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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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कांग्रेसी और वामपंथी इस्लामी इको-सिस्टम से जुड़े लोग अक्सर एक ही रट लगाते हैं—वे कहते हैं कि भारत के विभाजन के लिए हिंदुवादी संगठन जिम्मेदार थे और द्विराष्ट्र सिद्धांत वीर सावरकर का था। इसी आधार पर यह भी प्रचारित किया जाता है कि हिंदू महासभा ने मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर लिया था, इसलिए सारा दोष सावरकर पर ही आता है।
नेहरू और गांधी उस समय कहते थे—देश का विभाजन हमारी लाश पर होगा। लेकिन जब वास्तविकता सामने आई तो वही नेहरू, हिंदुत्ववादी विचारों को किनारे कर, भारत को सेकुलर राष्ट्र घोषित कर बैठे। उनका मानना था कि वे प्रधानमंत्री बनने के लिए सबसे योग्य हैं, क्योंकि वे पढ़े-लिखे और आधुनिक दृष्टिकोण वाले थे।
इस निर्णय को वामपंथी इको-सिस्टम बार-बार इस रूप में प्रस्तुत करता है कि नेहरू ने भारत को धर्मनिरपेक्ष बनाकर यह सिद्ध कर दिया कि हिंदू और मुस्लिम एक साथ रह सकते हैं।
लेकिन इस कथन के भीतर गहरी चालाकी छिपी है। जो लोग स्वयं अपने धर्म और संस्कृति के प्रति ईमानदार नहीं हो सके, वे राष्ट्रधर्म के साथ भी घात ही करेंगे। यही कारण है कि वे तर्क और विज्ञान की आड़ लेकर हिंदू देवी-देवताओं का अपमान करते हैं और इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता बताते हैं, किंतु जब इस्लाम या ईसाइयत की कुरीतियों की बात आती है तो उनकी ज़ुबान बंद हो जाती है। हिंदू समाज की परंपराएँ उन्हें हमेशा दोषपूर्ण दिखती हैं, लेकिन अब्राहमिक मतों की विकृतियों पर वे मौन साध लेते हैं।
इतिहास के प्रसंगों को भी बार-बार तोड़ा-मरोड़ा गया है। भारत के विभाजन को वीर सावरकर से जोड़ने की कोशिश हुई, जबकि तथ्य बिल्कुल अलग हैं। दरअसल, द्विराष्ट्र सिद्धांत का बीज सबसे पहले सर सैयद अहमद खान ने 1883 में बोया था। उन्होंने साफ शब्दों में कहा था—हिंदू और मुसलमान दो अलग-अलग कौमें हैं और वे कभी एक साथ नहीं रह सकते। यही विचार आगे चलकर मुस्लिम लीग की राजनीति की नींव बना और जिन्ना ने इसे अपने राजनीतिक अस्त्र के रूप में इस्तेमाल किया। कांग्रेस ने इस सच्चाई को जान-बूझकर अनदेखा किया और दोष सावरकर पर मढ़ दिया।
सावरकर का व्यक्तित्व तो इसके बिल्कुल विपरीत था। उन्होंने कहा था—जब तुम अपने को हिंदू कहते हो, तो मैं भी अपने को हिंदू कहता हूँ; वैसे मैं तो विश्व-मानव हूँ।
ऐसे विराट दृष्टिकोण वाले व्यक्ति को द्विराष्ट्र सिद्धांत का जनक बताना इतिहास के साथ अन्याय है।
उनकी पुस्तक 1857 का स्वतंत्रता संग्राम ने भारतीयों की चेतना को जगाया और ब्रिटिश इतिहासकारों द्वारा ‘सिपाही विद्रोह’ कहे जाने वाले संघर्ष को प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के रूप में प्रतिष्ठित किया। यह वही सावरकर थे जिन्होंने काला पानी की कठोर यातनाएँ झेलीं, मोपला नरसंहार की सच्चाई सामने रखी, हिंदुत्व और हिंदू पादशाही जैसी पुस्तकें लिखीं, और अभिनव भारत जैसा संगठन खड़ा किया। यह कहना कि ऐसे तपस्वी क्रांतिकारी ने भारत के विभाजन का सिद्धांत गढ़ा था—सिर्फ़ वैचारिक हीनता-बोध का प्रमाण है।
