सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

राष्ट्र निर्माण की त्रयी: श्रम, पूंजी और सांस्कृतिक चेतना

आज एक मित्र से संवाद हो रहा था। विषय था— देश में बढ़ती असमानता, भूख, जलवायु संकट और पूंजीपतियों का प्रभुत्व। वे अत्यंत उद्वेलित स्वर में बोले, “क्या यह देश अब केवल अम्बानी-अडानी का रह गया है? एक तिहाई आबादी को दो वक्त की रोटी नहीं मिलती और कुछ लोगों के पास सब कुछ है। पर्यावरण की दुर्दशा ऐसी कि 2035 में जो तापमान बढ़ना था, वह 2025 में ही बढ़ गया। सोनम वांगचुक जैसे पर्यावरणविद् समाधान देते हैं, लेकिन उन्हें गद्दार कहा जाता है। क्या यह देश अंधकार की ओर नहीं जा रहा?”

कुछ क्षणों के लिए मैं भी मौन हो गया। लगा कि वाकई सब कुछ नकारात्मक ही है। लेकिन तभी मन के भीतर कहीं स्मृति के तल से एक आवाज़ उठी— क्या हम हर चीज़ को केवल एक कोण से देख रहे हैं? क्या जो दीख रहा है, वही सम्पूर्ण सत्य है?

जब मैंने सोचा कि सोनम वांगचुक की बात हो रही है, तो स्मृति में वह प्रसंग कौंध गया जब लद्दाख में सीमा के पास बन रहे सामरिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट्स को कुछ पर्यावरणविदों ने रोकने की कोशिश की थी। यह वही क्षेत्र है जहाँ चीन अपनी घुसपैठ की रणनीति रचता है। यही कहानी हमने तमिलनाडु में देखी, जहाँ एक्टिविस्टों ने स्टरलाइट कॉपर प्लांट बंद करवा दिया, और आज भारत ताँबा आयात कर रहा है।

जम्मू-कश्मीर में दुनिया का सबसे ऊँचा रेलवे पुल बन रहा है—एक असाधारण उपलब्धि—जिससे हमारी सेना तक पहुँच आसान हो सकेगी। लेकिन उसे भी “पर्यावरण के नाम पर” रोका गया। कल्पना कीजिए, यदि युद्ध की घड़ी आ जाए और हमारी सेनाएँ रसद के बिना रह जाएँ, तो क्या यह ‘पर्यावरण रक्षा’ कहलाएगी या राष्ट्रीय संकट को आमंत्रण?

हमारे ऋषि कहते थे —

> "प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः।"
(गीता 3.27)
प्रकृति के गुणों द्वारा ही सब कर्म होते हैं। जो यह समझता है, वह कर्म के यथार्थ को जानता है।

यदि हम प्रकृति के साथ संतुलन की भाषा नहीं, बल्कि डर और निष्क्रियता का प्रचार करेंगे, तो हम प्रकृति की नहीं, राष्ट्र की आत्मा की हत्या कर रहे होंगे।

वर्ष 1955 में, जब भारत के श्रमिक आंदोलनों पर वामपंथी विचारधारा का प्रभाव बढ़ रहा था, तब श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी ने यह अनुभव किया कि यदि श्रमिकों को विदेशी विचारों और वर्ग-संघर्ष की मानसिकता से नहीं उबारा गया, तो वे राष्ट्रविरोधी शक्तियों का उपकरण बन सकते हैं। ऐसे विचारों से प्रेरित होकर उन्होंने 23 सितम्बर 1955 को भारतीय मजदूर संघ की स्थापना की — एक ऐसा संगठन जो भारत की आत्मा, उसकी परंपरा और उसके सांस्कृतिक मूल्यों से जुड़ा हो।

भारतीय मजदूर संघ का उद्देश्य केवल श्रमिकों के वेतन या सुविधाओं के लिए संघर्ष करना नहीं था, अपितु श्रमिकों में यह चेतना जगाना था कि वे इस राष्ट्र के अंग हैं—जैसे शरीर में हृदय, मस्तिष्क और हाथ—उसी प्रकार राष्ट्र के निर्माण में उनका परिश्रम, उनकी निष्ठा, और उनकी भूमिका अनिवार्य है।

