सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

"हिन्दू राष्ट्रवाद की चुनौती: कट्टरपंथ, धर्मांतरण और लव जिहाद के विरुद्ध वैचारिक युद्ध"

"हिन्दू राष्ट्रवाद की चुनौती: कट्टरपंथ, धर्मांतरण और लव जिहाद के विरुद्ध वैचारिक युद्ध"

भारत आज एक निर्णायक मोड़ पर खड़ा है, जहाँ सहिष्णुता अब आत्मघाती होती जा रही है। गजवा-ए-हिंद का सपना, जिसे कभी षड्यंत्र सिद्धांत माना गया था, आज भारत की सड़कों, न्यायालयों और मीडिया गलियारों तक पहुँच चुका है। लव जिहाद, लैंड जिहाद, एड्स जिहाद, और वोट जिहाद — ये सब एक बड़े मजहबी मंसूबे के अंग हैं, जिसका उद्देश्य है भारत को भीतर से तोड़कर एक इस्लामी शासन में बदल देना।
 
विश्व हिंदू परिषद ने हमेशा धर्म, समाज और सेवा के माध्यम से काम किया है, पर अब समय आ गया है कि वह गाँव-गाँव जाकर धर्म रक्षा, राष्ट्र रक्षा और जनजागरण का महासंग्राम आरंभ करे। हर हिंदू को अब धर्मयोद्धा बनना होगा — शंखध्वनि से नहीं, संगठन और शिक्षा से

यदि हम आज नहीं जागे, तो कल हमारा अस्तित्व केवल इतिहास की किताबों में रह जाएगा। यह अब धर्मयुद्ध नहीं, अस्तित्व युद्ध है। राष्ट्र या गजवा। सनातन या सन्नाटा।
यह वह समय है जब राष्ट्र को और अधिक चुप रहने का अधिकार नहीं है। यह केवल विचारधारा की लड़ाई नहीं रही, यह अब अस्तित्व की लड़ाई है। जब एक साजिशनुमा नेटवर्क हमारे दरवाजे तक आ चुका है, तब चुप रहना भी एक अपराध बन जाता है। कट्टरपंथी इस्लामवाद ने अब केवल सीमाओं पर हमला नहीं किया, उसने हमारे घरों, हमारी बेटियों, हमारी संस्कृति, हमारी जमीन और हमारी चेतना तक को लहूलुहान कर दिया है। यह जिहाद अब तलवार से नहीं, चालाकी, छल और छद्म सहिष्णुता के लबादे में फैल रहा है, और यह राष्ट्र अब और भ्रम में नहीं रह सकता।

उन्होंने हमारी बेटियों को प्रेम के नाम पर छल किया, उन्हें लव जिहाद के मकड़जाल में फंसाया, फिर या तो धर्मांतरण या मौत। उन्होंने हमारी जमीनें छीनीं, मंदिरों के आसपास के गाँवों को खाली कराया, लैंड जिहाद के माध्यम से एक-एक इंच जमीन पर कब्जा जमाया। उन्होंने शिक्षा को हथियार बनाया, मदरसों के नाम पर कट्टरता बोई, संविधान की आड़ में राष्ट्रविरोधी मानसिकता को पाल-पोसकर खड़ा किया। उन्होंने किन्नरों तक को नहीं छोड़ा, धर्मांतरण और एड्स के माध्यम से उन्हें भी जिहादी प्रयोगशाला में बदलने का प्रयास किया। क्या यह मात्र घटनाएं हैं? या यह एक संगठित इस्लामी आक्रमण का हिस्सा है, जो गजवा-ए-हिंद का सपना आंखों में पाले हर दिन भारत को खोखला करने में जुटा है?

