सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भ्रष्टाचार बनाम राष्ट्रनिष्ठा: भारत को कैसी प्रशासनिक व्यवस्था चाहिए?

भारतवर्ष की शासन परंपरा का मूल उद्देश्य केवल “राज्यसत्ता” नहीं, बल्कि धर्मपालन, जनकल्याण, और सांस्कृतिक संतुलन रहा है। मनुस्मृति, महाभारत तथा चाणक्य नीति जैसे ग्रंथों में राजा के लिए धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष — इन चार पुरुषार्थों का संतुलन अनिवार्य माना गया। प्रशासनिक सेवा, ‘राजधर्म’ का पालन था, जिसे भ्रष्ट या लोभी होना अधर्म समझा जाता था।

लेकिन औपनिवेशिक सत्ता ने इस तंत्र को बदल दिया।

ब्रिटिश शासन से पूर्व भारत की 70% से अधिक जनसंख्या कृषि, कुटीर उद्योग, हस्तशिल्प और व्यापार में संलग्न थी। 1750 में भारत का वैश्विक GDP में हिस्सा लगभग 24% था (एंगस मैडिसन, The World Economy: A Millennial Perspective)। परंतु 1947 आते-आते यह घटकर मात्र 4% रह गया।

अंग्रेजों ने भारत में 1853 में भारतीय सिविल सेवा (ICS) प्रारंभ की, जिसमें भारतीयों की भागीदारी नगण्य थी।

प्रशासन का उद्देश्य जनसेवा नहीं, कर-संग्रह, विद्रोह-नियंत्रण और ब्रिटिश शासन का विस्तार था।

Indian Civil Service is neither Indian, nor Civil, nor Service” — यह टिप्पणी भारत की ICS व्यवस्था पर नेहरू की रही थी।


अंग्रेज़ों ने शासन को ऐसा रूप दिया जिसमें लोकहित गौण और सत्ता-स्थायित्व प्रमुख था। इसी दौरान "सरकारी नौकरी" का मूल्य एक सेवा नहीं, वरन् "स्थायी आय और सामाजिक रुतबे" के रूप में स्थापित हुआ।
भारत ने 1950 के बाद नेहरूवादी समाजवाद को अपनाया। इसमें योजनाबद्ध विकास और सरकारी नियंत्रण को प्राथमिकता मिली। इसके दुष्परिणाम इस प्रकार उभरे:

1951 में सरकार के पास 5 लाख कर्मचारी थे; 2021 तक यह संख्या 2 करोड़ 98 लाख के करीब पहुँच चुकी है (केंद्र और राज्य मिलाकर)।

Transparency International की रिपोर्ट (2023) के अनुसार, भारत भ्रष्टाचार सूचकांक में 180 देशों में 93वें स्थान पर है।

सरकारी तंत्र में कार्यरत कर्मचारियों के विरुद्ध भ्रष्टाचार के मामलों में वर्ष 2022 में 21,000 से अधिक शिकायतें सीबीआई को प्राप्त हुईं।

2021 में CAG ने पचास से अधिक सार्वजनिक उपक्रमों में 1.4 लाख करोड़ रुपये से अधिक की वित्तीय अनियमितताओं की रिपोर्ट दी।


नौकरशाही, जो सेवा का माध्यम होनी चाहिए थी, लाइसेंस-परमिट राज और राजनीतिक संरक्षण की छाया में “सुविधा शुल्क तंत्र” बन गई। परिणामस्वरूप आज फाइल आगे बढ़ाने से लेकर टेंडर पास कराने तक—हर प्रक्रिया में भ्रष्टाचार की लकीर स्पष्ट दिखती है।



समस्या क्या है?

आज भारत का प्रशासनिक तंत्र एक गंभीर संकट से जूझ रहा है। यह तंत्र–

अत्यधिक केंद्रीकृत,

नैतिक अनुशासन से शून्य,

उत्तरदायित्वहीन,

और सबसे बढ़कर राष्ट्रबोध से विहीन है।


आज किसी भी सरकारी कार्यालय में प्रवेश करने पर एक नागरिक की अपेक्षा मानवता नहीं, बल्कि फाइलों, नियमों और लालफीताशाही से टकराती है। अधिकारी और कर्मचारी अपने पद को सेवा नहीं, लाभ का स्रोत मानते हैं। "कट" तय होते हैं, टेंडर बिकते हैं, फाइलें दबाई जाती हैं, और कर्तव्यों को निभाने की बजाय टालने की प्रवृत्ति अधिक होती है।

कहीं कोई नैतिक उत्तरदायित्व नहीं, कहीं कोई राष्ट्र के प्रति भावनात्मक जुड़ाव नहीं।

समाधान क्या है? — कैसे बने धर्मनिष्ठ और राष्ट्रनिष्ठ तंत्र?

