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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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संविधान के नाम पर हिन्दू समाज के किताबीकरण का षड्यंत्र
भारत की सनातन संस्कृति सहस्राब्दियों से प्रवाहमान रही है। इसकी सबसे बड़ी विशेषता इसकी अंतर्निहित विशालता है, जो भिन्न-भिन्न विचारों, पंथों, परंपराओं और मतों को आत्मसात करने में सक्षम रही है। हिन्दू समाज कभी किसी एक ग्रंथ, एक पैगंबर, या किसी निश्चित विचारधारा का अनुयायी नहीं बना। इसकी धार्मिक, दार्शनिक और सांस्कृतिक चेतना लोकजीवन से उत्पन्न हुई, जिसे किसी एक संविधान या किताब तक सीमित नहीं किया जा सकता।
किन्तु, पिछले कुछ दशकों से हिन्दू समाज को कृत्रिम रूप से एक "किताबी समाज" बनाने का षड्यंत्र चल रहा है। इसके पीछे का उद्देश्य यह है कि हिन्दू समाज अपनी सनातन परंपराओं, अपने धर्मशास्त्रों और अपने सांस्कृतिक आधारों को भूल जाए और केवल संविधान रूपी किताब को ही अंतिम सत्य मानकर उसका पालन करे। इस सोच का सबसे बड़ा दुष्परिणाम यह होगा कि हिन्दू समाज की स्वाभाविक चेतना समाप्त हो जाएगी, और वह अपनी जड़ों से कटकर एक निर्जीव समाज में बदल जाएगा।
हिन्दू समाज की जीवंतता महाकुंभ जैसे आयोजनों में स्पष्ट रूप से देखी जा सकती है। जब 45 दिनों में 66 करोड़ से अधिक हिन्दू प्रयागराज में संगम स्नान के लिए एकत्र होते हैं, तो वहाँ कोई जातिगत, भाषागत, क्षेत्रीय या वर्गगत भेद नहीं रहता। प्रत्येक व्यक्ति केवल एक सनातनी हिन्दू के रूप में वहां उपस्थित होता है। एक वृद्ध अपने छोटे पौत्र को संगम में स्नान कराता है—यह केवल स्नान नहीं, बल्कि संस्कारों का हस्तांतरण है, परंपरा का पुनरुत्थान है।
"संस्कृति सबकी एक चिरंतन, खून रगों में हिन्दू;
विराट सागर समाज अपना, हम सब इसके बिंदु।"
हिन्दू समाज एक विराट सागर के समान है, जिसमें प्रत्येक व्यक्ति एक जलबिंदु की भाँति सम्मिलित है। इसमें सहस्रों मत, पंथ और परंपराएँ एक साथ प्रवाहित होती हैं। यह समाज आगम-निगम परंपरा, सनातन वैदिक परंपरा, श्रमण परंपरा और चार्वाक जैसे नास्तिक दर्शन को समान रूप से स्थान देता है। हिन्दू समाज ने कभी भी किसी विचारधारा को अस्वीकार नहीं किया, बल्कि उसे आत्मसात किया है।
हिन्दू समाज के विपरीत, अब्राहमिक मतों की प्रवृत्ति हमेशा से ही असहिष्णु रही है। इस्लाम का उद्भव होने के बाद पैगंबर मोहम्मद ने काबा की मूर्तियों को ध्वस्त कर दिया। खलीफाओं ने भी वही किया, और इस परंपरा को इस्लामी अनुयायी आज तक निभा रहे हैं। अफगानिस्तान, पाकिस्तान, बांग्लादेश, तुर्की, ईरान—ये सभी क्षेत्र कभी हिन्दू, बौद्ध और पारसी बहुल थे, किन्तु इस्लामी सत्ता आते ही वहाँ की पारंपरिक परंपराओं को नष्ट और और ध्वस्त कर दिया गया।
ईसाईयत में भी यही मानसिकता रही। जो उनके सिद्धांत को अस्वीकार करता है, उसे 'शैतान' कहा जाता है, और उसकी स्वर्ग-प्राप्ति की संभावना समाप्त मानी जाती है। इसी अवधारणा के आधार पर ईसाई साम्राज्यवादियों ने करोड़ों लोगों की हत्याएँ कीं, विकसित सभ्यताओं को समाप्त कर दिया और कई देशों के मूल निवासियों को मिटा दिया। अमेरिका इसका सबसे बड़ा उदाहरण है, जहाँ यूरोपीय मिशनरियों ने वहाँ के मूल रेड इंडियन समाज को लगभग समाप्त कर दिया।
मार्क्सवादी विचारधारा ने भी अन्य मतों को अस्वीकार करने का वही तरीका अपनाया। कार्ल मार्क्स ने सभी पूर्ववर्ती विचारों और दर्शनों को खारिज कर केवल अपने विचार को अंतिम सत्य के रूप में स्थापित किया। इसके बाद, "क्रांति" के नाम पर करोड़ों लोगों की हत्या कर दी गई। सोवियत संघ में जोसेफ स्टालिन ने लाखों लोगों की हत्या कर दी। चीन में माओत्से तुंग ने "महान क्रांति" के नाम पर करोड़ों लोगों को मार डाला। भारतीय वामपंथियों का एकमात्र उद्देश्य हिन्दू संस्कृति को नीचा दिखाना रहा है।
