सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

रील संस्कृति: टूटते रिश्ते, बिखरती मर्यादाएँ और हिंदू नारी का चुपचाप होता पतन

कभी हमारे गाँव में, शाम होते ही घरों के बाहर चूल्हा जलता था। बहुएँ सिर पर आँचल डाले, अपने बच्चों को गोद में लिए, चौके में रोटी सेंकती थीं। दादी-नानी तुलसी चौरे पर दीप जलाकर आरती करती थीं। बेटियाँ माँ से ‘स्त्रीधर्म’ सीखती थीं — एक मर्यादित, संयमी और कर्तव्यनिष्ठ जीवन जीने की कला। लेकिन आज, उसी गाँव में, मोबाइल की स्क्रीन पर माँ-बेटी साथ बैठकर ‘ट्रेंडिंग रील्स’ देखती हैं — जिसमें कोई युवती ‘बोल्ड’ कपड़ों में ठुमके लगाते हुए "लड़का डूबा रहे मेरी आँखों में" जैसे अश्लील गीतों पर अभिनय कर रही होती है।

रील संस्कृति केवल मनोरंजन नहीं है। यह एक सुनियोजित वैचारिक हमला है — हिन्दू परिवार, नारी और हमारी सांस्कृतिक मर्यादाओं पर। पिछले पाँच वर्षों में, विशेषतः 2020 के बाद, Instagram और TikTok जैसे मंचों पर भारत में प्रतिदिन करोड़ों रीलें बन रही हैं। 2025 की एक डिजिटल बिहेवियर स्टडी के अनुसार, भारत की लगभग 72% शहरी लड़कियाँ 13 वर्ष की उम्र तक रील बनाना शुरू कर देती हैं। और इनमें से 58% कंटेंट सेंसुअलिटी आधारित यानी कामोत्तेजक होता है — यह आँकड़ा केवल शहरी नहीं, कस्बाई भारत की भी हकीकत है।

रील कल्चर ने ‘चरित्र’ को ‘कॉन्टेन्ट’ बना दिया है। जिस हिन्दू समाज में बेटी की विदाई के समय पिता भावुक होकर कहता था — “बेटी, अब तेरे आचरण से हमारा कुल सम्मानित होगा,” वहीं आज एक पिता, दिल्ली के एक पॉश इलाके में, अपनी 19 साल की बेटी को खुद कैमरा पकड़कर रील बनवाता है — जिसमें वह "हुस्न की रानी" जैसे अश्लील गानों पर अदाएं दिखा रही होती है। कारण? "रोज़ दो लाख व्यूज़ आते हैं, ब्रांड से पैसे मिलते हैं।" क्या यह केवल आधुनिकता है, या अपनी संतान की मर्यादा को बाजार में बेचने का कृत्य? 

मुझे याद है—एक दिन कटनी स्टेशन पर एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति बैठा रो रहा था। मैंने कारण पूछा तो उसने मोबाइल पर एक रील चुपचाप दिखा दी—"ये मेरी बेटी है, जो बनारस के संस्कृत विद्यालय में पढ़ती थी। अब हर रविवार को वह रील्स बनाती है, और लोग उसे 'हॉट ब्राह्मण गर्ल' कहकर बुलाते हैं।"

उसके आँसू मेरे मन में चीर पैदा कर गए। हमने यह कैसा भारत बना दिया, जहाँ हमारी बहनें और बेटियाँ अब सस्ते 'लाइक' और 'फॉलोवर' के लिए अपनी अस्मिता को नीलाम कर रही हैं? 

देश के अलग-अलग हिस्सों में घटनाएं घट रही हैं, जिनमें रिश्ते टूट रहे हैं, युवतियाँ आत्महत्या कर रही हैं, और परिवार बिखर रहे हैं — और इन सबका आधार बना है यह वर्चुअल पहचान का झूठा मायाजाल।

वो रीना थी, बनारस की एक सामान्य हिन्दू परिवार की बेटी। संस्कारों में पली-बढ़ी, माँ के साथ तुलसी की पूजा करती, महादेव के व्रत रखती। लेकिन 2020 के बाद, जब उसके मोबाइल में इंस्टाग्राम आया — धीरे-धीरे उसकी दुनिया बदल गई। शुरू में वो सिर्फ "डांसिंग ट्रेंड्स" करती थी। फिर "लिप सिंक", फिर "साड़ी ट्रांजिशन" और फिर… अंत में, ऐसे पोज़ और अश्लील मुद्राएँ जिन्हें देखकर उसके पिता ने एक दिन आत्महत्या कर ली।

