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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
हिन्दू धर्म ही एकमात्र ऐसा सनातन तत्त्वदर्शन है, जिसमें नव-दर्शनों की अखण्ड परंपरा तथा अनेकों सांस्कृतिक विधाएँ विद्यमान हैं।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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हिन्दू धर्म ही एकमात्र ऐसा सनातन तत्त्वदर्शन है, जिसमें नव-दर्शनों की अखण्ड परंपरा तथा अनेकों सांस्कृतिक विधाएँ विद्यमान हैं। इस धर्म और समाज की सामूहिक जीवंत चेतना को समझे बिना कोई यदि यह पूछे कि बिना आमंत्रण के ही जब सत्तर करोड़ हिन्दू प्रयागराज जैसे तीर्थधाम में एकत्र होते हैं, तो उसके मूल भाव को समझे बिना यदि हम उस समाज को पश्चिमी या आब्राह्मिक दृष्टिकोण से आंकने का प्रयास करें, तो वह केवल अज्ञान की चरमावस्था कही जाएगी।
ऐसे विश्लेषणों में जाति, कुल या वंश की गौरवशाली परंपरा को ध्वस्त कर एक 'वर्गहीन समाज' की परिकल्पना की जाती है, जो पूर्णतः साम्यवादी एवं सम्मवादी (Totalitarian) विचारधाराओं की देन है। यह दृष्टिकोण न केवल हिन्दू समाज की रचना-प्रणाली को विकृत करता है, अपितु उसके जीवंत और सुसंस्कृत स्वरूप को भी नष्ट करता है।
जातिभेद, अस्पृश्यता तथा सामाजिक विषमता जैसे संकटों का समाधान केवल हिन्दू धर्म की तात्त्विक चिन्तनधारा, शास्त्रीय परम्पराओं एवं आत्मशुद्धि की सनातन साधना-पद्धति के माध्यम से ही सम्भव है। इन समस्याओं का निराकरण किसी एक जाति, वर्ण अथवा वर्ग को दोषारोपित करके नहीं किया जा सकता; अपितु एक समग्र, तात्त्विक तथा आत्मनिष्ठ दृष्टिकोण ही सनातन समाज की सम्यक् रक्षा एवं धारित स्वरूप की प्रतिष्ठा का मार्ग प्रशस्त कर सकता है।
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