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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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माता शत्रु पिता बैरी जे न बालो पाठित: यह श्लोक लिखकर हमारे स्मृतिकारों ने अध्ययन के सद्गुण को सर्वोच्च स्थान पर रखा है। जो माता पिता अपने बच्चों को दुर्गुण की तरफ धकेलते हैं वे उसके शत्रु हैं। अध्ययन से चेतना विकसित होती है चेतना से सत चित आनन्द की प्राप्ति होती है जो प्रत्येक प्राणी का पाथेय है।
हिरण्यकश्यप कृतघ्नता का प्रतीक है, अशांत और विध्वंश का पक्षकार है। विश्व में प्रत्येक वह व्यक्ति जो अपनी प्रार्थना में ॐ शांति का पाठ करता है उसे नरसिंह भगवान का भी आह्वान करना चाहिए जो शांति की स्थापना हिरणाकश्यप का पेट फाड़कर करते हैं।
प्रह्लाद पिता की सारी बात, उसकी आज्ञा मानता है लेकिन दुर्गुण को अपनाने से मना करता है। वह पिता की बात मानकर अपने प्राण सहर्ष देने को तत्पर है, ऐसा पुत्र मिलना कितने सौभाग्य की बात होती है लेकिन वह भाग्य हिरणाकश्यप ले न सका।
नरसिम्हा देखने के बाद मेरी आँखों के जल की बूंदे भगवान नरसिंह के चरणों तक पहुँचे होंगे। प्रह्लाद के एक निर्मल विश्वास के आगे ईश्वर हारा है, जप कीर्तन भजन नृत्य सब मन को माँजने के साबुन हैं। मुझे धीरे धीरे विश्वास होता जा रहा है कि देह की सीमाओं से उसे नही जाना जा सकता, तर्क से परे है। उसकी अनुभूति भाव से ही हो सकती है जिसे मापने का कोई भौतिक यन्त्र नही बना।
हम सब के अंदर वही रस है जो उसके महारास में है। अमीबा से लेकर आकाशगंगाओं का नर्तन उसकी की एक उंगली पर हो रहा है। वही तत्व मेरे अंदर भी है जो ब्रह्मांड के किसी पिंड में है, जो किसी श्वान में है, जो किसी पेड़ में है, जो किसी कीड़े में है जो किसी पत्थर में है। हमारे आकार आकृति व्यवहार कुछ भी हो, उसी के बनाये नियमों और संरचना में घूम रहे हैं।
अंतरिक्ष की अतल गहराईयों को मैं अपनी देह के किसी इलेक्ट्रान के मध्य अंतरा-आणविक स्थान में देखने के लिए छान्दोग्योपनिषद पढ़ता हूँ, 'तत्त्वमसि'। मैं जान रहा हूँ, तुम वही हो। इसमें, उसमें,खड्ग खम्भ में घट घट व्यापित राम।
नरसिम्हा जैसी हजार मूवी बने, हजार प्रह्लाद के विश्वास पर हजार नरसिम्हा के रूप में 'उसे' आना पड़े।
आप भी देख आइए,बच्चों को भी दिखाइए, उन्हें पता चले कि कण कण में राम व्याप्त हैं।
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