रीना अकेली नहीं है।

मुंबई में 2024 की एक रिपोर्ट के अनुसार, 20 प्रतिशत तलाक का प्रमुख कारण "रील एक्सपोजर और सोशल मीडिया पर निजी जीवन का प्रदर्शन" बताया गया। एक और सर्वे, जो दिल्ली हाई कोर्ट के आदेश पर 2023 में किया गया, उसमें पत्नियों द्वारा “कंटेंट क्रिएटर” बनने की चाह में घर छोड़ने, बच्चे छोड़ने, और अवैध संबंधों में लिप्त हो जाने की प्रवृत्ति को स्पष्ट रूप से देखा गया।

केरल में एक मामला सामने आया जिसमें एक माँ अपनी 12 साल की बेटी से “बोल्ड डांस रील्स” बनवाती थी ताकि इंस्टाग्राम पर मोनेटाइज़ हो सके। जब पुलिस पहुँची, माँ का जवाब था — “अब तो सब यही कर रहे हैं, मेरी बेटी को फेमस बनना है।”

बिहार के छपरा में 2025 की शुरुआत में एक नवविवाहित स्त्री ने ससुराल छोड़ दिया क्योंकि उसे इंस्टाग्राम पर “फ्रीडम ऑफ क्रिएशन” चाहिए था — जबकि पति उसे केवल इतना कहता रहा कि "कृपया हमारी निजी जिंदगी को दुनिया के सामने यूँ मत परोसिए।"

बरेली (उ.प्र.) की 17 वर्षीया छात्रा ने आत्महत्या की जब उसकी रील वायरल हुई और स्कूल में उसका उपहास उड़ाया गया।

चेन्नई के एक मध्यमवर्गीय ब्राह्मण परिवार की बहू, जो संस्कारी मानी जाती थी, ने इंस्टाग्राम इन्फ्लुएंसर बनने की चाह में ऐसे-ऐसे बोल्ड फोटो पोस्ट किए कि उसके पति ने तलाक की अर्जी दे दी।

कोलकाता में एक मां, जो पहले गृहिणी थी, अब अपनी नाबालिग बेटी के साथ डांस रील्स बनाकर लाखों कमाती है — और गर्व से कहती है, "आज हम सेलिब्रिटी हैं।"

लेकिन क्या यह केवल उनका ‘चयन’ है? नहीं। इसके पीछे हैं वे शक्तियाँ जो पश्चिमी कल्चरल मार्केट फोर्सेस कहलाती हैं। जिन्हें न भारतीय स्त्री चाहिए, न उसका परिवार, न उसकी मर्यादा — उन्हें चाहिए केवल एक वस्तु: ‘वायरल कंटेंट’। Meta, ByteDance, YouTube — ये सभी कंपनियाँ भारत की लड़कियों को ग्लैमराइज्ड देहप्रदर्शन के लिए प्रोत्साहित करती हैं। उनके एल्गोरिद्म सिर्फ वही दिखाते हैं जिसमें उत्तेजना हो, जिसमें नारी की मर्यादा टूटे, जिससे जुड़ाव नहीं — उत्तेजना उपजे। यही कारण है कि अगर कोई लड़की "संस्कार" पर बात करती है तो उसे व्यूज़ नहीं मिलते, लेकिन अगर वह मिनी स्कर्ट में "सेक्सी लग रही हूं" कहे — तो वो रील 50 लाख बार देखी जाती है।

आज रील संस्कृति ने विवाह को भी ‘कंटेन्ट’ बना दिया है। जयपुर में एक विवाह के समय दूल्हा-दुल्हन को मण्डप पर रील बनाने के लिए बार-बार संवाद दोहराने पड़े, पंडित जी बोले: "अब ये विवाह है या शूटिंग?" लेकिन सबसे भयावह दृश्य तब है जब एक माँ अपनी बहू से कहती है — "बेटा, थोड़े बोल्ड कपड़े पहन लेती, वीडियो ज्यादा चलेंगे" — यह वह माँ है जिसने 25 वर्ष पहले अपने विवाह में सिर से पाँव तक लाज की चादर ओढ़ी थी।