इतना ही नहीं, उनकी मृत्यु के बाद प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी ने स्वयं उनके सम्मान में डाक टिकट जारी किया और अपने पत्र में लिखा—“वीर सावरकर शौर्य और देशभक्ति के प्रतीक थे। वे आदर्श क्रांतिकारी थे और लोग उनसे प्रेरणा लेते थे। उनके निधन ने हमसे भारत के एक महान व्यक्ति को छीन लिया है।” (पीआईबी, 26 फरवरी 1966)
सावरकर की कुछ प्रमुख कृतियाँ
मेरा आजीवन कारावास
1857 का समर
काला पानी
स्वर्णिम छः पृष्ठ
जीवन-संघर्ष
हिंदुत्व
गोमांतक
प्रतिशोध
हिंदुत्व के पंचप्राण
महामना सावरकर
इनमें से उनकी तीन पुस्तकें—हिंदुत्व, मोपला, और स्वर्णिम छः पृष्ठ—मैंने स्वयं पढ़ी हैं। इन कृतियों को पढ़कर यह और स्पष्ट हो जाता है कि वीर सावरकर को विभाजन का दोषी ठहराना न केवल ऐतिहासिक सत्य के साथ छल है, बल्कि राष्ट्र के साथ भी घोर विश्वासघात है।
भारत विभाजन और कांग्रेस–नेहरू की भूमिका
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल विदेशी शासन से मुक्ति की लड़ाई नहीं था, बल्कि यह भारत की आत्मा और उसकी सांस्कृतिक चेतना को बचाने का भी संघर्ष था। 20वीं सदी की शुरुआत में कांग्रेस में कई धाराएँ थीं। लोकमान्य तिलक जैसे नेता भारत की परंपरा और हिंदू समाज की भावनाओं को समझते थे। उनके लिए राष्ट्रीयता का अर्थ संस्कृति और आस्था से जुड़ा था। लेकिन महात्मा गांधी के आगमन के साथ कांग्रेस का स्वरूप बदलने लगा।
गांधीजी ने उद्घोष किया—“हिंदू–मुस्लिम एकता के बिना स्वतंत्रता असंभव है।” यह कथन सुनने में भले मधुर लगा, पर इसके पीछे का अर्थ हिंदू समाज के आत्मरक्षा के स्वाभाविक अधिकार का परित्याग था।
खिलाफत आंदोलन और मोपला नरसंहार
1920 में गांधीजी ने खिलाफत आंदोलन का समर्थन किया। यह आंदोलन भारत की आज़ादी के लिए नहीं, बल्कि तुर्की के खलीफा की गद्दी बचाने के लिए था। गांधीजी ने इसे राष्ट्रीय आंदोलन से जोड़ दिया और इस आधार पर हिंदू–मुस्लिम एकता की बात की।
परिणाम अत्यंत भयानक रहा। 1921 में केरल के मालाबार क्षेत्र में मोपला नरसंहार हुआ। यहाँ इस्लामी जिहादियों ने 2,500 से अधिक हिंदुओं की निर्मम हत्या की, हजारों का जबरन धर्मांतरण कराया, महिलाओं की अस्मिता लूटी और सैकड़ों मंदिर नष्ट कर दिए। वीर सावरकर ने इसे संगठित नरसंहार कहा। किंतु गांधीजी ने उन्हीं हत्यारों को “वीर स्वतंत्रता सेनानी” बताया और उनके साथ मंच साझा किया। यही कांग्रेस की मुस्लिम–तुष्टिकरण नीति की नींव थी।
डायरेक्ट एक्शन डे और विभाजन की त्रासदी
1946 में जिन्ना के डायरेक्ट एक्शन डे पर कोलकाता की गलियाँ हिंदू रक्त से लाल हो गईं। भीषण दंगे हुए, लाखों लोग विस्थापित हुए। किंतु कांग्रेस ने हिंदू समाज का नेतृत्व करते हुए कोई संगठित प्रतिकार नहीं किया।
और फिर 1947 में विभाजन हुआ। पाकिस्तान बिना युद्ध, बिना प्रतिरोध, मानो थाली में सजाकर सौंप दिया गया।
इस विभाजन की कीमत भारत को असहनीय रूप से चुकानी पड़ी—
10 लाख हिंदू–सिख मारे गए,
75,000 से अधिक स्त्रियों की अस्मिता लूटी गई,
1.4 करोड़ लोग अपने ही देश में शरणार्थी बन गए।
विडंबना यह रही कि पाकिस्तान के लिए वोट देने वाले मुसलमानों का बड़ा हिस्सा भारत में ही रह गया और कांग्रेस ने आगे की राजनीति में उनके तुष्टिकरण को स्थायी आधार बना लिया।
विभाजन का अपराध किसका था?
