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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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आज हम चर्चा करेंगे सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था और पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम के बारे में। हम चर्चा करेंगे कि कैसे सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था आजकल की पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम से हर पैमाने पर बेहतर थी। हम जानेंगे कि आजकल की पूंजीवादी व्यवस्था सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था को क्यों और कैसे तोड़ रही है, और यह क्यों चाहती है कि व्यक्ति का कोई परिवार न हो।
मित्रों, सनातन भारत में संयुक्त परिवार व्यवस्था चलती थी। इस परिवार व्यवस्था में चाचा का परिवार, ताऊ का परिवार आदि सब एक साथ रहते थे। परिवार के साथ-साथ व्यापार, धंधा, खेती आदि भी सांझा होती थी। बड़ा परिवार होने के कारण सब एक-दूसरे के दुःख-सुख के साझेदार थे। पुरुष लोग उद्योग, धंधा, खेती-बाड़ी आदि संभालते थे और महिलाएं घर संभालती थीं।
आजकल पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम में हर व्यक्ति, चाहे महिला हो या पुरुष, अकेले रहता है। हर महिला और पुरुष 9 से 5 की नौकरी करता है। अपना कमाता है, अपना खाता है। अमेरिका, कनाडा, ऑस्ट्रेलिया, इंग्लैंड और यूरोप जैसे पूंजीवादी देशों में अधिकतर लोग नो फैमिली सिस्टम में रहते हैं। इन देशों में जहां पूरी तरह पूंजीवादी व्यवस्थाएं चल रही हैं, वहां केवल अमीर लोग ही विवाह के बंधन में बंधते हैं, परंतु इनके विवाह भी टूटते रहते हैं। बार-बार तलाक होने से इनका परिवार बहुत ही कम बन पाता है। ये विवाह भी DINK (DOUBLE INCOME NO KIDS ONLY SEX) के सिद्धांत पर आधारित होते हैं। इन देशों में एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित है कि यहाँ तीन W कभी पक्की नहीं होती — WIFE, WEALTH और WEATHER।
सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था और पूंजीवादी परिवार व्यवस्था का आधार
सबसे पहले हम सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था के आधार के बारे में जान लेते हैं। संयुक्त परिवार व्यवस्था त्याग के सिद्धांत पर आधारित थी। आपका परिवार तभी बन सकता है, जब आप में त्याग करने की क्षमता हो। बिना त्याग के परिवार की कल्पना करना भी मूर्खता है। माँ जब बच्चे को जन्म देती है, तो उसे बहुत कष्ट उठाने पड़ते हैं। किसी बच्चे की सही परवरिश करना दुनिया का सबसे कठिन कार्य है। माता-पिता अपने सुख-चैन, रातों की नींद और अपनी बहुत सारी इच्छाएं मारते हैं, तभी बच्चे की सही परवरिश होती है।
इस तरह सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था में अगर कोई भाई कम भी कमाता था, तो भी अन्य भाई पूरी तरह उसके परिवार की देखभाल करते थे। इस प्रकार सनातन परिवार व्यवस्था का मुख्य आधार त्याग था, जो इस व्यवस्था को मजबूत बनाए रखता था। सनातन परिवार व्यवस्था भारत के इस सिद्धांत पर आधारित थी कि "जो आया है वह खाएगा", जबकि पश्चिम में यह अवधारणा है कि "जो कमाएगा वही खाएगा।"
