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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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( धर्म के कारण राष्ट्र विजयी होता है )
-डॉ. नितिन सहारिया, महाकौशल
" न मैं मिट सकता हूं, न मुझे कोई मिटा सकता है।
मैं पहले से था, मैं आज भी हूं और मैं ही हमेशा रहूंगा।
मैं ही भूत, मैं ही भविष्य और मैं ही वर्तमान हूं।
मैं ही ब्रह्मांड ,में ही अनंत और मैं ही सनातन हूं।"
धर्म का प्रथम आधार है- आस्तिकता ,ईश्वर विश्वास। परमात्मा की सर्वव्यापकता ,समदर्शिता और न्यायशीलता पर आस्था रखना, आस्तिकता की पृष्ठभूमि है। यह मान्यता मनुष्य की दुष्प्रवृतियों पर अंकुश रख सकने में पूर्णतया समर्थ होती है । सर्वव्यापी ईश्वर की दृष्टि में हमारा गुप्त- प्रकट कोई आचरण अथवा भाव छिप नहीं सकता। समाज की, पुलिस की आंखों में धूल झोंकी जा सकती है, पर घट- घटवासी परमेश्वर से तो कुछ छिपाया नहीं जा सकता।
सत्कर्मों का या दुष्कर्मों का दंड आज नहीं तो कल मिलेगा ही, यह मान्यता व्यक्ति एवं सामाजिक जीवन में नीति और कर्तव्य का पालन करते रहने की प्रेरणा देती है । सत्कर्म करने वालों को यदि प्रशंसा, मान्यता या सफलता नहीं मिली है तो ईश्वर भविष्य में देगा ही, यह आस्था उसे निराश नहीं होने देती और असफलताएं मिलने पर भी वह सदाचरण के पथ पर आरुण बना रहता है। इसी प्रकार कुकर्मी निर्भय नहीं हो पाता।
( पं. श्रीराम शर्मा आचार्य वान्ग्ड़मय क्र. 66.6.10 )
' धर्म' शब्द संप्रदाय से भिन्न, बड़ी व्यापक परिभाषा लिए हुए हैं। जहां संप्रदाय उपासना विधि ,कर्मकांडों और रीति-रिवाजों का समुच्चय है, वहां *धर्म एक प्रकार से "जीवन जीने की शैली" का ही दूसरा नाम है। संप्रदायपरक मान्यताएं देश ,काल ,क्षेत्र , परिस्थिति के अनुसार बदलती रह सकती हैं ,परंतु धर्म शाश्वत -सनातन होता है ।* धर्म के तीन भाग बताए जाते हैं, जिन्हें परस्पर संबद्द करने पर ही वह समग्र बनता है। ये हैं तत्वदर्शन-ज्ञानमीमांसा ,नीतिशास्त्र एवं अध्यात्म । धर्म धारणा हरेक के लिए अनिवार्य है एवं उपयोगी भी। धर्म का अवलंबन निज की सुरक्षा ही नहीं, समाज की अखंडता के लिए भी जरूरी है।
*" धारणात् धर्म इत्याहु धर्मो धारयति प्रजा: ।"* जिस समाज में धर्म- धारणा जिंदा रहती है, वह समाज, वहां की प्रजा सदैव सुरक्षित बनी रहती है। दुर्भाग्य से धर्म को पलायनवादी- प्रतिगामी बनाकर मध्यकाल, जिसे अंधकार युग कहा जाता है, में अंधविश्वासों, मूढमान्यताओं से ग्रसित कर पंगु बना दिया गया । धर्म के साथ जब भी दुराग्रही मान्यताएं व अंधविश्वास, रूढ़िवादिता जुड़ जाते हैं, वह निरुपयोगी- निरर्थक ही नहीं समाज के लिए भी घातक बन जाता है। बलिपरंपरा, कर्मकांडी -कट्टरता एवं धर्म के नाम पर शोषण- उत्पीड़न इसी कारण पनपा एवं हम घुटन भरे एक समय विशेष से गुजर कर अब सांस्कृतिक आजादी की हवा में सांस ले रहे हैं । अभी भी वह कार्य बाकी है, वह है धर्म को विज्ञान सम्मत बनाकर उसे सदाशयता , परमार्थ परायणता, संवेदनशीलता का स्वरूप देना ताकि हर कोई उसे अंगीकार कर सके। यह परिष्कृति और कोई नहीं आज का प्रबुद्ध वर्ग ही धर्मतंत्र अपने हाथ में लेकर कर सकेगा।
धर्म के 10 लक्षण एवं पंचशील बताए गए हैं। चिरपुरातन दृष्टि से वे अनेक रूपों में परिभाषित हैं , किंतु *युगऋषि पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने आप्तजनों की सहमति के अनुसार सत्य ,विवेक, संयम, कर्तव्यपरायणता ,अनुशासन ,व्रतधारण, स्नेह- सौजन्य, पराक्रम, सहकार एवं परमार्थ के रूप में उनकी व्याख्या की है।* इन गुणौ की अवधारणा, जीवन में इनको उतारा जाना ही धर्म धारणा है। धर्म की परिभाषा - " *यतोsभ्युदय नि: श्रेयस सिद्धि: स धर्म:* " के रूप में की गई है। यह परिपूर्ण परिभाषा मानवधर्म के रूप में मात्र भारतीय संस्कृति में ही देखी जा सकती है। धर्म के अंतर्गत वे सारे सिद्धांत एवं उपयोगी आधार आ जाते हैं जो मनुष्य के सर्वांगीण विकास, आध्यात्मिक प्रगति में सहायक सिद्ध हो सकते हैं। धर्म व्यक्ति की संवेदना को परिष्कृत करने वाली विद्या है । मानवीय प्रगति का राजमार्ग इतना करने पर ही सबके लिए खुल सकेगा ।
धर्म का मर्म है - नीतिमत्ता- शालीनता। यह प्रयोजन उच्चस्तरीय आस्थाओं के सहारे ही सध सकता है। आस्थाओं का मूलभूत परिष्कार धर्मतंत्र के प्रगतिशील बन पाने पर ही संभव है। यही समय की मांग युगधर्म के रूप में हम सभी के समक्ष है। एक और इस युग की चुनौती हम सभी के समक्ष है, वह है धर्म तंत्र व राजतंत्र का सहगान । क्या यह दोनों एक साथ चल सकते हैं ,यदि हां तो कैसे ? धर्म राजतंत्र को दिशा प्रदान कर उसकी स्वेच्छाचारिता पर अंकुश रख सकता है। इसी कारण धर्म को राजतंत्र की तुलना में अधिक महत्ता दी गई है। अपराधियों- आक्रांताओं से निपटना धर्म-मान्यताओं के सहारे भली-भांति संभव है। यदि सामाजिक अपराध, जिनके लिए राजतंत्र की बड़ी शक्ति खर्च होती है, धर्म द्वारा प्रदत्त अंत:प्रेरणा से रुक जाते हैं तो समझना चाहिए कि शासन की दौड़- धूप रोककर उसे रचनात्मक प्रयोजनों में लगा दिया गया।
विश्व- वसुधा आने वाले दिनों में मानवधर्म- सनातन धर्म की धुरी पर कैसे एक सूत्र में आवद्द होने जा रही है। एकता, समता, ममता, सुचिता का समग्र स्वरूप आने वाले नवयुग में किस प्रकार एक विराट कुटुंब का निर्माण करेगा,जिसमें विद्वेष नहीं सहकार ही, सर्वधर्म समभाव ही प्रधान होगा ।
क्रमशः .......
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