यह धारणा गलत है कि पाकिस्तान बनाने में केवल लाहौर, कराची या पेशावर के मुसलमान सक्रिय थे। दरअसल, विभाजन की ज़िम्मेदारी उन पढ़े–लिखे, संपन्न और प्रभावशाली मुसलमानों पर थी, जो लखनऊ, बंबई, मद्रास, अलीगढ़ और कोलकाता में रहते थे और विभाजन के बाद पाकिस्तान भी नहीं गए।
1946 के चुनाव में मुस्लिम लीग के टिकट पर 28 सांसद जीते। उन्होंने पाकिस्तान की माँग का समर्थन किया। किंतु इनमें से अधिकांश यहीं रहे और बाद में भारत की संविधान सभा के सदस्य बने। उनके पास भारत में ही हवेलियाँ, जमींदारियाँ और सम्पत्तियाँ थीं।
स्पष्ट है कि विभाजन का बोझ उन भारतीय मुसलमानों की राजनीति और मतों पर था, जिन्होंने मुस्लिम लीग का साथ दिया। यदि ऐसा न हुआ होता तो विभाजन टल सकता था और लाखों जानें बच जातीं। परंतु इनमें से बहुत कम ने पाकिस्तान जाने का विकल्प चुना।
नेहरू की प्रधानमंत्री पद तक की यात्रा
कांग्रेस और उसके समर्थक यह प्रचार करते रहे हैं कि नेहरू अपनी योग्यता के कारण प्रधानमंत्री बने। लेकिन ऐतिहासिक तथ्य कुछ और ही कहते हैं।
1946 में कांग्रेस अध्यक्ष का चुनाव हुआ। यह तय था कि जो अध्यक्ष बनेगा, वही स्वतंत्र भारत का प्रधानमंत्री होगा। लगभग सभी प्रांतीय कांग्रेस समितियों ने सरदार पटेल का समर्थन किया। नेहरू को किसी प्रांत से नामांकन नहीं मिला। लेकिन गांधीजी ने हस्तक्षेप किया। उनके दबाव में पटेल पीछे हटे और नेहरू प्रधानमंत्री बनाए गए।
संविधान और समाजवाद–पंथनिरपेक्षता की बहस
नेहरू को विजनरी प्रधानमंत्री के रूप में प्रस्तुत किया जाता है, किंतु संविधान सभा की कार्यवाही एक अलग तस्वीर दिखाती है।
डॉ. भीमराव अंबेडकर ने प्रस्तावना में समाजवाद और पंथनिरपेक्षता जैसे शब्द जोड़ने का कड़ा विरोध किया। उनका स्पष्ट कहना था—
“धर्मनिरपेक्षता संविधान की संरचना में अंतर्निहित है। इसे अलग से लिखना निरर्थक है। राज्य की नीति समय और परिस्थिति के अनुसार जनता तय करेगी। संविधान पर किसी एक विचारधारा की मुहर लगाना लोकतंत्र को नष्ट कर देगा।”
अंबेडकर का मानना था कि संविधान भावी पीढ़ियों पर किसी विशेष सामाजिक–आर्थिक विचारधारा को थोपने का माध्यम नहीं होना चाहिए। किंतु आपातकाल के दौरान 42वें संशोधन से यह शब्द प्रस्तावना में जोड़ दिए गए। उस समय न तो विपक्ष खुलकर बोल पा रहा था, न ही प्रेस स्वतंत्र था। यही कारण है कि इसे मिनी–कांस्टीट्यूशन कहा गया।
नेहरू की आर्थिक नीतियाँ
नेहरू की समाजवादी आर्थिक नीतियों ने भारत की प्रगति की गति रोक दी। उद्योग–व्यापार पर अत्यधिक नियंत्रण, लाइसेंस–परमिट राज और राज्य–नियंत्रित अर्थव्यवस्था ने भारत को वर्षों तक पिछड़ा बनाए रखा। परिणाम इतना गंभीर था कि 1990 में भारत को अपनी अर्थव्यवस्था बचाने के लिए विदेशी बैंकों में सोना तक गिरवी रखना पड़ा।
फिर भी राजनीतिक विमर्श में नेहरू को दूरदर्शी नेता के रूप में प्रस्तुत किया जाता रहा।
भारत का संविधान और सेकुलरिज़्म की विडंबना