रील संस्कृति में नारी, पत्नी, माँ, बहन — यह सब कुछ ‘रोल’ बन चुका है। वास्तविकता पीछे छूट गई है। परिवार अब ‘रील’ में सुंदर दिखता है, लेकिन वास्तविक जीवन में टूट चुका होता है। जहाँ पहले स्त्रियाँ अपने पति और बच्चों की चिंता करती थीं, वहाँ आज उनका ध्यान इस बात पर रहता है कि अगली रील किस गाने पर बनानी है।

जब विवाह बंधन भी टूटने लगे

रील संस्कृति ने पति-पत्नी के संबंध को भी मनोरंजन बना दिया है। लाखों युवा अब “कपल गोल्स” दिखाने के लिए झूठी मुस्कानें, नकली स्नेह, और झूठे किस्सों के वीडियो बनाते हैं — जिनका असली चेहरा डिप्रेशन, विवाद और अंततः तलाक होता है।

एक NCRB रिपोर्ट के अनुसार, 2023-24 में 6,700 से अधिक मामलों में सोशल मीडिया उपयोग को वैवाहिक असंतोष का कारण बताया गया।

इससे सबसे अधिक प्रभावित हुआ है हिन्दू स्त्री का चारित्रिक आधार। पवित्रता, लज्जा, संयम — ये शब्द अब पुराने जमाने के बताए जाते हैं। और जो स्त्री इन मूल्यों पर टिकी रहती है, उसे ‘बोरिंग’, ‘अबला’, या ‘रिग्रैसिव’ कहा जाता है।

लेकिन इस सबके पीछे केवल लड़कियाँ दोषी नहीं हैं। दोषी है एक पूरी सामाजिक संरचना, जिसमें माता-पिता, भाई, पति, यहाँ तक कि समाज के 'ज्ञानी' लोग तक ‘रील’ की भक्ति में लीन हो चुके हैं। जो अपनी बहनों, पत्नियों, बेटियों को बाज़ार में ‘प्रोडक्ट’ बनाकर वायरल देखना चाहते हैं।
सांस्कृतिक पतन का एजेंडा?

रील कल्चर मात्र "युवाओं की पसंद" नहीं है। यह एक संगठित सांस्कृतिक आक्रमण है जिसे “क्लिक”, “लाइक”, “वायरल” और “एल्गोरिद्म” जैसे शब्दों के पीछे छुपाकर परोसा गया है।

इसके पीछे काम कर रही हैं:

कल्चरल मार्क्सिस्ट एजेंसियाँ, जो “न्यू नॉर्मल” के नाम पर पारिवारिक मर्यादाओं को तोड़ना चाहती हैं।

बिग टेक प्लेटफॉर्म्स, जिनके लिए “एंगेजमेंट” का अर्थ है — अश्लीलता, उत्तेजना और उत्तेजक पोस्ट।

OTT और फैशन ब्रांड्स, जो रील्स के ज़रिए स्त्री को मात्र “प्रदर्शन की वस्तु” बनाकर पेश करते हैं।

पति और भाई स्वयं अपनी पत्नी, बहू या बेटी को कैमरा पकड़कर निर्देश दे रहे हैं — “हाँ, थोड़ा और लो-कट पोज़ देना, हाँ अच्छा, अब ट्रेंडिंग साउंड पर थिरको।”

भोपाल में 2025 के जनवरी महीने में एक वायरल वीडियो में एक बाप अपनी बेटी से अश्लील ट्रेंड पर नाच करवाता है। जब वीडियो वायरल हुआ, उसने कहा — “मुझे क्या पता था लोग इतना बुरा सोचेंगे। हम तो सिर्फ 'एंटरटेनमेंट' कर रहे थे।”

हमें यह प्रश्न स्वयं से पूछना होगा — क्या ये वही भारत है जहां पुत्री को लक्ष्मी माना जाता था? क्या यह वही समाज है, जहाँ सीता की अग्निपरीक्षा मर्यादा का आदर्श थी? क्या यह वही भारत है, जहाँ सावित्री अपने पति के प्राण यमराज से छीन लाई थी? या अब यह वह भारत है जहाँ सावित्री TikTok पर "आशिकी आ गई" गाते हुए अपनी सास को भी शामिल कर रही है?

अगर उत्तर 'नहीं' है — तो फिर समय आ गया है कि हम रील संस्कृति के इस मानसिक गुलामी से मुक्ति का रास्ता तलाशें। यह केवल संस्कृति का नहीं, अस्तित्व का प्रश्न है।

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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