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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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कभी-कभी इतिहास भविष्य की ओर देखता है और मौन होकर आर्त स्वर में विलाप करता है। ऐसा लगता है कि जो होने वाला है, वह अवश्यंभावी नहीं था—हमने उसे टालने के सभी अवसर खो दिए। आज जो संघर्ष वैचारिक स्तर पर दिखता है, यदि उसका समाधान न खोजा गया, तो वह कल सामाजिक अस्थिरता का रूप ले सकता है—और तब समाज केवल पछतावे के आंसुओं से ही संतोष कर सकेगा।
वर्तमान भारतवर्ष की स्थिति हृदय को पीड़ा से भर देती है। जातीय, भाषायी, लैंगिक और धार्मिक आधारों पर समाज में असंगति की रेखाएँ उभर आई हैं। हिन्दू समाज, जो सहस्राब्दियों तक अनेक आघातों को सहते हुए एक सूत्र में बंधा रहा, आज भीतर ही भीतर विभाजन की ओर बढ़ता प्रतीत होता है। यह विघटन आकस्मिक नहीं है—बल्कि कुछ शक्तियों द्वारा प्रवाहित विचारधाराओं का क्रमिक परिणाम है।
आज जिन प्रमुख शक्तियों की वैचारिक उपस्थिति समाज में विभाजन उत्पन्न कर रही है, उनमें—धार्मिक कट्टरता, सांस्कृतिक उपनिवेशवाद और वैचारिक वामपंथ सम्मिलित हैं। इनमें से प्रत्येक अपने-अपने ढंग से समाज की परंपरागत एकता, विशेषतः हिन्दू सांस्कृतिक ताने-बाने को प्रभावित कर रहा है।
इस संदर्भ में यह समझना आवश्यक है कि "ब्राह्मण-विरोध" कोई आधुनिक राजनैतिक प्रतिक्रिया मात्र नहीं, बल्कि एक गहरे वैचारिक विमर्श का हिस्सा बन चुका है, जिसकी जड़ें औपनिवेशिक और उससे पूर्व के काल में भी देखी जा सकती हैं।
मध्यकालीन आक्रमणों के समय भारत की शास्त्रीय परंपरा, शिक्षा प्रणाली, धार्मिक संस्थाएँ तथा सामाजिक संरचना को व्यवस्थित रूप से विघटित करने के प्रयास हुए। चूँकि ब्राह्मण वर्ग उस समय इन संस्थाओं के प्रमुख संरक्षक थे, वे इस विध्वंस का पहला लक्ष्य बने। अनेक ऐतिहासिक संदर्भों में इस प्रकार की घटनाएँ देखी जा सकती हैं—किन्तु यह विरोध समस्त समाज या जाति के प्रति नहीं था, अपितु उस भूमिका के प्रति था, जिसे वे उस समय निभा रहे थे।
ब्रिटिश औपनिवेशिक शासनकाल में इस प्रक्रिया को और भी अधिक संस्थागत स्वरूप मिला। “फूट डालो और शासन करो” की नीति अंतर्गत हिन्दू समाज को जातीय आधार पर विभक्त करने के लिए शैक्षणिक और वैचारिक प्रयोग किए गए। मैकॉले की शिक्षा प्रणाली, 'आर्य-द्रविड़' सिद्धांत, और ब्राह्मणों के विरुद्ध फैलाई गई सामाजिक धारणाएँ इसी का भाग थीं। इस प्रवृत्ति का उद्देश्य हिन्दू समाज की एकात्मता को खंडित कर अंग्रेजी सत्ता को स्थायित्व देना था।
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत अपेक्षा की जाती थी कि समाज इन औपनिवेशिक धाराओं से मुक्त होगा—किन्तु दुर्भाग्यवश, अनेक संस्थागत नीतियाँ, शैक्षणिक पाठ्यक्रम तथा मीडिया में उपस्थित विचारधाराएँ आज भी उसी दिशा में प्रवाहित हो रही हैं। "ब्राह्मणवाद", "मनुवाद" जैसे शब्द, जो कभी विशिष्ट सामाजिक संरचनाओं की आलोचना हेतु प्रयुक्त होते थे, अब सामान्यीकृत होकर समस्त हिन्दू परंपरा पर आरोप का माध्यम बन चुके हैं।
ब्राह्मणों को जातीय शोषण का प्रतीक बना दिया गया।
"ब्राह्मणवाद" और "मनुवाद" जैसे शब्दों को हिन्दू संस्कृति की व्याख्या का प्रमुख उपकरण बना दिया गया।
यह केवल वैचारिक विष नहीं था—इसका परिणति रूप हिंसा में भी प्रकट हुआ। इतिहास गवाह है कि बंगाल, केरल, कश्मीर, मराठवाड़ा और नालंदा जैसे क्षेत्रों में ब्राह्मणों के विरुद्ध नरसंहार हुए हैं।