दूसरी तरफ, पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम का मुख्य आधार ENJOY (आनंद) है। रूसो, जो यूरोप का एक बड़ा दार्शनिक था, अपनी पुस्तक में लिखता है कि व्यक्ति का जन्म आनंद करने के लिए हुआ है और बच्चे इस आनंद में बाधक हैं। पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम में विवाह के स्थान पर LIVE IN RELATIONSHIP नाम का एक अस्थायी गठजोड़ चलता है। इसमें एक MALE PARTNER और FEMALE PARTNER बिना किसी जिम्मेदारी के एक-दूसरे के साथ रहते हैं। इस LIVE IN RELATIONSHIP का मुख्य आधार Only Sex without any responsibility है।
उदाहरण के लिए, मान लीजिए एक MALE PARTNER और एक FEMALE PARTNER LIVE IN RELATIONSHIP में रहते हैं, दोनों 9 से 5 की नौकरी करते हैं। मान लीजिए MALE PARTNER की नौकरी चली गई, तो FEMALE PARTNER उसकी देखभाल नहीं करेगी। LIVE IN RELATIONSHIP की व्यवस्था में दोनों खर्च बराबर बांटते हैं। एक के धन पर दूसरे का अधिकार नहीं होता। इसलिए MALE PARTNER की नौकरी चली जाने पर FEMALE PARTNER नया कोई LIVE IN PARTNER ढूंढ लेती है। यह तो एक उदाहरण है, इसके अलावा भी कई कारण होते हैं, जिनकी वजह से LIVE IN RELATIONSHIP अक्सर थोड़े समय के लिए रहता है।
LIVE IN RELATIONSHIP में यह जरूरी नहीं कि एक पार्टनर पुरुष हो और दूसरा महिला, दोनों पुरुष भी हो सकते हैं, दोनों महिला भी हो सकती हैं। दूसरी ओर सनातन परिवार व्यवस्था में पति और पत्नी का एक-दूसरे की संपत्ति पर पूरा अधिकार होता था। पति और पत्नी का संबंध जन्म-जन्मांतर का होता था।
LIVE IN RELATIONSHIP में मान लीजिए MALE PARTNER को कोई बीमारी लग गई, तो FEMALE PARTNER उसे छोड़ सकती है। दूसरी तरफ सनातन विवाह प्रणाली में अगर पति को कोई गंभीर बीमारी, जैसे कैंसर, हो भी जाए तो पत्नी उसकी सेवा करती है। यदि पत्नी को कोई गंभीर बीमारी हो जाए तो पति उसकी देखभाल करता है। इसलिए संस्कृत या हिंदी में DIVORCE या तलाक का शब्द नहीं है। DIVORCE अंग्रेज़ी का शब्द है और तलाक उर्दू-अरबी भाषा का। इस प्रकार पूंजीवादी परिवार व्यवस्था का मुख्य आधार आनंद है।
बच्चों की स्थिति
पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम का मुख्य आधार आनंद है, और बच्चे आनंद में बाधक होने के कारण LIVE IN RELATIONSHIP जैसी अस्थायी व्यवस्था में पहले तो बच्चे पैदा ही नहीं होते, और अगर बच्चे पैदा भी हो जाते हैं तो अक्सर ना तो MALE PARTNER और ना ही FEMALE PARTNER उनकी जिम्मेदारी लेते हैं। इसलिए ऐसे बच्चे अनाथ आश्रम, जिन्हें कॉन्वेंट कहते हैं, में डाल दिए जाते हैं। अगर पूंजीवादी व्यवस्था में किसी का विवाह हो भी गया और बच्चे हो गए तो माता-पिता का जल्द ही तलाक हो जाता है। इस अवस्था में बच्चे या तो माता के पास रहते हैं या पिता के पास। इस व्यवस्था को पूंजीवादी सिस्टम में SINGLE PARENT FAMILY कहा जाता है। पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम में बच्चों की स्थिति बड़ी ही दयनीय होती है। बच्चे अनाथालयों, सड़कों पर, SINGLE PARENT FAMILY द्वारा या सरकार के अधीन पाले जाते हैं। पश्चिमी देशों में, जैसे यूरोप, अमेरिका आदि, बच्चों की देखभाल सरकार ही करती है।
