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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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स्वतंत्रता संग्राम का अर्थ यदि केवल किसी विदेशी शासक के विरुद्ध प्रशासनिक सत्ता प्राप्ति तक सीमित कर दिया जाए, तो हम भारत की वास्तविक ऐतिहासिक चेतना और संघर्ष की गहराई को नष्ट कर बैठते हैं।
भारत की स्वतंत्रता केवल राज्य सत्ता की प्राप्ति का प्रश्न नहीं रहा, वह एक धार्मिक-सांस्कृतिक अस्मिता की रक्षा का शाश्वत संघर्ष रहा है, जो एक सहस्त्राब्दि से भी अधिक समय से जारी है।
वस्तुतः भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम 1857 में नहीं, बल्कि 730 ईस्वी में प्रारंभ हो गया था —
जब राजस्थान की भूमि पर महान गुहिल वंश के संस्थापक बप्पा रावल ने अरब इस्लामी सेनाओं के आक्रमण को परास्त कर भारतवर्ष को सांस्कृतिक दासता से बचाया।
बप्पा रावल के आध्यात्मिक प्रेरणा स्रोत
बप्पा रावल (मूल नाम: कलभोज) का जीवन साधना और सेवा का समन्वय था।
ऐतिहासिक और पौराणिक साक्ष्यों के अनुसार, उन्हें दीक्षा प्राप्त हुई थी गोरक्षनाथ सम्प्रदाय के महान योगी महायोगी गुरु गोहरमत्त नाथ (कुछ ग्रंथों में गोरखनाथ या गोरक्षनाथ के पूर्ववर्ती गुरु) से।
गुरु गोहरमत्त ने बप्पा को केवल आत्मसाक्षात्कार का मार्ग नहीं दिखाया, अपितु उन्हें यह आदेश भी दिया —
"धर्म की रक्षा हेतु, आत्मबल के साथ कर्म-पथ पर बढ़ो।"
यहीं से बप्पा रावल ने राजधर्म को धर्म का अंग मानते हुए एकलिंगेश्वर की कृपा से क्षात्रधर्म स्वीकार किया।
जुनैद अल मर्री का भारत में मजहबी आक्रमण
सन् 712 ईस्वी में सिंध पर अरब सेनापति मोहम्मद बिन क़ासिम के आक्रमण के बाद, भारत की पश्चिमी सीमा पर अब्राहमिक साम्राज्यवाद की नींव पड़ चुकी थी।
लगभग दो दशक पश्चात, अब्बासी खलीफा ने सिंध का गवर्नर बनाया — जुनैद अल मर्री को। उसे आदेश था कि वह भारत में इस्लामी शासन का विस्तार करे।
जुनैद ने 730 ईस्वी से 738 ईस्वी के मध्य राजस्थान, गुजरात, मालवा आदि क्षेत्रों पर आक्रमण किया।
अरब ग्रंथ "फुतूहुल-बुलदान" (अल-बलाधुरी) में वर्णित है कि जुनैद ने अनेक नगरों को नष्ट किया, मंदिरों को लूटा और हिन्दू राजाओं को बंदी बनाकर उन्हें इस्लाम स्वीकारने पर विवश किया।
बप्पा रावल का संग्राम: सनातन धर्म की रक्षा में संगठित प्रतिकार
इस आपदा के समय बप्पा रावल ने मेवाड़, गुजरात, और मध्य भारत के क्षत्रिय एवं जनजातीय समुदायों को संगठित किया।
उन्होंने भील, चावड़ा, सोलंकी, परमार, मौर्य आदि शक्तियों को एकजुट कर एक संयुक्त भारतीय सैन्य मोर्चा खड़ा किया।
सन् 738 ईस्वी में राजस्थान के पश्चिमी सीमांत क्षेत्र में हुआ यह निर्णायक युद्ध —
जहाँ बप्पा रावल की नेतृत्व क्षमता, संगठन शक्ति और धर्मनिष्ठ वीरता के समक्ष अरब सेनाएँ विफल हो गईं।
जुनैद की सेना पराजित हुई और इस्लामी विस्तार की योजना भारत में लगभग दो शताब्दियों तक स्थगित हो गई।
यह संघर्ष क्यों था स्वतंत्रता संग्राम?
