सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिंदुत्व बनाम पहचान की राजनीति: भाजपा का वैचारिक विचलन

भारतीय राजनीति की एक अद्भुत विडंबना यह रही है कि जिसे राजनीति के स्तर पर सामाजिक समरसता लाने का माध्यम होना था, वही सामाजिक विभाजन का उपकरण बन गई। जातिगत समीकरणों, वर्गीय आरक्षणों और तथाकथित सामाजिक न्याय के नाम पर जिस पहचान की राजनीति ने भारत के सामाजिक ताने-बाने को क्षत-विक्षत किया, आज उसी राजनीति को हिंदुत्व की धारा में समाहित करने का प्रयास भारतीय जनता पार्टी द्वारा किया जा रहा है। यह प्रयास न केवल आत्मविरोधी है, अपितु दीर्घकालिक रूप से हिंदू समाज के विघटन का कारण भी बन सकता है।

भाजपा की मूल वैचारिक प्रेरणा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की उस सांस्कृतिक राष्ट्रवाद से उपजी थी, जिसने स्वतंत्रता के बाद हिंदू समाज को एकत्व, आत्मगौरव और सांस्कृतिक चेतना से जागृत किया। किन्तु पिछले कुछ वर्षों में, भाजपा ने अपने ही सिद्धांतों को तिलांजलि देकर, लोहिया-अंबेडकरवादी राजनीति की नकल करनी शुरू कर दी है, जिसमें ओबीसी, दलित और आदिवासी पहचान को प्राथमिकता देकर हिंदू एकता के विचार को पीछे धकेला गया।

वर्तमान परिदृश्य में भाजपा जिस प्रकार ओबीसी, एससी, एसटी, और सवर्ण जैसे जातिगत खांचों में स्वयं को बांटकर प्रतिनिधित्व की राजनीति कर रही है, वह न केवल समाज को पुनः जातीय खांचों में बाँट रही है, बल्कि वह संघ के उस दीर्घकालिक अभियान को भी क्षति पहुँचा रही है, जो "हम सब हिन्दू हैं" की अवधारणा पर टिका था।

वस्तुतः, भाजपा अब तीन नावों की सवारी करने की असफल चेष्टा कर रही है —

1. हिंदुत्वनिष्ठ विचारधारा 

2. एससी आधारित अंबेडकरवादी राजनीति, तथा

3. लोहिया समाजवादी रणनीति।

इस त्रिविध समीकरण में वह न तो पूर्णतया किसी विचार को साध पा रही है, न ही समाज को कोई स्पष्ट वैचारिक दिशा दे पा रही है।

हिंदुत्व कोई चुनावी रणनीति नहीं, बल्कि यह भारतीय सभ्यता का आत्मा-सापेक्ष चिंतन है, जो समाज को जातियों में नहीं, संस्कारों और संस्कृति में देखता है। परंतु विगत वर्षों में भारतीय जनता पार्टी ने जिस प्रकार अपनी वैचारिक धुरी से हटकर अंबेडकरवादी सामाजिक न्याय की राजनीति, लोहियावादी समीकरणों, और हिंदुत्व – इन तीन परस्पर विरोधी विमर्शों की एक साथ सवारी करनी चाही है, वह रणनीति न केवल अव्यावहारिक सिद्ध हो रही है, बल्कि हिंदुत्व के मूल स्वरूप को भी धुंधला कर रही है।

आज स्थिति यह है कि राष्ट्रपति के चयन से लेकर मुख्यमंत्रियों की नियुक्ति, केंद्रीय मंत्रिमंडल, यहाँ तक कि जिला संगठन, मंडल अध्यक्ष जैसे सांगठनिक पदों पर भी जातिगत समीकरणों का गणित हावी होता जा रहा है। 'ओबीसी के इतने मंत्री', 'दलित मुख्यमंत्री', 'अल्पसंख्यक राज्यपाल' – यह भाषा केवल कांग्रेस या समाजवादी दलों तक सीमित नहीं रह गई, अब भाजपा भी उसी social engineering की पिच पर जाकर खेल रही है जिसे वह पहले "तुष्टिकरण" कहकर नकारती थी।

यह जातीय गणना की प्रवृत्ति, सामाजिक न्याय की राजनीति के नाम पर एक भ्रामक अंबेडकरवादी विमर्श को ही पोषित कर रही है, जिसने हिंदू समाज की एकता को खंडित करने, उसे 'सवर्ण बनाम बहुजन' में बाँटने, और अंततः 'हिंदुत्व' को ब्राह्मणवादी अत्याचार का प्रतीक बना देने का षड्यंत्रकारी आधार तैयार किया है।