भारत के संविधान को नेहरू ने जिस रूप में ढाला, वह मूलतः एक नास्तिक, साम्यवादी और पश्चिम प्रेरित विचारधारा पर आधारित था। महर्षि अरविंदो ने स्पष्ट कहा था कि भारत का अस्तित्व केवल सनातन धर्म से ही संभव है। उत्तरपाड़ा में दिए गए अपने ऐतिहासिक भाषण में उन्होंने कहा था कि जब-जब सनातन धर्म का उत्थान होता है, भारत का उत्थान होता है; और जब इसकी अवनति होती है, भारत का पतन भी अवश्य होता है।
भारत का आधार सदैव सनातन वैदिक धर्म और उसकी परंपराएँ रही हैं। यह वही संस्कृति है जो मातृभूमि को माँ समान मानती है, जिसने राजा मनु, राजा पृथु, राजा रघु जैसे आदर्श शासकों को जन्म दिया। यही वह भूमि है जिसे राम और कृष्ण ने अपने रक्त से सींचा और महान ऋषियों ने अपने तप व ज्ञान से प्रकाशित किया। यहाँ हजारों मत, पंथ और संप्रदाय विकसित हुए, यहाँ तक कि चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन को भी स्थान मिला। वेद, उपनिषद, पुराण और लोक परंपराओं की विशाल परंपरा ने पूरी मानवता को मार्गदर्शन दिया।
ऐसे महान और सर्वसमावेशी धर्म को नकारकर, नेहरू ने भारत की आत्मा को कुचलने का कार्य किया। विभाजन जब हिंदू-मुस्लिम आधार पर हुआ, तब सेकुलर राज्य का विचार थोपकर भारत को नास्तिक दिशा देने का अपराध उन्होंने किया।
सेकुलरवाद का दावा और कटु यथार्थ
कांग्रेस और वामपंथी इकोसिस्टम यह दावा करते रहे कि सेकुलर राष्ट्र में हिंदू-मुस्लिम एक साथ रह सकते हैं। लेकिन स्वतंत्रता के बाद हुए 59,000 से अधिक दंगे इस दावे पर प्रश्नचिह्न लगाते हैं। कश्मीर से हिंदुओं का पलायन इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। जहाँ भी मुस्लिम जनसंख्या 30% से ऊपर जाती है, वहाँ हिंदुओं के लिए रहना कठिन क्यों हो जाता है? जहाँ यह 75% से ऊपर जाती है, वहाँ राष्ट्रगान क्यों नहीं होता, वहाँ शुक्रवार को स्कूलों की छुट्टी क्यों दी जाती है?
कश्मीर में पहलगाम की घटना जगजाहिर है, जब यात्रियों की केवल हिंदू पहचान के आधार पर हत्या की गई। इस्लामी आतंकवादियों को वहाँ के स्थानीय मुस्लिमों का समर्थन मिला। सवाल यह भी है कि हिंदुओं का धर्मांतरण जबरन क्यों कराया जाता है?
अगर नेहरू का सेकुलरवाद इतना सशक्त था, तो इन सबका उत्तर कहाँ है? सच्चाई यही है कि 1947, 1950 और फिर 1976 में 42वें संविधान संशोधन द्वारा प्रस्तावना में “सेकुलर” शब्द जोड़कर कांग्रेस, नेहरू और इंदिरा गांधी ने भारतीय राष्ट्र की आत्मा के साथ छल किया।
अब्राहमिक मजहबों की सीमा
इस्लाम, ईसाईयत और पश्चिमी साम्यवादी विचार – तीनों ही ऐसी विचारधाराएँ हैं जो राष्ट्र अवधारणा को नहीं मानते। इनकी मूल मान्यता यह है कि जो उनके मजहब में विश्वास न करे, वह शत्रु है और उसका इस दुनिया में जीने का अधिकार भी नहीं। जिन मजहबों में सह-अस्तित्व की भावना ही नहीं है, उनसे यह अपेक्षा कैसे की जा सकती है कि वे सनातन धर्म या भारतीय संविधान का सम्मान करेंगे?
