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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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2014 के चुनावों ने भारतीय राजनीति में एक नए युग की शुरुआत की। दशकों तक सत्ता और विमर्श पर कब्जा बनाए रखने वाला वामपंथी-उदारवादी गठजोड़ अचानक अपने राजनीतिक आधार से वंचित हो गया। भाजपा की प्रचंड जीत ने केवल कांग्रेस को नहीं, बल्कि पूरे वैचारिक तंत्र को झकझोर दिया। इसी समय विभिन्न प्रकरण—अखलाक, पहलू खान, रोहित वेमुला— सामने आए। इन घटनाओं ने समाज में असुरक्षा और भय की भावना पैदा की।
इस पूरे घटनाक्रम को समझने के लिए Rules for Radicals के 13 सिद्धांत मार्गदर्शक बनते हैं। सॉल अलीन्स्की ने इन नियमों के माध्यम से यह स्पष्ट किया कि सत्ता केवल शक्ति होने से नहीं, बल्कि जनता की धारणा, विरोधियों की कमजोरी और समाज में भय और असुरक्षा फैलाकर भी कायम होती है। ये 13 सिद्धांत इस प्रकार हैं:
1. शक्ति वही है जिसे जनता मान ले कि शक्ति है।
2. अपने लोगों के परिचित अनुभवों के बाहर मत जाओ।
3. जब भी संभव हो, विरोधी के अनुभवों के बाहर जाओ।
4. विरोधी को उसकी ही किताब के नियमों से फंसा दो।
5. व्यंग्य सबसे बड़ा हथियार है।
6. ऐसी रणनीति अपनाओ जिसमें आपके लोग आनंद महसूस करें।
7. लंबी अवधि तक खिंचाव वाली रणनीति बोझ बन जाती है।
8. दबाव बनाए रखो।
9. खतरा अक्सर वास्तविक चीज़ से अधिक भयानक लगता है।
10. लगातार दबाव बनाए रखने के लिए संचालन विकसित करो।
11. विरोधी को हमेशा रक्षात्मक बनाओ।
12. मुद्दों को व्यक्तिगत बनाओ।
13. अराजकता से अवसर खोजो।
सॉल अलीन्स्की की पुस्तक Rules for Radicals में 13 सिद्धांत राजनीतिक अराजकता और सत्ता पर कब्जे की रणनीति का मार्गदर्शन करते हैं। ये सिद्धांत स्पष्ट करते हैं कि कैसे समाज और संवैधानिक संस्थाओं में अविश्वास पैदा किया जाए और विरोधियों को उनकी ही ताकत से असफल बनाया जाए। भारतीय परिप्रेक्ष्य में 2014 से 2025 तक के घटनाक्रम ने इन सिद्धांतों का सटीक पालन किया।
2015 में बिहार विधानसभा चुनाव के समय विपक्ष ने आरक्षण खत्म करने की धमकी और भय का वातावरण तैयार किया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत के वक्तव्य के बाद जनता में डर पैदा करने के लिए सामाजिक और जातिगत मुद्दों को हवा दी गई। इसी दौरान अखलाक मामले (28 सितंबर 2015) ने देशभर में असहिष्णुता का शोर मचाया। मीडिया और NGO गठजोड़ ने इसे पूरे भारत में मुसलमानों पर बढ़ती हिंसा के रूप में प्रस्तुत किया। अवार्ड वापसी आंदोलन चला, जिसमें कुछ साहित्यकारों और बुद्धिजीवियों ने पुरस्कार लौटाकर यह संदेश दिया कि भारत में बहुसंस्कृतिवादी और धर्मनिरपेक्षता संकट में हैं।
17 जनवरी 2016 को रोहित वेमुला केस सामने आया। इसका इस्तेमाल दलित और छात्र वर्ग के अनुभवों को मुख्यधारा में लाने के लिए किया गया। 9 फरवरी 2016 को JNU में “भारत तेरे टुकड़े होंगे” नारा लगा। इस समय अलीन्स्की के सिद्धांत—“विरोधी के अनुभवों से बाहर मुद्दे खड़े करना” और “विरोधी को उसकी ही किताब के नियमों से फंसाना”—स्पष्ट दिखाई देते हैं।