भाजपा, जिसे संघ परिवार के "एकात्म मानववाद" और "सांस्कृतिक राष्ट्रवाद" के वैचारिक मूल्यों का वाहक माना जाता था, वह अब अपने ही वैचारिक विरोधियों के विमर्श को स्वीकार कर अपनी नीति बना रही है। अंबेडकरवाद, जो स्वयं हिंदुत्व को प्रश्नांकित करता है, ब्राह्मणों को शोषक और वेदों को अन्यायी कहता है, उसके मूल विचारों को आधार बनाकर यदि भाजपा अपनी राजनीतिक गणित साधेगी, तो वह स्वयं अपने वैचारिक अस्तित्व को समाप्त कर बैठेगी।

आज भाजपा के रणनीतिकारों को यह समझ नहीं आ रहा कि हिंदुत्व की राजनीति, अंबेडकरवादी राजनीति और ओबीसी लोहियावादी सोशल इंजीनियरिंग — ये तीनों विचारधाराएँ आपस में अंतर्विरोधी हैं। हिंदुत्व, जहां समाज को सांस्कृतिक रूप से एकात्मता में देखता है, वहीं अंबेडकरवाद जातीय पहचान को संघर्ष का उपकरण बनाकर 'ब्राह्मण बनाम बहुजन' का द्वंद्व खड़ा करता है। दूसरी ओर लोहिया समाजवाद ब्राह्मण विरोध को ही राजनीति का आधार बनाकर 'सामाजिक क्रांति' की बात करता है।

भाजपा ने जब से आरक्षण, जातीय जनगणना, पिछड़ा वर्ग आयोग, दलित प्रतीकों का राजनीतिक दोहन, और ओबीसी नेतृत्व का विस्तार जैसे विषयों को केवल चुनावी समीकरणों के लिए अपनाया, तब से उसका मूल हिंदू एकता का मंत्र कमजोर पड़ा है। यह राजनीति की क्षणिक सफलता के लिए वैचारिक मूल्यों की आहुति है।

इसका सबसे गहरा प्रभाव यह पड़ा है कि संघ और भाजपा द्वारा पोषित नवचेतनशील युवा, जो राम, राष्ट्र और धर्म के लिए खड़े हो रहे थे, अब उन्हें यह लगने लगा है कि यह आंदोलन भी सिर्फ एक और चुनावी जुमला था। जब उन्हें हिन्दू एकता की बात कहकर आंदोलनों में लगाया जाता है, और सत्ता में आते ही जातीय गणना और 'बहुजन राजनीति' शुरू हो जाती है, तो स्वाभाविक रूप से उनका मनोबल टूटता है।

यह भी सत्य है कि भाजपा का नेतृत्व अब वैचारिक आग्रहों की जगह डेटा एनालिसिस, बूथ गणित, इलेक्शन मैनेजमेंट और प्रचारवाद से संचालित हो रहा है। इसमें विचारधारा, संस्कृति और दीर्घकालिक दृष्टि को स्थान नहीं दिया जा रहा। हिंदुत्व अब केवल चुनावी भाषा है, न कि समाज निर्माण का तत्वज्ञान।

2011 से प्रारंभ वैचारिक जागरण और हिंदुत्व की लहर

वर्ष 2011 से सोशल मीडिया की क्रांति के साथ हिंदू समाज के भीतर एक असाधारण वैचारिक उभार प्रारंभ हुआ। हजारों वर्षों से उत्पीड़ित, अपमानित, और दमन की पीड़ा झेलता हिंदू मन इस बार मुखर हुआ। यह वह काल था जब युवा, लेखक, यूट्यूबर, साधारण नागरिक—हर वर्ग के लोग हिंदुत्व की रक्षा में खड़े होने लगे। इस आंदोलन की सबसे बड़ी विशेषता यह थी कि यह कोई कृत्रिम प्रचार नहीं था, अपितु हिंदू जनमानस की अंतर्निहित व्यथा की स्वाभाविक प्रतिक्रिया थी।

2014 में नरेंद्र मोदी के प्रधानमंत्री बनने के साथ यह वैचारिक उभार सत्ता तक पहुँचा। ऐसा प्रतीत हुआ कि अब राजनीति भारत की आत्मा के अनुरूप दिशा लेगी। राम मंदिर, धारा 370, समान नागरिक संहिता, लव-जिहाद, धर्मांतरण, गौरक्षा, और राष्ट्रभक्ति जैसे विषय राजनीति के केंद्र में आने लगे।

