट फोर्सेज इन सबको संरक्षण और पोषण दे रही हैं। ये सभी शक्तियाँ मिलकर भारत की आत्मा—सनातन धर्म—को नित्य छलनी कर रही हैं।
सबसे दुखद यह है कि भारत की राजनीति स्वयं इस देश की आत्मा को ही नकारने लगी है। आज कुछ नेता डेंगू–मलेरिया जैसी संज्ञाओं का सहारा लेकर सनातन धर्म के उन्मूलन की बात करते हैं और इस वामपंथी इकोसिस्टम को कांग्रेस सहित अनेक शक्तियाँ मौन या प्रकट समर्थन देती हैं। जब भारत की आत्मा—सनातन धर्म—को समाप्त करने की बातें खुलेआम की जाती हैं और उसे एक वर्ग द्वारा मौन स्वीकृति मिलती है, तब भी यदि हिंदू समाज प्रतिकार न करे तो यह भविष्य के लिए अत्यंत घातक होगा। यदि हिंदू समाज पुनः मौन रहा, तो वही आक्रमण और वही विध्वंस दोहराया जाएगा जो बीते हजार वर्षों में इस राष्ट्र और उसकी आत्मा पर हुआ था।
सनातन धर्म ही वह जीवनधारा है, जो भारत को उत्तर से दक्षिण और पूर्व से पश्चिम तक एक सूत्र में बाँधती है। किंतु आज इसे अनेक दिशाओं से चोट पहुँचाई जा रही है—भाषा, जाति, क्षेत्रवाद, धर्मांतरण, इस्लामी जिहाद, कल्चरल मार्क्सवाद, ग्लोबल मार्केट फोर्सेज और वोकिज़्म जैसे वैचारिक तथा सांस्कृतिक हमले निरंतर भारत की आत्मा को छलनी कर रहे हैं। इन चुनौतियों का सामना किए बिना भारत की पूर्ण स्वतंत्रता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण असंभव है।"
ऐसे समय में केवल स्वतंत्रता दिवस का उल्लास मनाना पर्याप्त नहीं है। हमें विभाजन की विभिषिका को स्मरण रखना होगा, अखंड भारत के संकल्प को जीवित रखना होगा और भारत पर हो रहे इन चौतरफा आक्रमणों का संगठित प्रतिकार करना होगा।
अतः समय की माँग है कि हम पुनः एक महान संग्राम के लिए तैयार हों—ऐसा संग्राम जो केवल राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक स्तर पर लड़ा जाए। यही संघर्ष भारत की पूर्ण स्वतंत्रता का मार्ग प्रशस्त करेगा और आने वाली पीढ़ियों के लिए सनातन धर्म की ज्योति को सुरक्षित रखेगा।
हमें यह दृढ़ संकल्प करना होगा कि—
जहाँ सनातन धर्म का उत्थान होगा, वहीं भारत का उत्थान होगा।
और जहाँ सनातन धर्म का पतन होगा, वहीं भारत का पतन होगा।
अब समय आ गया है कि स्वतंत्रता का यह पर्व केवल उत्सव न बनकर पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम का उद्घोष बने। यह संग्राम केवल खोए हुए भूभाग को पुनः प्राप्त करने का ही नहीं, बल्कि धर्मांतरण, जिहाद, जातिवाद, क्षेत्रवाद, कल्चरल मार्क्सवाद, वोकिज़्म और वैश्विक बाज़ार शक्तियों से अपने समाज और संस्कृति को मुक्त कराने का भी है।
हम संकल्प लेते हैं—अखंड भारत के स्वप्न को साकार करेंगे।
पूर्ण स्वतंत्रता के लिए नव-संग्राम की शुरुआत अब होगी।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी
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