कुछ लोग कहते हैं कि भारत में भी यह व्यवस्था लागू होनी चाहिए। पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम में बच्चे जो भाग्यशाली होते हैं, वे SINGLE PARENT FAMILY में रहते हैं, जहां उन्हें माता या पिता का पूरा प्यार और देखभाल नहीं मिलती। इस कारण बच्चे अवसाद, डिप्रेशन, अपराध और नशे जैसी समस्याओं का शिकार होते हैं।
दूसरी ओर सनातन परिवार व्यवस्था में बच्चों के बिना परिवार की कल्पना भी व्यर्थ थी। माता-पिता, दादा-दादी, नाना-नानी, चाचा-चाची, मामा-मामी, ताया-ताई, मौसा-मौसी, बुआ-फूफा आदि बच्चे के होने पर अत्यंत प्रसन्न होते थे और सभी बच्चे की देखभाल करते थे। सनातन परिवार व्यवस्था में बच्चा कभी अवसाद या डिप्रेशन का शिकार नहीं होता था। अगर बच्चे के माता-पिता का किसी कारणवश देहांत हो जाता था, तो भी सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था में बच्चे का कोई न कोई रिश्तेदार उसकी परवरिश करता था। बच्चे बोझ नहीं, बल्कि परिवार की रीढ़ थे।
कुछ लोग पश्चिम के नो फैमिली सिस्टम की बड़ी तारीफ करते हैं कि वहां बच्चों की पूरी जिम्मेदारी सरकार उठाती है, पर उन्हें यह नहीं पता कि वहां सरकार की क्या मजबूरी होती है। आपने अपनी सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था जैसी श्रेष्ठ व्यवस्था छोड़कर पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम को अपना लिया है, जबकि कई लोग इस सच्चाई से अनजान हैं
बुजुर्गों की स्थिति
पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम में बुजुर्गों की स्थिति बहुत दयनीय होती है। बुजुर्ग अपनी जमा पूंजी और सरकार पर निर्भर रहते हैं। बुजुर्ग अकेलेपन के शिकार होते हैं। कई बार बुजुर्गों की लाश कई महीनों बाद मिलती है। कई बुजुर्गों के केवल अस्थि-पिंजर मिलते हैं। कुछ लोग इस व्यवस्था को भारत में भी लागू करना चाहते हैं कि परिवार छोड़कर बुजुर्गों की देखभाल सरकार करे।
संयुक्त परिवार व्यवस्था में बुजुर्ग परिवार पर भार नहीं थे, बल्कि उनकी सेवा और देखभाल की जाती थी। यदि किसी परिवार में बुजुर्गों की देखभाल ठीक नहीं होती थी तो समाज द्वारा उस परिवार का बहिष्कार और तिरस्कार किया जाता था। इसलिए कोई भी व्यक्ति इतनी हिम्मत नहीं करता था कि अपने माता-पिता या दादा-दादी की सेवा न करे। सनातन भारत में Insurance, Life Insurance, Pension Plans, Medical Insurance आदि की कोई जरूरत नहीं थी। परिवार व्यवस्था ही सामाजिक सुरक्षा प्रदान करती थी।
पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम में हर व्यक्ति के पास Life Insurance, Pension Plans, Medical Insurance होना आवश्यक है, क्योंकि बीमार पड़ने पर परिवार से देखभाल नहीं मिलती। बुढ़ापे में आय न होने पर सरकार या बीमा कंपनियों पर निर्भर रहना पड़ता है।
रोजगार