परंतु इसी कालखंड में भाजपा एक वैचारिक भ्रम में उलझने लगी।

भाजपा नेतृत्व को यह भय सताने लगा कि यदि पार्टी हिंदुत्व की स्पष्ट बात करेगी, तो उस पर 'ब्राह्मण-बनिया पार्टी' का आरोप न लग जाए। इसी भयवश पार्टी ने ओबीसी और अंबेडकरवादी विमर्श को एक साथ साधने का प्रयास किया — यह जानते हुए भी कि यह तीन नावों की एकसाथ सवारी जैसा असंभव और आत्मघाती प्रयोग है।

यहीं से आरंभ हुआ भाजपा का वैचारिक विचलन।

जातिगत प्रतिनिधित्व की राजनीति : भाजपा का आत्मविस्मरण  

एक समय था जब मंत्रिपरिषद के गठन में कौशल, अनुभव, और राष्ट्रधर्म को प्राथमिकता दी जाती थी। आज स्थिति यह है कि मंत्रिमंडल की सूची बनाते समय पहले यह देखा जाता है — "ओबीसी से कितने?", "एससी से कितने?", "पिछड़ा वर्ग से कितने?"। यह वह नवजातिगत गणना है जो 'प्रतिनिधित्व' की आड़ में समाज को पुनः जातिवादी मानसिकता की ओर धकेल रही है। राज्यपालों की नियुक्ति, राष्ट्रपति का चयन, राज्यों में मुख्यमंत्री तय करने से लेकर, भाजपा संगठन के जिला अध्यक्षों, मंडल अध्यक्षों तक की नियुक्ति में अब सबसे पहले जातीय समीकरण देखा जाता है। यह परिपाटी कांग्रेस, सपा या राजद की नहीं, अब स्वयं "हिंदू हित" के दावा करने वाले संगठन की हो चुकी है।

यह जातिगत संतुलन की राजनीति उसी पहचान की राजनीति (Identity Politics) का एक रूप है, जिसका जन्म स्थान अमेरिका है और जिसे कल्चरल मार्क्सवाद ने उत्पन्न किया। दुर्भाग्यवश भाजपा उसी राजनीति की नकल करने लगी, जिसे वह अब तक नकारती आई थी।

यह भी विडंबना रही कि प्रधानमंत्री स्वयं को “पिछड़ा वर्ग” से बताते हुए स्वयं को ओबीसी राजनीति की धारा में स्थापित करने लगे। जातीय पहचान का यह आक्रामक सार्वजनिककरण भाजपा के विचार से सर्वथा विपरीत था, जिसने दशकों तक जाति विहीन हिंदू एकता की बात की थी।

अराजकता के आगे आत्मसमर्पण और सवर्ण विमुखता

2016 में हैदराबाद विश्वविद्यालय के छात्र रोहित वेमुला की आत्महत्या और उसके बाद उना की घटना—जिसमें दलित युवकों को सार्वजनिक रूप से पीटा गया—ने राष्ट्रव्यापी आक्रोश को जन्म दिया। भाजपा सरकार ने यहाँ भी वामपंथी प्रचार तंत्र के दबाव में आत्मसमर्पण किया।

2018 में सुप्रीम कोर्ट ने एससी-एसटी एक्ट में कुछ कानूनी मर्यादाओं की व्यवस्था की। विपक्ष ने अफवाह फैलाई कि भाजपा आरक्षण समाप्त कर रही है। भारत बंद का आह्वान हुआ, पूरे देश में हिंसा भड़क उठी। इसके बाद केंद्र सरकार ने सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय को ही पलट दिया।

यह निर्णय राष्ट्र-विरोधी तत्वों के समक्ष आत्मसमर्पण की पराकाष्ठा था।

इससे सवर्ण वर्ग को यह स्पष्ट संकेत मिला कि उनके हितों की भाजपा में कोई सुरक्षा नहीं। भाजपा सरकार, हिंसक दबाव के सामने झुककर राष्ट्र की न्याय प्रणाली को भी बाधित करने को तैयार है। यही कारण था कि मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़ जैसे राज्यों में सवर्ण समाज ने भाजपा से दूरी बनाई और चुनाव परिणामों में इसका सीधा प्रभाव देखने को मिला।

आरक्षण पर संघ प्रमुख का विवेकपूर्ण मत और उसका दुष्प्रचार

2015 के बिहार विधानसभा चुनाव से ठीक पूर्व संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने एक तथ्यात्मक और राष्ट्रहितकारी बात कही — कि आरक्षण की समीक्षा होनी चाहिए और जिन वंचित वर्गों को इसका लाभ नहीं मिल रहा, उन्हें मिलना चाहिए। उन्होंने यह भी कहा कि आरक्षण को अनंतकाल तक राजनीतिक स्वार्थवश नहीं चलाया जा सकता।