स्वतंत्रता संग्राम की परिभाषा केवल राजनीतिक विद्रोह नहीं है। यह सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक और वैचारिक स्वतंत्रता की रक्षा का संघर्ष होता है।
730–738 ईस्वी का यह संग्राम इस दृष्टि से भारत का पहला और पूर्ण स्वतंत्रता संग्राम था क्योंकि:
1. यह एक विदेशी, अब्राहमिक मजहबी साम्राज्य के विरुद्ध संगठित प्रतिकार था।
2. इस संघर्ष का उद्देश्य केवल भू-भाग नहीं, भारत की धार्मिक पहचान, संस्कृति, देवालय, और समाज की रक्षा था।
3. इसने भारत को इस्लामी अधीनता से तत्काल बचाया और धर्माधीन राजनीति की परंपरा स्थापित की।
4. इस संग्राम ने "राज सत्ता ईश्वराधीन है" — यह सिद्धांत स्थापित किया, जब बप्पा रावल ने एकलिंगेश्वर को मेवाड़ का अधिष्ठाता शासक घोषित किया।
1857 का संग्राम: भारत का एक महत्वपूर्ण लेकिन बाद का अध्याय
1857 का विद्रोह अवश्य महत्वपूर्ण था, किंतु वह भारत का पहला स्वतंत्रता संग्राम नहीं था।
वह ईस्ट इंडिया कंपनी के शोषण के विरुद्ध सैन्य और जनविद्रोह था, जिसके मूल में सामाजिक, आर्थिक और धार्मिक असंतोष थे।
वह संगठित रूप में हुआ और स्वतंत्रता का स्पष्ट घोष भी था, किंतु उससे लगभग 1100 वर्ष पूर्व बप्पा रावल का संग्राम न केवल स्वतंत्रता का, बल्कि संस्कृति और धर्म की रक्षा का पूर्ण युद्ध था।
बप्पा रावल और गुरु गोहरमत्त के नेतृत्व में 730–738 ईस्वी में हुआ यह संग्राम भारत का प्रथम संगठित सांस्कृतिक और सैन्य प्रतिकार था।
यह संघर्ष भारत की सनातन चेतना, धार्मिक अस्मिता और सांस्कृतिक आत्मनिर्भरता की रक्षा का प्रतीक था।
भारत का स्वतंत्रता संग्राम केवल 19वीं सदी का राजनीतिक आंदोलन नहीं, बल्कि 8वीं सदी से शुरू हुआ धार्मिक-सांस्कृतिक आत्मरक्षा का क्रमिक संघर्ष रहा है।
अब कल्पना कीजिए — वह समय जब भारत की पश्चिमी सीमा पर अरब इस्लामी सेनाएँ चढ़ आई थीं। सिंध ध्वस्त हो चुका था, राजा दाहिर की हत्या हो चुकी थी, मंदिरों को लूटा जा रहा था, और भय, धर्मांतरण तथा शरीयत के आतंक ने भारतीय सीमाओं पर दस्तक देना शुरू कर दिया था। भारत के सम्मुख यह पहला संगठित मजहबी आक्रमण था, जिसमें तलवार केवल सत्ता नहीं, आत्मा को बदलने का यंत्र बन चुकी थी।
ऐसे समय जब चारों ओर भय व्याप्त था, उस युद्धध्वनि को सबसे पहले जिसने सुना, वह कोई साम्राज्यवादी नहीं, एक साधक था — एक सन्यासी वीर, महाराणा बप्पा रावल।
बप्पा रावल ने केवल तलवार नहीं उठाई — उन्होंने भारत की आत्मा की रक्षा का संकल्प लिया। उन्होंने भारत को अफगानिस्तान और ईरान बनने से रोका — जहाँ कभी वेदों की गूँज थी, वहाँ अब नमाज़ और फतवों की गूंज रह गई है। जहाँ कभी ऋषियों ने अग्निहोत्र किया था, वहाँ आज मंदिरों का नामोनिशान भी नहीं बचा।
यदि बप्पा रावल प्रतिकार न करते, यदि उन्होंने 738 ईस्वी में अरब सेनापति जुनैद अल मर्री को पराजित न किया होता, तो भारत का इतिहास भी उसी दिशा में चला जाता — जहाँ आत्मा मिटा दी जाती है, भाषा बदल दी जाती है, परंपराएँ भुला दी जाती हैं, और धर्म तलवार के आगे हार मान लेता है।
उनके बाद जब तुर्क, खिलजी, तुगलक, मुगल और औरंगज़ेब जैसे आक्रांताओं ने भारत की संस्कृति पर चोट की — तब फिर उनके वंशज खड़े हुए।
राणा सांगा ने बाबर के विरुद्ध रणभूमि में ललकारा।
महाराणा प्रताप ने अकबर जैसे सम्राट के आगे झुकने से इनकार कर दिया, जंगल में घास की रोटियाँ खाईं, किंतु धर्म और स्वाभिमान से समझौता नहीं किया।
उनके शौर्य की प्रेरणा यही थी कि राज्य एक यथार्थ है, पर धर्म सत्य है — राज्य छोड़ा जा सकता है, पर सत्य नहीं।
यदि इन राणाओं ने समय-समय पर मुगलों को नहीं रोका होता, यदि वे अकबर की नीतियों में विलीन हो गए होते -
तो आज भारत की चेतना भी इतिहास की कब्र में दफ्न होती।
काशी, कांची, उज्जैन — इन सबका स्वरूप वैसा न होता जैसा आज है।
हमारा वेद, हमारा गीता, हमारा राम — सब कुछ उपहास का विषय बना होता।
भारत का आज का अस्तित्व, उसका धर्म, उसकी परंपरा और उसकी भाषा — यह सब इसलिए जीवित है क्योंकि किसी समय मेवाड़ ने झुकना स्वीकार नहीं किया था।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी
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