सनातन भारत में एक प्रसिद्ध कहावत प्रचलित थी — "उत्तम खेती, मध्यम व्यापार, नीच नौकरी"। इसका अर्थ था कि किसान केवल भगवान पर आश्रित था, इसलिए खेती उत्तम मानी गई। व्यापारी भगवान और ग्राहक पर आश्रित होता था, इसलिए उसे मध्यम कहा गया। नौकरी को नीच इसलिए कहा गया क्योंकि नौकर हर तरह से दूसरे पर आश्रित होता है।
सनातन परिवार व्यवस्था का दूसरा मुख्य आधार खेती या परिवार का अपना काम-धंधा था। अपनी खेती या उद्योग होने के कारण परिवार के नौजवानों को नौकरी के लिए बाहर नहीं जाना पड़ता था। अगर कोई भाई कम कार्यकुशल भी होता था तो परिवार के काम में उसे समायोजित कर लिया जाता था। नौजवान माता-पिता व भाई-बहनों से काम के गुर सीखते थे। इसी कारण सनातन परिवार व्यवस्था में कार्यकुशलता पीढ़ी दर पीढ़ी हस्तांतरित होती थी। इसी वजह से भारत सन 1700 तक विश्व का सबसे अमीर देश था। अंग्रेजों के आने के बाद भारत में पूंजीवादी व्यवस्थाएं थोपी गईं, जिनके कारण भारत गरीब देशों में शामिल हो गया।
दूसरी ओर पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम में परिवार न होने के कारण परिवारिक काम-धंधा नाममात्र का है। व्यक्ति को नौकरी की तलाश और नौकरी करने के लिए दूर-दूर जाना पड़ता है। कई बार नौकरी अलग-अलग देशों में मिलती है। उदाहरण के लिए, पति और पत्नी अलग-अलग शहरों में नौकरी करते हैं, जैसे पत्नी अहमदाबाद में आयकर अधिकारी और पति दिल्ली में आईएएस अधिकारी। ऐसे में दोनों महीनों तक नहीं मिल पाते। धीरे-धीरे दोनों को एक-दूसरे की ज़रूरत महसूस नहीं होती और मामूली झगड़ा तलाक तक पहुंच जाता है। पूंजीवादी व्यवस्था परिवार को समर्थन नहीं देती।
सनातन संयुक्त परिवार व्यवस्था के टूटने के कारण
पूंजीवादी Information Warfare
पूंजीवादी व्यवस्थाओं के फैलाव में सूचना युद्ध (Information Warfare) का बड़ा योगदान है। विश्व को दो तरह की शक्तियों से नियंत्रित किया जाता है — एक Soft Power, दूसरी Hard Power। Hard Power में सैन्य, न्यायपालिका, पुलिसिंग आदि आते हैं, जो सरकार के पास होती हैं। Soft Power के मुख्य स्रोत हैं — टीवी, फिल्में, समाचार पत्र आदि। इन माध्यमों से धीरे-धीरे लोगों का ब्रेनवॉश किया जाता है। फिल्मों में बड़े परिवार को घटिया दिखाया जाता है, अपना काम-धंधा करने वालों को अनपढ़ और कमजोर दिखाया जाता है।
सनातन परिवार व्यवस्था का मुख्य आधार स्त्री थी, जो परिवार की जड़ थी। नारी मुक्ति के आंदोलन ने धीरे-धीरे स्त्रियों को प्रेरित किया कि परिवार उनके लिए गुलामी है, इसलिए विद्रोह करना चाहिए। फिल्मों और टीवी धारावाहिकों में LIVE IN RELATIONSHIP को भली-भांति प्रस्तुत किया जाता है, जबकि इसकी बुराइयों को नहीं दिखाया जाता। नशे, ओपन सेक्स आदि को भी बढ़ावा दिया जाता है। उदाहरण के लिए फिल्म 'पिंक' जिसमें तीन लड़कियां पैसे के लिए अपना जिस्म बेचती हैं, उसे महिमामंडित किया गया है और वह कई पुरस्कार भी जीतती है। सूचना युद्ध के माध्यम से पूंजीवादी व्यवस्थाओं के काले पक्ष को छुपा दिया जाता है।
पूंजीवादी न्याय व्यवस्था