सनातन को उन्होंने केवल धार्मिक दृष्टि से नहीं, सांस्कृतिक, नैतिक, और भावनात्मक रूप से चोट पहुंचाई है। आपने देखा होगा, कोई हिंदू बच्चा अगर गीता पढ़े तो उस पर सवाल उठते हैं, लेकिन मदरसे में आतंकवादी विचारों की घुट्टी पीने वाला समाज का ‘अल्पसंख्यक अधिकार’ बन जाता है। कहीं कोई मुसलमान लिंच होता है तो मीडिया रोती है, लेकिन हिंदू साधुओं को सरेआम मौत के घाट उतार दिया जाए, तो वही मीडिया खामोश रहती है। क्यों? क्या हिंदू की पीड़ा, हिंदू की जान, हिंदू की अस्मिता इस राष्ट्र में मूल्यहीन है?

अब समय है कि राष्ट्र इसका जवाब दे। यह जवाब तलवार से नहीं, चेतना से, कानून से, संगठित सामाजिक कार्यवाही से और जाग्रत राष्ट्रनिष्ठा से दिया जाए। सबसे पहला काम, जनसंख्या नियंत्रण कानून को लागू करना होगा और उसमें धार्मिक आधार पर निगरानी अनिवार्य करनी होगी। मदरसे और वक्फ बोर्ड को पूरी तरह सरकारी नियंत्रण में लाना होगा और उनकी विदेशी फंडिंग पर तुरंत रोक लगानी होगी। लव जिहाद, धर्मांतरण, लैंड जिहाद, वोट जिहाद, मीडिया जिहाद — इन सभी पर कठोर राष्ट्रीय कानून लागू किए बिना यह राष्ट्र सुरक्षित नहीं रह सकता।

समाज को भी अब पूजा-पाठ और त्योहारों से ऊपर उठकर संगठित हिंदू चेतना की ओर लौटना होगा। गाँव-गाँव में संस्कार शालाएं, धर्मशिक्षा केंद्र, और राष्ट्रनिष्ठ युवाओं के दल खड़े करने होंगे। हर हिंदू को अब स्वयं को रक्षा के लिए तैयार करना होगा — मानसिक रूप से, बौद्धिक रूप से और सामाजिक रूप से। अब भी यदि हम सोते रहे तो अगली पीढ़ी को हम एक भारत नहीं, एक इस्लामी बर्बरता में झुलसता हुआ भूगोल देकर जाएंगे।

सरकार को अब ‘वोट बैंक’ की नीति त्यागनी होगी और राष्ट्र को सर्वोपरि मानना होगा। यदि देश की बेटियां सुरक्षित नहीं, यदि संतों का अपमान आम हो गया है, यदि सीमाएं तो दूर घर के भीतर जिहादी षड्यंत्र पनप रहे हैं — तो फिर राष्ट्र केवल नक्शे में ही है, ज़मीन पर नहीं।

हमारा राष्ट्र सनातन है, इसकी आत्मा अजर है, अमर है — लेकिन यदि शरीर को बचाना है तो आत्मा के साथ अब तलवार भी उठानी होगी। कलम को शंख नहीं, शस्त्र बनाना होगा। मंदिर केवल भक्ति के नहीं, शक्ति के केंद्र बनने होंगे। संतों को केवल ध्यान नहीं, राष्ट्ररक्षा का आह्वान करना होगा।

अब युद्ध छिड़ चुका है, यह धर्मयुद्ध है — और इसमें निष्पक्षता नहीं चलेगी। या तो आप सनातन के साथ हैं, या उसके विनाश के पक्षधर। तीसरा विकल्प अब बचा नहीं।

अब समय है कि राष्ट्र उठे, चेतना जागे, संगठन सशक्त हो और इस बार, निर्णायक हो।


जय श्रीराम। जय सनातन। जय भारत।
यदि आप इस लेख से सहमत हैं, तो इसे अधिक से अधिक लोगों तक पहुँचाएँ। संगठन ही रक्षा है। जागो, जुड़ो, और संगठित हो जाओ।
       लेखक
महेंद्र सिंह भदौरिया
प्रांत सेवा टोली सदस्य विश्व हिंदू परिषद
 सामाजिक  कार्यकर्ता 
सब एक फाउंडेशन' के संस्थापक

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