१. सैन्य प्रशिक्षण और राष्ट्रीय सेवा अनिवार्य हो

हर सरकारी कर्मचारी को नियुक्ति से पहले कम-से-कम एक वर्ष का सैन्य प्रशिक्षण अनिवार्य रूप से दिया जाना चाहिए। इससे वह अनुशासन, साहस, आत्मबल और राष्ट्रनिष्ठा का अभ्यास प्राप्त करेगा। इस मॉडल को हम इज़राइल, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया जैसे देशों में सफलतापूर्वक लागू होते देख चुके हैं।

इज़राइल में हर नागरिक, चाहे वह पुरुष हो या स्त्री, कुछ वर्षों की सैन्य सेवा करता है। इसी का परिणाम है कि वहाँ के अफसर से लेकर नागरिक तक, हर व्यक्ति अपने राष्ट्र के लिए मर-मिटने को तैयार है।

२. प्रशासनिक पाठ्यक्रमों में भारत के सांस्कृतिक और नैतिक मूल्यों का समावेश हो

आज एक भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी को ट्रेनिंग में लॉर्ड मैकाले और ऑक्सफोर्ड प्रशासनिक सिद्धांत तो पढ़ाए जाते हैं, लेकिन मनुस्मृति, चाणक्य, महाभारत के नीति सूत्र, अथर्ववेद की शासन दृष्टि नहीं पढ़ाई जाती।

वर्तमान में LBSNAA (Lal Bahadur Shastri National Academy of Administration) में भारतीय परंपरा, नीति शास्त्र, नैतिक दर्शन और सांस्कृतिक मूल्यों का समुचित अध्ययन नहीं होता।

प्रशिक्षण पाठ्यक्रम में चाणक्य नीति, महाभारत का शांतिपर्व, बृहस्पति नीति, श्रीमद्भगवद्गीता, और प्राचीन भारतीय प्रशासन की मूल अवधारणाओं को जोड़ना आवश्यक है।


भारतीय शासन परंपरा और धर्माधारित कर्तव्यबोध ।

जिस देश में “राजा की नीति धर्म से विचलित हो जाए, तो वह प्रजा का शत्रु बन जाता है” — ऐसा स्पष्ट रूप से कहा गया हो, वहाँ धर्मनिष्ठता को प्रशासनिक शिक्षा का आधार बनाया जाना नितांत आवश्यक है।

३. सेवा-शपथ में 'धर्म' और 'राष्ट्र' को स्थान दिया जाए

आज सरकारी कर्मचारी संविधान के प्रति निष्ठा की शपथ लेते हैं, लेकिन राष्ट्र और समाज के प्रति नहीं। संविधान तो एक दस्तावेज है — भावना और चेतना तो राष्ट्र की आत्मा से आती है। अतः सेवा-शपथ में यह वाक्य जोड़ना चाहिए —

मैं न केवल भारत के संविधान के प्रति, अपितु भारत की सांस्कृतिक आत्मा, समाज और धर्म के प्रति भी निष्ठावान रहूँगा।"


४. समाजवाद और सेकुलरवाद की कृत्रिम परिभाषा का परित्याग

1976 में संविधान की प्रस्तावना में जो “समाजवाद” और “धर्मनिरपेक्षता” शब्द जोड़े गए, उन्होंने शासन को धर्मविमुख और मूल्यविहीन बना दिया। यह सेकुलरवाद ऐसा था, जिसने शासकीय तंत्र को धर्म और संस्कृति से काट दिया। अफसर अब यह मान बैठा कि उसे किसी “नैतिक धर्म” का पालन नहीं करना, केवल कानूनी नियमों का यांत्रिक पालन करना है।

इस सोच को बदलना होगा। भारत का प्रशासन धर्म-सापेक्ष होना चाहिए — अर्थात कर्तव्य, मर्यादा और नैतिक उत्तरदायित्व आधारित।

५. प्रेरक नेतृत्व और अनुकरणीय उदाहरण

“जैसा राजा, वैसी प्रजा” — यह नीति प्रशासन पर भी लागू होती है। जब तक उच्च राजनेता और नौकरशाही के शीर्ष अधिकारी स्वयं अनुकरणीय जीवन नहीं जीते, नीचे कोई नहीं सुधरेगा। यह परिवर्तन केवल विधायिका या नौकरशाही से नहीं, समाज के भीतर से भी आना होगा।


यदि भारत को एक निष्ठावान, उत्तरदायी, और राष्ट्रनिष्ठ शासन व्यवस्था चाहिए, तो हमें केवल नियम नहीं बदलने, चरित्र निर्माण करना होगा।

आज प्रशासनिक सेवा आजीविका का साधन बन चुकी है, राष्ट्रसेवा का माध्यम नहीं। इस दृष्टिकोण को उलटने के लिए आवश्यक है —

सैन्य प्रशिक्षण,

धर्म-सापेक्ष शिक्षा,

नैतिक अनुशासन,

और सांस्कृतिक पुनर्जागरण।


अन्यथा यह तंत्र केवल वेतनभोगी अधिकारियों का समूह बना रहेगा, जो व्यवस्था को भीतर से खोखला करता रहेगा — और तब हम चाहे जितना विकास करें, राष्ट्र की आत्मा खोती जाएगी।


✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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