आज जिस प्रकार ब्राह्मण-विरोध का प्रचार हो रहा है, वह केवल विमर्श की बात नहीं—यह उस विनाश की प्रस्तावना है जो अफ्रीका में श्वेत-विरोधी 'व्हाइट गिल्ट' और 'व्हाइट एलीमिनेशन' के रूप में देखा जा चुका है। जब समाज की प्रत्येक समस्या का दोष केवल एक जाति पर आरोपित किया जाए—तो वह स्थिति समाज को नरसंहार की मानसिकता की ओर ले जाती है।
यह आवश्यक है कि हम आलोचना और निंदा में अंतर करें। जहाँ स्वस्थ आलोचना समाज को उन्नति की ओर ले जाती है, वहीं एकपक्षीय निंदा और पूर्वाग्रह सामाजिक वैमनस्य को जन्म देती है। यदि किसी समाज की समस्त समस्याओं का उत्तर केवल एक वर्ग या जाति को ठहराया जाए, तो यह सामाजिक संतुलन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है।
वर्तमान में, अनेक विश्वविद्यालयों, मीडिया संस्थानों और राजनीतिक विमर्शों में ऐसा वातावरण निर्मित हो रहा है जहाँ हिन्दू परंपरा के विभिन्न आयामों की समीक्षा नहीं, बल्कि निषेध हो रहा है। इसका परिणाम यह है कि युवाओं के भीतर अपनी सांस्कृतिक पहचान के प्रति भ्रम, अपराधबोध और अस्वीकार की भावना जन्म ले रही है।
पूर्वोत्तर भारत, विशेषतः बंगाल, असम और त्रिपुरा—अब सांस्कृतिक रूप से हिन्दुओं का नहीं रहा। वहाँ मंदिरों को जलाया नहीं जाता—क्योंकि उनके चारों ओर अब हिन्दू ही नहीं बचे। बांग्लादेशी घुसपैठियों ने भाषा, भूषा, शासन और संस्कार सभी को बदल डाला है। जो हिन्दू शेष हैं, वे अपने अस्तित्व को छिपाकर, भयग्रस्त होकर जीवन जी रहे हैं।
दक्षिण भारत, विशेषतः केरल और तमिलनाडु—अब उस वैदिक संस्कृति को ही नकार रहे हैं, जिसकी ऊर्जा से उनके मन्दिर जीवन पाते थे। केरल में वामपंथ-इस्लामी गठजोड़ ने लव जिहाद, मंदिर अधिग्रहण, त्योहारों पर नियंत्रण आदि के माध्यम से हिन्दू अस्मिता को रौंद डाला है। वहीं तमिलनाडु में ब्राह्मण-विरोध अब एक नारा नहीं, अपितु राज्य संरक्षित वैचारिक प्रणाली बन चुका है।
उत्तर एवं पश्चिम भारत, जहाँ हिन्दू नवजागरण की ज्वाला जला करती थी, अब जातीय रेखाओं में विभक्त हो चुका है। हर नेता जाति के आधार पर मतदाताओं को लामबंद कर रहा है; हर जाति स्वयं को शोषित सिद्ध कर रही है; और हर सार्वजनिक बहस इस निष्कर्ष पर समाप्त होती है—“दोषी तो ब्राह्मण ही है।”
इन सभी परिस्थितियों के मध्य यह चिंता स्वाभाविक है कि यदि यह वैचारिक प्रवृत्ति बिना संतुलन के निरंतर चलती रही, तो आने वाले दशकों में सामाजिक विघटन और परस्पर अविश्वास का वातावरण गहरा सकता है। 2027 में संभावित जातिगत जनगणना के परिणाम, यदि राजनीतिक स्वार्थों की पूर्ति हेतु प्रयोग किए गए, तो समाज में प्रतिस्पर्धा, आरोप और अंततः आक्रोश का विस्फोट भी संभव है।
हमें यह स्मरण रखना चाहिए कि कोई भी समाज केवल आँकड़ों, नारों या वर्गों से नहीं चलता—वह सामूहिक चेतना, आपसी विश्वास और संवाद से चलता है।
होगा,
जब ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र—एक-दूसरे को दोष देकर स्वयं दुर्बल हो चुके होंगे,
तब वे शक्तियाँ—चर्च, जिहाद और वामपंथ—जो अभी छाया में छिपी हुई हैं,
एक साथ झपट्टा मारेंगी।
और यह आकस्मिक नहीं होगा।
यह आरंभ होगा 2037 के आसपास,
जब समाज भाषा, जाति, क्षेत्र और धर्म के आधार पर अपने स्वरूप को पुनः परिभाषित करना प्रारंभ करेगा।
2042 तक, यदि यह वैचारिक ज्वर शीत नहीं पड़ा, तो हिन्दू समाज की भूमि पर पहला संगठित नरसंहार आरंभ होगा—पहले जाति के नाम पर, फिर धर्म के नाम पर।
यदि हम यह नहीं करेंगे, तो भविष्य में उत्पन्न विघटन के लिए कोई बाह्य शक्ति उत्तरदायी नहीं होगी—बल्कि हमारी ही चुप्पी, निष्क्रियता और पूर्वाग्रह उसके कारण होंगे।
और तब इतिहास फिर मौन होकर रोएगा… यह कहकर—
हमें चेताया गया था।"
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी
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