भारतीय मजदूर संघ ने एक नई दिशा दी—संघर्ष नहीं, समन्वय; टकराव नहीं, सहयोग; विघटन नहीं, निर्माण। इस संगठन ने कभी अराजक आंदोलन नहीं चलाए, न ही हिंसात्मक हड़तालों का समर्थन किया। उसने कहा कि यदि उद्योग चलेगा, तो श्रमिक का पेट भी भरेगा; और यदि राष्ट्र चलेगा, तो सबका कल्याण सुनिश्चित होगा।

जहाँ वामपंथी संगठन श्रमिकों को मालिक के विरुद्ध खड़ा करते थे, वहीं बीएमएस ने कहा कि मालिक, श्रमिक और राष्ट्र – ये तीनों एक त्रिकोण के तीन कोने हैं। यदि कोई एक गिरा, तो शेष दो भी स्थिर नहीं रह सकते। इसी समन्वयी दृष्टिकोण के कारण बीएमएस ने अनेक उद्योगों में औद्योगिक शांति स्थापित की और देश को आर्थिक दृष्टि से स्थिरता प्रदान की।

इसके अतिरिक्त, भारतीय मजदूर संघ ने सदैव स्वदेशी को प्राथमिकता दी। उसने बहुराष्ट्रीय कंपनियों के अंधाधुंध विस्तार, उपभोक्तावादी संस्कृति और स्थानीय कुटीर उद्योगों के दमन का विरोध किया। वह ‘मेक इन इंडिया’ जैसे विचारों का समर्थन करने वाला सबसे पहला संगठन था, जिसने आत्मनिर्भर भारत की नींव वैचारिक रूप से बहुत पहले ही रख दी थी।

आज जब हम ‘राष्ट्र निर्माण’ की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि एक राष्ट्र की आत्मा उसकी श्रम संस्कृति में निहित होती है। यदि श्रम केवल वेतन के लिए हो, यदि श्रमिक स्वयं को राष्ट्र से कटकर देखे, और यदि उसकी चेतना केवल अपने अधिकारों तक सीमित हो, तो वह राष्ट्र के लिए उपयोगी नहीं रह पाता। लेकिन जब श्रम ‘कर्म’ बन जाए, जब श्रमिक राष्ट्रधर्म को समझे, और जब वह अपने परिश्रम को भारतमाता के चरणों में अर्पित समझे, तब वह निर्माण करता है — केवल भवनों का नहीं, वरन् राष्ट्र की आत्मा का।

भारतीय मजदूर संघ ने यही किया है। उसने श्रमिक को केवल माँग करने वाला नहीं, बल्कि राष्ट्र का सेवक बनाया। उसने श्रमिक आंदोलन को पश्चिमी हिंसक परंपराओं से मुक्त करके भारत की सांस्कृतिक चेतना से जोड़ा। यही उसकी सबसे बड़ी भूमिका है राष्ट्र निर्माण में।

उनका चिंतन विशुद्ध भारतीय था—न समाजवाद का अंधानुकरण, न पूंजीवाद की नकल। वे कहते थे कि भारत को उसका अपना "हिन्दू आर्थिक मॉडल" चाहिए, जो न्याय, करुणा और स्वधर्म पर आधारित हो।
1955 से 1990 तक का भारत—यह एक ऐसा समय था जब सरकार ही अर्थव्यवस्था की सर्वेसर्वा थी। एक सुई बनाने के लिए भी सरकारी लाइसेंस चाहिए होता था। उद्यमिता को शंका की दृष्टि से देखा जाता था, पूंजी को शोषण का प्रतीक मान लिया गया था।