उनका अंतिम लक्ष्य यह है कि जब तक एक भी “नॉन-बिलीवर” जीवित है, तब तक क़यामत और जजमेंट डे नहीं आ सकते। ऐसे अनुयायियों से यह सोचना ही गलत है कि वे भारतीय परंपराओं और संविधान के सह-अस्तित्व पर आधारित आदर्शों को मानेंगे।
धर्मांतरण और जनसांख्यिकीय परिवर्तन
यदि वास्तव में सह-अस्तित्व की भावना होती, तो भारत में ईसाई मिशनरियाँ धर्मांतरण का इतना बड़ा अभियान नहीं चलातीं। तमिलनाडु, केरल, बंगाल, छत्तीसगढ़, झारखंड, मध्यप्रदेश और पूर्वोत्तर के वनवासी क्षेत्रों में बड़े पैमाने पर ईसाई धर्मांतरण हुआ है। इसी तरह लव जिहाद और जनसंख्या वृद्धि के माध्यम से मुस्लिम समाज भी डेमोग्राफी बदलने की कोशिश करता रहा है।
तो फिर यह दावा कैसे किया जा सकता है कि हिंदू, मुस्लिम और ईसाई बिना किसी टकराव के एक साथ रह सकते हैं? यह सेकुलरिज़्म के नाम पर किया गया सबसे बड़ा छल और धोखा है – राष्ट्र की आत्मा के साथ किया गया फ्रॉड। और दुर्भाग्य से यह आज भी जारी है।
आज जब हम 79वाँ स्वतंत्रता दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल औपचारिक उत्सव का दिन नहीं है। यह वह अवसर है जब हमें सच स्वीकार करना होगा। दशकों से कांग्रेस, नेहरू–गांधी परिवार और वामपंथी इकोसिस्टम ने भारत की आत्मा को ढकने की कोशिश की है। उन्होंने इतिहास और वर्तमान दोनों को इस तरह प्रस्तुत किया कि आम भारतीय अपने ही सत्य से दूर हो जाए। लेकिन अब यह भ्रम तोड़ना होगा।
सच यही है कि भारत तब तक ही सेकुलर और समावेशी है जब तक हिन्दू बहुसंख्यक हैं। जिस दिन हिन्दू इस भूमि पर अल्पसंख्यक हो जाएँगे, भारत की पहचान भी उसी तरह मिट जाएगी जैसे पाकिस्तान और बांग्लादेश में हुआ। वहाँ हिन्दू होना अपराध बना दिया गया, और भीड़ द्वारा धर्म के नाम पर निर्दोषों की हत्या आम हो गई।
भारत की आत्मा सनातन धर्म है। यही वह धर्म है जिसने इस भूमि की विविधताओं को एक सूत्र में बाँधा। यही वह परंपरा है जिसने चार्वाक जैसे नास्तिक चिंतन को भी स्थान दिया और उपनिषदों के “तत्त्वमसि” जैसे गूढ़ सिद्धांतों को भी। यही वह संस्कृति है जिसने सह-अस्तित्व और सर्वसमावेशिता को जीवन का आधार बनाया।
लेकिन यह भी सच है कि सातवीं सदी से ही भारत सतत संघर्ष के दौर से गुजर रहा है। पहले इस्लामी आक्रमणकारियों ने यहाँ की अस्मिता को मिटाने की कोशिश की, फिर ईसाई मिशनरियों ने बड़े पैमाने पर धर्मांतरण के माध्यम से डेमोग्राफी बदलने का प्रयास किया, और आज वामपंथी व तथाकथित सेकुलर ताकतें इसी परंपरा को कमजोर करने में लगी हैं। इस दीर्घ संघर्ष में असंख्य ऋषियों, मुनियों, संतों और बलिदानियों ने अपना जीवन अर्पित किया, ताकि भारत की आत्मा जीवित रह सके।
आज का सबसे बड़ा सत्य यही है कि यदि हमें भारत की स्वतंत्रता, एकता और अखंडता को अक्षुण्ण बनाए रखना है, तो सनातन धर्म को उसके वास्तविक स्थान पर स्थापित करना होगा। अब समय आ गया है कि हम इसे केवल निजी आस्था न मानकर राष्ट्रीय जीवन का आधार स्वीकार करें। इसलिए यह आवश्यक है कि सनातन धर्म को भारत का राष्ट्रीय धर्म घोषित किया जाए।
यह न केवल हमारी संस्कृति और परंपरा का सम्मान होगा, बल्कि उन लाखों बलिदानियों का भी स्मरण होगा जिन्होंने सातवीं सदी से लेकर आज तक इस संघर्ष में प्राणों की आहुति दी। यही महर्षि अरबिंदो का स्वप्न था, और यही उस भारत का निर्माण करेगा जो वास्तव में स्वतंत्र होगा—आत्मा से भी और जीवन से भी।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी
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