आज की पूंजीवादी न्याय व्यवस्था ने सनातन परिवार को तोड़ने के लिए इतने कड़े कानून बना दिए हैं कि विवाह करने वाले हर व्यक्ति को डर रहता है कि किसी छोटे झगड़े पर जेल न चला जाए। इससे लोगों का विवाह से विश्वास उठ गया है। ये कड़े कानून सनातन परिवार व्यवस्था के विघटन का मुख्य कारण हैं।
पूंजीवादी Land Management System
सनातन भारत में शिक्षा, चिकित्सा, न्याय और काम करने के लिए जमीन बिलकुल मुफ्त थी। जमीन की मालिकाना हक भगवान के पास था, इसलिए भूमि की खरीद-फरोख्त नहीं होती थी। लाल डोरा या लाल लकीर के अंदर की जमीन की रजिस्ट्री नहीं होती क्योंकि वे इलाके मुसलमानों के आने से पहले बसे हुए थे।
पूंजीवादी व्यवस्था में जमीन की खरीद-फरोख्त होने लगी और अधिकतम सीमा न होने के कारण ज़मीन कुछ लोगों तक सीमित हो गई। गरीबों के लिए जमीन उपलब्ध नहीं रहती। यदि कोई उद्योग शुरू करना चाहता है तो महंगी जमीन खरीदनी पड़ती है। इसलिए लोग नौकरी की तरफ जाते हैं, जिससे संयुक्त परिवार व्यवस्था का स्थान धीरे-धीरे पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम ले रहा है।
पूंजीवादी Processing Systems
सनातन प्रोसेसिंग सिस्टम जैसे गुड के कुल्हाड़, चक्कियां आदि के स्थान पर पूंजीवादी प्रोसेसिंग सिस्टम जैसे चीनी मिलें, आटा मिलें आईं। बड़े कारखाने छोटे उद्योगों की जगह लेने लगे जिससे बेरोजगारी बढ़ी। इसके कारण लोग नौकरी के लिए दूर-दूर जाते हैं। इस प्रकार स्व-रोजगार, जो सनातन परिवार व्यवस्था की रीढ़ थी, कमजोर पड़ा और सनातन परिवार व्यवस्था खत्म हो रही है। अगले दस-बीस वर्षों में पूंजीवादी नो फैमिली सिस्टम भारत में पूरी तरह हावी हो जाएगा।
पूंजीवादी व्यवस्थाओं में जीवित रहने की ऊँची लागत
आजकल पूंजीवादी व्यवस्था में जीवित रहने की लागत बहुत ऊँची है। सनातन भारत में शिक्षा, चिकित्सा, न्याय और जमीन मुफ्त थी। आज इन पर लगभग 90% आय खर्च हो जाती है। अगर ये चारों मुफ्त हो जाएं, जैसा सनातन व्यवस्था में था, तो जीवन की लागत कम हो जाएगी। ऊँची लागत के कारण केवल अमीर लोग ही परिवार बसा पाते हैं। इसलिए पश्चिमी देशों में केवल अमीर ही विवाह करते हैं। भारत में भी जल्द ही यही स्थिति होगी।
सनातन परिवार व्यवस्था के टूटने से पूंजीवादी कंपनियों को होने वाले लाभ
आजकल की पूंजीवादी व्यवस्था परिवार व्यवस्था का समर्थन नहीं करती। पूंजीवादी जोर देते हैं कि लोग अपनी आवश्यकताएं बाजार से खरीदें ताकि कंपनियों को लाभ मिले। अमेरिका में केवल 10% लोग घर पर खाना बनाते हैं, जबकि भारत में सनातन परिवार व्यवस्था के कारण लगभग 90% लोग घर पर खाना बनाते हैं।
भारत में भी कंपनियों को उम्मीद है कि जैसे-जैसे सनातन परिवार टूटेगा, लोग मजबूरी में बाहर से खाना खरीदेंगे। इसलिए ज़ोमैटो और स्विगी जैसी फूड डिलीवरी कंपनियों का मार्किट वैल्यू करोड़ों में है। बीस साल पहले तक भारत के घरों में कई चीजें जैसे कोटि, स्वेटर, शाल, अचार, मुरब्बा आदि घर में बनती थीं, अब बाजार से खरीदने लगी हैं। जल्द ही भारत भी अमेरिका की तरह होगा।
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