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धर्मेण जयति राष्ट्रम -3 : भारतीय तत्वज्ञान: 21वीं सदी के लिए मानवता की अंतिम आशा


( धर्म के कारण राष्ट्र विजयी होता है।)

  - डॉ. नितिन सहारिया , महाकौशल 



                    यूगऋषि, वेदमूर्ति ,युगदृष्टा पंडित श्रीराम शर्मा आचार्य जी वर्तमान परिस्थितियों में मार्गदर्शन स्वरुप भारतीय धर्म- तत्वदर्शन की प्रासंगिकता के विषय में लिखते हैं कि -  
              " भारत एक देश नहीं, मानवीय उत्कृष्टता एवं संस्कृति का उद्गम केंद्र है। भारतवर्ष धर्म और अध्यात्म का उदयाचल है, जहां से सूर्य उगता और सारे भूमंडल को आलोक से भर देता है। भारतीय संस्कृति को 'विश्व संस्कृति' - 'मानवीय संस्कृति' के रूप में ही जाना माना गया है। संसार के महामानवो ने उसका मूल्यांकन इसी दृष्टि से किया है। इतिहास के पृष्ठों पर इन तथ्यों का सुविस्तृत उल्लेख है कि इस 'देव संस्कृति' का प्रवाह मलयज पवन की तरह समस्त संसार में बिखरा और उसने बिना किसी भेदभाव के हर क्षेत्र को समुन्नत एवं सुसंस्कृति बनाने में भारी योगदान दिया। *किसी समय इस तत्व दर्शन को सर्वत्र 'जगतगुरु' 'चक्रवर्ती' ''धरती का स्वर्ग" जैसे नामो से कृतज्ञता पूर्वक स्मरण किया जाता था। भारत में जन्मने के कारण उसे 'भारतीय संस्कृति' नाम मिल गया । यह एक संयोग मात्र है,* इसमें किसी क्षेत्र विशेष के प्रति आग्रह या पक्षपात नहीं है। भारतीय संस्कृति ने संपूर्ण वसुधा को ही अपना परिवार माना है। 
        अन्य धर्म ,प्रचलनो की तुलना भारतीय संस्कृति से नहीं की जा सकती। *इसे किसी वर्ग ,समुदाय, क्षेत्र या संप्रदाय की मान्यताओं के समर्थन में नहीं गढ़ा गया है। वरन् मानव की सार्वभौम सत्ता को उत्कृष्ट एवं प्रखर बनाने वाले सिद्धांतों का समावेश करते हुए इस स्तर का बनाया गया है* कि उसे हृदयंगम करने वाले, आचरण में उतारने वाले देव मानव की तरह जी सकें।
                   *बीज में वृक्ष की समस्त विशेषताएं सूक्ष्म रूप से विद्यमान रहती हैं। किंतु वे स्वत: विकसित नहीं हो पाती, वे प्रसुप्त ही पड़ी रहती ,यदि अनुकूल परिस्थितियां न मिलती। प्रयत्न पूर्वक उसे अंकुरित, विकसित करके विशाल बनने की स्थिति तक पहुंचाना पड़ता है* । मनुष्य के संबंध में भी तकरीबन यही बात है। सृष्ठा ने उसे सृजा तो अपने हाथों से ही है एवं असीम संभावनाओं से परिपूर्ण भी बनाया है , पर साथ ही इतनी कमी भी छोड़ी है कि विकास के प्रयत्न बन पड़े, तो ही समुन्न्नत स्तर तक पहुंचने का अवसर मिलेगा।
           