फलस्वरूप, देश धीरे-धीरे आर्थिक पतन की ओर बढ़ने लगा। विदेशी मुद्रा भंडार घटता गया, महँगाई बढ़ती गई, और आत्मनिर्भरता के नाम पर हम आत्महत्या के कगार पर पहुँचने लगे। 1990 तक भारत लगभग दिवालिया हो चुका था।
परन्तु 1991 में एक मोड़ आया। आर्थिक उदारीकरण हुआ। सरकार ने नियंत्रण छोड़े, लोगों को उद्यम की स्वतंत्रता मिली।
इसी कालखंड में टाटा, अंबानी, नारायणमूर्ति, और अनेक उद्यमी उभरे जिन्होंने भारत को सूचना क्रांति, इन्फ्रास्ट्रक्चर, स्टार्टअप और डिजिटल इंडिया के मार्ग पर अग्रसर किया।

आज 2025 में भारत न केवल तीसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था बनने की ओर है, बल्कि एक ऐसा राष्ट्र बन चुका है जो स्वदेशी तकनीक, स्वदेशी निवेश और आत्मनिर्भरता की राह पर चल रहा है।

हिन्दू दर्शन कभी भी सम्पत्ति का विरोध नहीं करता। लक्ष्मी हमारे पूज्य देवी हैं। परंतु वह लक्ष्मी धर्म और करुणा के साथ अर्जित हो, तभी कल्याणकारी होती है।
यहाँ गहराई से विचार करने की जरूरत है: धर्म या संस्कृति हमें सिखाती है संतुलन की भाषा। सनातन चिंतन हमें ‘विपुल दृष्टि’ देता है, जिससे हम विकास की राह को बाधित नहीं करते, बल्कि उसे सहमार्ग प्रदान करते हैं। यह मार्ग निर्माण, संरक्षण और दायित्व का संयोजन होता है।

> ईशोपनिषद् में कहा गया है—

**"तेन त्यक्तेन भुञ्जीथा"**  
*(“त्याग करोगे, तब भोग पाओगे।”)*
अर्थात्—‘व्यवस्थित सत्ता में, विवेकपूर्ण सहयोग आवश्यक है।’

भगवद्गीता में श्रीकृष्ण कहते हैं:

> "स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः"
(अपने स्वभाव के अनुरूप कर्म करना ही श्रेष्ठ है, चाहे उसमें मृत्यु क्यों न हो।)

हिन्दू आर्थिक दृष्टिकोण यह कहता है कि ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य, शूद्र—सबका कार्य विभाजित है, और सबकी भूमिका समाज की समग्र उन्नति के लिए आवश्यक है। वैश्य वर्ग की सेवा—व्यापार, धन संग्रह, और वितरण—पूरे समाज को पुष्ट करती है।

जब हम कहते हैं कि कुछ चंद लोगों के पास संपत्ति है, तो यह नहीं भूलना चाहिए कि वही लोग देश के लाखों लोगों को रोजगार भी देते हैं, अस्पताल बनाते हैं, स्कूल चलाते हैं, और नवाचार लाते हैं।
हमारा लक्ष्य पूंजी को अपवित्र मानना नहीं, बल्कि पूंजी को राष्ट्रसेवा का माध्यम बनाना होना चाहिए।

उद्यमेन हि सिद्ध्यन्ति कार्याणि न मनोरथैः।”
(कार्य केवल कल्पना से नहीं, उद्यम से ही सिद्ध होते हैं।)

देश में समस्याएँ हैं, इसमें कोई संदेह नहीं। पर समाधान केवल दोषारोपण नहीं, अपितु संतुलित विचार, समर्पित कार्य और सकारात्मक दृष्टिकोण में छिपा है।

> "उद्धरेदात्मनात्मानं नात्मानमवसादयेत्।"
(— गीता 6.5)
“मनुष्य को चाहिए कि वह स्वयं अपना उद्धार करे, न कि अपने को नीचे गिराए।”

यदि हम हर उपलब्धि में खोट ढूँढेंगे, तो हम प्रगति को ही बाधित करेंगे। लेकिन यदि हम समाज के हर वर्ग को उसके कर्म, गुण और योगदान के अनुसार सम्मान देंगे, तो भारत केवल आर्थिक शक्ति नहीं, एक धर्म-आधारित विश्वगुरु के रूप में उभरेगा।

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

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