2017 में पहलू खान हत्या की घटना सामने आई। जातिगत और धार्मिक आधार पर नैरेटिव तैयार किया गया। गुजरात में ओबीसी पाटीदार आंदोलन और दलित आंदोलन हुए। उन्नाव में दलितों की पीट-पीट कर हत्या की कोशिश और कठुआ कांड की घटनाएं हुईं। मीडिया ने इन घटनाओं को बड़े पैमाने पर कवर किया।
जनवरी 2018 में भीमा-कोरेगांव हिंसा हुई। जातिगत तनाव और हिंसा फैलाकर संवैधानिक संस्थाओं और कानूनों पर प्रश्न खड़ा किया गया। अप्रैल 2018 में SC/ST एक्ट पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला आया। 2 अप्रैल 2018 को दलित वर्ग सड़कों पर उतर आया और अफवाह फैलाई गई कि भाजपा आरक्षण खत्म कर देगी। इसके बाद सुप्रीम कोर्ट का फैसला पलटने पर सवर्ण वर्ग ने सड़कों पर विरोध किया।
नवम्बर 2019 में शाहीन बाग आंदोलन शुरू हुआ। राम मंदिर फैसले और अनुच्छेद 370 हटाने के निर्णय के बाद विरोधियों ने इसे प्रतीकात्मक रूप से सड़क पर रोकने के लिए इस्तेमाल किया। आंदोलन में महिलाओं को प्रतीक बनाकर लोकतंत्र की रक्षा का संदेश दिया गया। आंदोलन के दौरान सड़क पर हुई अराजकता और हिंसा, अलीन्स्की के सिद्धांत—“विरोधी को उसकी ही नियमों से फंसाओ”, “आंदोलन मजेदार बनाओ”, और “दबाव बनाए रखो”—के अनुरूप थे।
कोरोना काल में कृषि सुधार लागू किए गए। विरोधियों ने सड़क मार्ग रोककर किसानों को बंधक बनाकर कानून लागू नहीं होने दिया। 26 जनवरी 2021 को लाल किले पर झंडा फहराने जैसी घटना हुई। आंदोलन में मुख्य चेहरा योगेन्द्र यादव थे।
2020 में अमेरिका में ब्लैक लाइव्स मैटर आंदोलन ने हिंसा और अराजकता फैलाने का वैश्विक उदाहरण पेश किया। MeToo अभियान ने समाज में नैतिक द्रष्टिकोण से विरोधियों को दबाने का मॉडल बनाया। भारत में इसके अनुरूप रोहित वेमुला, कठुआ और शाहीन बाग जैसे आंदोलन चले।
2023 में अडानी समूह पर वित्तीय आरोप और हिंडनबर्ग रिपोर्ट, पेगासस जासूसी विवाद, और मीडिया कवरेज (गोदी मीडिया) के माध्यम से संवैधानिक संस्थाओं पर प्रश्न उठाए गए।
2024 के लोकसभा चुनाव में प्रचार किया गया कि यदि भाजपा 400 सीटें जीत जाती है, तो आरक्षण समाप्त कर दिया जाएगा, संविधान में बदलाव किया जाएगा, और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को पद से हटा दिया जाएगा। क्रिटिकल रेस थ्योरी के आधार पर जातिगत जनगणना की ऐसी चर्चा ही समाज में तनाव उत्पन्न करने का उदाहरण है।
नवंबर 2024: ट्रंप की अमेरिका में वापसी के बाद योगेन्द्र यादव ने कहा कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में मोदी-ट्रंप जैसे लोग जीत जाते हैं, इसलिए लोकतांत्रिक व्यवस्था समाप्त कर देनी चाहिए और सड़क मार्ग की लड़ाई जरूरी है।
7 अगस्त 2025: राहुल गांधी ने वोट चोरी का आरोप लगाया। इसके बाद राजद प्रवक्ता मनोज झा ने बंग्लादेश पैटर्न दोहराने की बात कही।
2014–2025 के इस पूरे घटनाक्रम में जनता में भय और असुरक्षा फैलाना, संवैधानिक संस्थाओं की वैधता पर प्रश्न उठाना और अराजकता से अवसर उत्पन्न करना रणनीति का केंद्र रहा। अलीन्स्की के 13 सिद्धांत—शक्ति का प्रदर्शन, विरोधी को उसकी ही ताकत पर फंसाना, भय फैलाना, दबाव बनाए रखना, आंदोलन मजेदार बनाना, मुद्दों को व्यक्तिगत बनाना, अराजकता से अवसर निकालना—सभी घटनाओं में स्पष्ट रूप से लागू हुए।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी
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