सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

कल्चरल मार्क्सवाद और भारतीय संस्कृति पर उसका घातक प्रभाव



भारत में सेक्युलरिज्म और समाजवाद की जो व्याख्या और राजनीति बनी, उसमें कांग्रेस पार्टी की भूमिका अत्यंत महत्वपूर्ण रही है। खासतौर पर 1975 के आपातकाल के दौरान, जब इंदिरा गांधी को सत्ता बनाए रखने के लिए वामपंथी समर्थन की आवश्यकता महसूस हुई, तब उन्होंने देश की शिक्षा प्रणाली, मीडिया, कला, और मनोरंजन जैसे संवेदनशील क्षेत्रों को पूरी तरह वामपंथी विचारधारा के नियंत्रण में दे दिया। इससे पहले, उनके पिता पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 1955 में पंचवर्षीय योजना के तहत समाजवादी आर्थिक मॉडल को देश में लागू किया था।

1976 में संविधान के 42वें संशोधन ने देश के संविधान में ‘सेक्युलरिज्म’ और ‘समाजवाद’ जैसे शब्दों को शामिल कर दिया, जिससे भारत की राजनीतिक-आर्थिक दिशा स्पष्ट रूप से वामपंथी और समाजवादी विचारों के अनुकूल हो गई। आर्थिक रूप से सोवियत संघ के विघटन के बाद भारत को मजबूरन उदारीकरण करना पड़ा, जिससे कुछ हद तक बाजार स्वतंत्र हुआ, लेकिन शिक्षा, मीडिया और सांस्कृतिक क्षेत्रों में वामपंथी प्रभुत्व कायम रहा।

इस वामपंथी प्रभाव ने भारतीय समाज में ‘कल्चरल मार्क्सवाद’ के रूप में एक नया सांस्कृतिक युद्ध छेड़ दिया। यह विचारधारा पारंपरिक सामाजिक-सांस्कृतिक ढांचे को तोड़ने और उसे पुनर्निर्मित करने का प्रयास करती है। इसके तहत समाज को विभिन्न द्वैतों में बाँटने का प्रयास होता है — जैसे राम और रावण, गोरा और काला, पुरुष और महिला, उद्योगपति और मजदूर, ये जाति वह जाति, ये समाज वह समाज। इस द्वैतवाद के कारण समाज में फूट पैदा होती है और सामूहिक एकता कमजोर पड़ती है।

कल्चरल मार्क्सवाद का प्रमुख लक्ष्य हिंदू परिवार, धार्मिक परंपराओं, और सांस्कृतिक संस्थानों को कमजोर करना है। यह धार्मिक रीति-रिवाजों को अंधविश्वास की संज्ञा देकर खारिज करता है। मठ-मंदिर, आश्रम, धर्मशालाओं जैसी संस्थाओं की उपयोगिता को कम करके इन्हें समाज के लिए अप्रासंगिक साबित करने की कोशिश करता है।

फ्रैंकफर्ट स्कूल की 11 बिंदुओं वाली योजना, जो कल्चरल मार्क्सवाद की नींव है, भारत में भी साफ दिखने लगी है। इनमें से कुछ मुख्य बिंदु इस प्रकार हैं:

1. जातिवाद या नस्लभेद के मामलों की नई परिभाषाएं बनाना, जिससे समाज में गलतफहमी और तनाव बढ़े।


2. निरंतर सामाजिक बदलाव की प्रक्रिया से लोगों के मन में असमंजस और भ्रम बनाए रखना।


3. बच्चों को कम उम्र से यौन शिक्षा, समलैंगिकता और पहचान-राजनीति की बातें सिखाकर उनकी सोच को प्रभावित करना।


4. स्कूलों और शिक्षकों की प्रतिष्ठा को गिराकर बच्चों में अनुशासन की कमी पैदा करना।


5. बड़ी संख्या में बाहरी लोगों को देश के विभिन्न इलाकों में बसाकर सांस्कृतिक एकरूपता को कमजोर करना।


6. शराब और नशे को बढ़ावा देना, जिससे सामाजिक समस्याएं बढ़ें।


7. धार्मिक स्थलों खासकर चर्चों को खाली कराना या लोगों को धर्म से दूर करना।


8. ऐसी न्याय व्यवस्था तैयार करना जो अपराधी के पक्ष में हो और पीड़ित को न्याय न मिले।


9. लोगों को सरकार और सरकारी योजनाओं पर पूरी तरह निर्भर बनाना, जिससे उनकी आत्मनिर्भरता खत्म हो।


10. मीडिया को नियंत्रित कर जनता को भ्रमित करना और उनकी सोचने-समझने की क्षमता को कम करना।


11. परिवार को तोड़ने वाले विचारों को बढ़ावा देना, जिससे पारंपरिक परिवार के मूल्य समाप्त हो जाएं।



इन सभी बिंदुओं के जरिए कल्चरल मार्क्सवाद तीन प्रमुख तरीकों से कार्य करता है:

एक ओर, पारंपरिक और स्थापित मूल्यों के मुकाबले नए और भ्रमित करने वाले विकल्प पेश करता है।

दूसरी ओर, झूठ या आंशिक सत्य को इस तरह प्रस्तुत करता है कि लोग उसे सही मानने लगें।

और अंत में, अपने विचारों को शिक्षा, मीडिया और सरकार के माध्यम से समाज में धीरे-धीरे फैलाता है।


इस प्रक्रिया के तहत भाषा, जाति, लिंग, और पहचान आधारित साहित्य, राजनीति, और आंदोलनों के माध्यम से सामाजिक विखंडन को बढ़ावा दिया जा रहा है। नारीवादी और समलैंगिक आंदोलनों का प्रयोग परिवार व्यवस्था को कमजोर करने और हिंदू सांस्कृतिक मूल्यों को खत्म करने के लिए किया जा रहा है।

धार्मिक आस्था को अंधविश्वास की संज्ञा देना, धार्मिक संस्थानों की उपयोगिता को कमतर समझना, और सांस्कृतिक रीति-रिवाजों को बदनाम करना इस पूरे आंदोलन का हिस्सा है। ये प्रयास हमारी सांस्कृतिक विरासत को नष्ट करने की दिशा में हैं।

इस व्यापक बदलाव के कारण हमारे समाज में अस्थिरता, वैचारिक भ्रम और सांस्कृतिक पतन के लक्षण तेजी से देखने को मिल रहे हैं।



दीपक कुमार द्विवेदी

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