मार्क्सवादी इतिहासकारों ने भारतीय इतिहास को विकृत कर दिया। रामायण और महाभारत को "मिथक" कहा गया, हिन्दू राजाओं को "सामंती" बताया गया, और मुगलों को "सहिष्णु" कहकर महिमामंडित किया गया। हिन्दू समाज की आत्मा को नष्ट करने के लिए शिक्षा व्यवस्था में मार्क्सवादी जहर घोल दिया गया।
आज स्थिति यह है कि संविधान को एक धर्मग्रंथ की तरह प्रस्तुत किया जा रहा है, और डॉ. बाबासाहेब आंबेडकर को एक पैगंबर की तरह स्थापित किया जा रहा है। संविधान सभा में 389 सदस्य थे, जिनके अध्यक्ष डॉ. राजेन्द्र प्रसाद थे। डॉ. आंबेडकर प्रारूप समिति के अध्यक्ष थे, परंतु उन्हें "संविधान निर्माता" की उपाधि देकर अतिशयोक्तिपूर्ण महिमामंडन किया गया।
एक विशेष इको-सिस्टम ने संविधान को एक 'आसमानी किताब' के रूप में प्रस्तुत कर दिया है, जिससे कोई भी असहमति या विमर्श करना निषिद्ध हो जाए। इसी इको-सिस्टम ने 1976 में आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी द्वारा किए गए 42वें संशोधन को बिना किसी आपत्ति के स्वीकार कर लिया, जिसमें संविधान की मूल प्रस्तावना में 'धर्मनिरपेक्षता' और 'समाजवाद' शब्द जोड़े गए थे।
उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ जी ने इंडिया टुडे कॉन्क्लेव में एक तथ्यात्मक बात कही—
"होली वर्ष में एक बार आती है, जबकि जुमे की नमाज 52 बार होती है। यदि एक दिन के लिए जुमे की नमाज रद्द हो जाए, तो मुस्लिम समाज को कोई समस्या नहीं होनी चाहिए।"
इस पर इको-सिस्टम ने उन्हें संविधान पढ़ने की सलाह दे दी। यही इको-सिस्टम हिन्दू त्योहारों पर प्रतिबंध लगाने की माँग करता है, किन्तु मुस्लिम समाज की धार्मिक गतिविधियों पर मौन रहता है। हिन्दू परंपराओं को संविधान विरोधी बताया जाता है, जबकि शरिया कानून को "धार्मिक स्वतंत्रता" का दर्जा दिया जाता है।
अब सबसे महत्वपूर्ण प्रश्न यह उठता है—यदि भारत में हिन्दू समाज बहुसंख्यक न रहा, तो क्या यह संविधान अपने वर्तमान स्वरूप में रह पाएगा?
संविधान इस देश में तब तक सुरक्षित है, जब तक हिन्दू समाज बहुसंख्यक है, क्योंकि हिन्दू समाज विश्व का सर्वाधिक सहिष्णु समाज है। यही समाज वह है जिसने संसार को सिखाया कि "सर्वे भवन्तु सुखिनः" की भावना से समस्त मतों एवं परंपराओं को स्वीकार किया जा सकता है।
भारत के चक्रवर्ती सम्राटों ने समस्त विश्व को जीता, किन्तु ऋषियों-मुनियों ने आत्मसंयम को सर्वाधिक महत्वपूर्ण मानकर मन को जीतने की शिक्षा दी। इसी समाज ने जीवन, अनुशासन एवं शासन व्यवस्था का विज्ञान विकसित किया। इसी उद्देश्य से सृष्टि के आदिकाल में स्मृति ग्रंथों की रचना हुई, जिनमें मनुस्मृति प्रमुख है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि हिन्दू समाज इस षड्यंत्र को समझे और इसके विरुद्ध संगठित होकर खड़ा हो। यदि उसने अपनी जड़ों को नहीं पहचाना, तो भविष्य अत्यंत भयावह होगा। हिन्दू समाज को अपनी संस्कृति और धर्म का पुनर्जागरण करना होगा। उसे अपनी सनातन चेतना को पुनः जाग्रत करना होगा।
संविधान की अपनी महत्ता है, किन्तु यह हिन्दू समाज के अस्तित्व से बड़ा नहीं हो सकता। हिन्दू समाज की संस्कृति, परंपराएँ और धर्मशास्त्र इस संविधान से कहीं अधिक पुरातन और श्रेष्ठ हैं। यदि हिन्दू समाज सुरक्षित रहेगा, तो संविधान भी सुरक्षित रहेगा। किन्तु यदि हिन्दू समाज ही समाप्त हो गया, तो इस संविधान का भी कोई अस्तित्व नहीं रहेगा।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी)
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