परंतु विपक्ष, विशेषकर लालू प्रसाद यादव जैसे जातिवादी नेताओं ने इसे “आरक्षण खत्म करने की साज़िश” बताकर ऐसा नैरेटिव गढ़ा कि भाजपा को जाति-विरोधी पार्टी सिद्ध कर दिया गया। नतीजा – भाजपा की करारी पराजय।

यहाँ से भाजपा ने जातिगत संतुलन की राजनीति को और गहरा कर लिया और हर चुनाव में जाति के आधार पर उम्मीदवारों और मंत्रियों का चयन एक घोषित रणनीति बन गया।

2019 से 2024 : पहचान की राजनीति की गहराती खाई

2024 के चुनावों में भाजपा ने "400 पार" का नारा दिया। यह नारा विपक्ष के लिए सुनहरा अवसर बन गया। उन्होंने इसका अर्थ निकाला — भाजपा संविधान बदल देगी, आरक्षण खत्म कर देगी, दलितों-पिछड़ों को समाप्त कर देगी। इस दुष्प्रचार ने विशेषकर ओबीसी और एससी वर्गों में भय उत्पन्न कर दिया।

यहाँ यह तथ्य ध्यान देने योग्य है कि भारत के बहुसंख्यक लोग अब आरक्षण को संवैधानिक अधिकार नहीं, बल्कि जन्मसिद्ध अधिकार मानते हैं। उन्हें लगता है कि आरक्षण बिना जीवन की कल्पना ही नहीं। भाजपा ने इस भावना को न समझते हुए ऐसा व्यवहार किया मानो राष्ट्र का संविधान उसके पक्ष में जनमत नहीं, बल्कि सत्ता का उपकरण है।

परिणामतः 303 से घटकर 240 सीटों तक भाजपा सिमट गई।

जातिगत जनगणना और आत्मघाती आत्मविस्मृति

बिहार में जब जातिगत जनगणना की मांग उठी, तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इसे राष्ट्र की एकता और हिंदू समाज की अखंडता के लिए घातक बताया था। परंतु 2024 के चुनाव परिणामों के बाद ठीक वही सरकार अब केंद्र में जातिगत जनगणना को स्वीकृति देने को तैयार हो चुकी है। जून 2025 में इसके लिए अधिसूचना जारी हो चुकी है।

यह निर्णय भाजपा के उस ऐतिहासिक विरोध के विपरीत है, जिसमें वह जातियों के आधार पर समाज को खंडित करने के षड्यंत्रों का सदैव विरोध करती रही थी।

जातिगत आरक्षण और हिंदू समाज का विघटन

ओबीसी सूची में दर्जनों मुस्लिम जातियाँ शामिल हैं, जो आरक्षण का लाभ उठा रही हैं। ईडब्ल्यूएस कोटा में भी मुस्लिम समुदाय को प्रवेश मिल रहा है। इस प्रकार आरक्षण की पूरी व्यवस्था एक संविधानिक छल बन चुकी है।

यही नहीं, ओबीसी आरक्षण में कुछ प्रभुत्वशाली जातियाँ संपूर्ण कोटा का लाभ अकेले ले रही हैं, और शेष वंचित रह जाती हैं। यही स्थिति एससी समुदाय में भी देखने को मिलती है।

यह लठैत वर्चस्ववादी जातियाँ अब राष्ट्र के समक्ष खड़ी हैं, जो हिंदू समाज के एकीकरण के विरोध में कार्य कर रही हैं। वे मुस्लिम-यादव (MY) और भीम-मिमी जैसे विघटनकारी समीकरण बनाकर हिंदू समाज को खंड-खंड कर रही हैं।

भाजपा को वैचारिक मूल में लौटने की आवश्यकता

यदि भाजपा अब भी न चेती, तो 2029 में राम मंदिर भी उसे न बचा सकेगा। 2014 से 2024 तक भाजपा की सफलता का मूलाधार था — हिंदुत्व का विचार और जनकल्याण की योजनाएँ, न कि जातिगत संतुलन।

हिंदू समाज को एक करने के बजाय जातियों में बाँटना, ब्राह्मण को खलनायक और अन्य को पीड़ित बताना, यह चिंगारी नहीं, एक दिन महाविनाश की ज्वाला बन सकती है। एक समाज को लगातार अपमानित और दूसरे को ‘शोषित’ कहकर महिमामंडित करना, किसी भी राष्ट्र को विघटन के गर्त में ले जाने के लिए पर्याप्त है।

आज आवश्यकता है भाजपा अपने मूल वैचारिक पथ पर लौटे — धर्म, संस्कृति, समरसता और सनातन राष्ट्रवाद के पथ पर। हिंदू समाज को एक करने का यह अंतिम अवसर है। यदि यह अवसर भी व्यर्थ गया, तो ना केवल भाजपा, बल्कि भारत की एकता भी संकट में पड़ सकती है।

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

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