              भारत जो प्रकृति की क्रीड़ास्थली है, जिसको प्रकृति ने अपने प्राकृतिक सौंदर्य से विशेष रूप से संवारा है । जहां गंगा ,जमुना एवं गोदावरी की धाराएं संपूर्ण देश को अपने भौतिक एवं आध्यात्मिक अनुदानों से सिक्त करती हैं। हिमालय के शिखरों से दैवी चेतना का सतत्त प्रवाह चलता है। जहां ऋषियों की आध्यात्मिक एवं वैचारिक संपदा अब भी वातावरण में गुंजित होती है । *वही देश जो कभी " स्वर्गादपि गरीयसी" से संबोधित किया जाता था । आज आत्म विस्मृति में पड़ा अपनी गौरव गरिमा को भूल चुका है।* इस देश के 33 करोड़ नागरिक कभी 33 करोड़ देवताओं के रूप में जाने जाते थे। यह *आध्यात्मिक विचारधारा की ही परिणीति थी, जिसने चिंतन एवं चरित्र में, व्यक्तित्व में उतरकर ,देव तुल्य बना दिया था ।* देव मानवों को जन्म देने वाली प्राकृतिक एवं आध्यात्मिक वातावरण से ओत-प्रोत *इस पावन भूमि में अब भी वे विशेषताएं मौजूद हैं- जिनका अवलंबन लेकर मनुष्य को देवोपम -महामानव, भूसुर बनाया जा सके।* 
                 *इस देश के पास ऋषियों की विरासत ,वैचारिक पूंजी है और साथ में प्रकृति का अनुदान भी जिसने प्राच्य से लेकर पाश्चात्य तक सभी मतावलंबियों को प्रभावित किया है। मैक्समूलर से लेकर दाराशिकोह तक की श्रद्धा इसके प्रति समय- समय पर प्रकट होती रही* है। *आज आवश्यकता भारतीय मानस की तमिस्रा को तोड़ने की है, जो तमस में सोया पड़ा है। आत्म विस्मृति को तोड़ने के लिए व्यापक स्तर पर वैचारिक क्रांति की मसाल जलानी होगी।* आलस्य एवं प्रमाद की जड़ता में डूबी जन- चेतना को उस गर्त से निकालने के लिए व्यापक स्तर पर अभियान छेड़ना होगा।
          कभी लोकसेवा -लोककल्याण जनमानस के अंतरंग को उत्कृष्ट बनाने के लिए अपनी सामर्थ्य को सतत नियोजित किए रहना ही हमारा जीवन लक्ष्य हुआ करता था। *स्वामी दयानंद सरस्वती, शंकराचार्य, कुमारिल भट्ट, समर्थ गुरु रामदास ,तुकाराम, चैतन्य महाप्रभु ,कबीर, विवेकानंद, सिख धर्म के 10 गुरु आदि असंख्यो धर्मगुरु लोक मंगल के कार्य में जीवन पर्यंत घोर परिश्रम और परिभ्रमण करते रहे थे। उन्होंने लोक सेवा को जीवन मुक्ति से कहीं अधिक महत्व दिया था।* *भगवान बुद्ध* जब अपनी लीला समाप्त करने लगे तो *उनके शिष्यों ने पूछा* -आप तो अब मुक्ति के लिए प्रयाण कर रहे हैं? *तब बुद्ध ने उत्तर दिया - "जब तक संसार का एक भी प्राणी भव बंधन में बंधा हुआ है, तब तक मुझे मुक्ति की कामना नहीं होगी। मानव जाति के उत्कर्ष के लिए मैं बारंबार जन्म लेता रहूंगा।"* भगवान *बुद्ध के यह शब्द 'धर्म पथ' का अवलंबन लेने वालों को अध्यात्म के वास्तविक लक्ष्य का बोध कराते हैं।* स्वामी दयानंद योग साधना के लिए हिमालय गए किंतु कुछ समय बाद उन्हें ईश्वरी प्रेरणा हुई की - *"लोक सेवा को अपनाये बिना योग साधना का लक्ष्य पूरा नहीं होता।"*  
           *साधना के उपरांत वापस लौटे तो उन्होंने अपना संपूर्ण जीवन ही समाज में संव्याप्त अज्ञान अंधकार को मिटाने में खपा दिया।* पांडित्य और विद्वता की सार्थकता आचरण में है, महामना मालवीय और लोकमान्य तिलक इसके प्रत्यक्ष प्रमाण थे।
                   *भारत का तत्वज्ञान मनुष्य के व्यावहारिक जीवन में समाविष्ट हो सके तो इस भूमंडल पर स्वर्गीय परिस्थितियों का दिग्दर्शन कर सकना संभव है।* मेरा विश्वास है कि जब कभी भी संसार को एकता के सूत्र में आवद्द किए जाने के प्रयत्न होंगे तो इसके लिए *भारतीय तत्वज्ञान से ही दिशा एवं प्रेरणा लेनी होगी।*
                   21वीं सदी के इस भौतिकवादी युग में जबकि *संपूर्ण विश्व की निगाहें भारत की ओर लगी हैं, उसे अपनी चरित्र निष्ठा को जागृत करना होगा।* भौतिक क्षेत्र में इस देश ने अपने पिछले पूर्वाग्रहों को छोड़कर नई करवट ली है। प्रगति के लिए भी उसने नया प्रयास किया है और तदनुरूप सफलताएं भी पाई हैं। परस्पर संपर्क से दूसरों के ज्ञान का लाभ मिला और भौतिक प्रगति का मार्ग प्रशस्त हुआ है। *विकास मार्ग का एक अवरोध समाप्त हुआ। दूसरा कदम उठाना होगा- देश में चरित्र निष्ठा को जगाने का।* 
                 यह संभव हो सके तो *भारतीय संस्कृति एवं उसका तत्वज्ञान अब भी विश्व को दिशा देने में सक्षम है।* विश्व को एकता, समता एवं सुचिता में आवद्द करने में भारतीय संस्कृति पूर्णत: समर्थ है। *देश में इन दिनों आई वैचारिक एवं आध्यात्मिक क्रांति की लहर इसी बात का संकेत देती है कि -भारत अपने सांस्कृतिक गौरव -गरिमा को प्राप्त करने के लिए इस युग संक्रांति काल में प्रयत्नशील रहे तो अगले दिनों वह न केवल अपने अतीत के गौरव को वापस लायेगा वरन् समस्त विश्व का नेतृत्व करेगा, अब यही भारत की नियति है। "* 
क्रमशः .....

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