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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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विश्व में सत्ता का खेल जितना सतही स्तर पर सरल एवं स्पष्ट प्रतीत होता है, वास्तव में वह उतना ही जटिल एवं गूढ़ है। लोकतंत्र में जनसामान्य सरकार का चयन करता है, नेता नीतियाँ निर्धारण करते हैं और प्रशासन उनका कार्यान्वयन करता है, किंतु इस सम्पूर्ण तंत्र के परोक्ष एक अदृश्य शक्ति सक्रिय रहती है, जो सरकारों के ऊपर होते हुए भी उनके निर्णयों को नियंत्रित करती है। यही शक्ति "गहरा राज्य" (Deep State) कहलाती है। यह किसी सरकार का आधिकारिक अंग नहीं होता, फिर भी यह शासन की नीतियों एवं उसके भविष्य को निर्धारित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
गहरा राज्य के विषय में प्रायः भिन्न-भिन्न धारणाएँ प्रस्तुत की जाती हैं। कोई इसे केवल अमेरिका का गुप्त सत्ता केंद्र मानता है, तो कोई इसे अंतरराष्ट्रीय षड्यंत्र के रूप में देखता है। किंतु वास्तविकता यह है कि गहरा राज्य किसी एक राष्ट्र तक सीमित नहीं है। यह वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था, सैन्य शक्ति एवं संचार माध्यमों (मीडिया) पर नियंत्रण रखता है। यह कोई औपचारिक संगठन नहीं, अपितु वित्तीय संस्थानों, सैन्य-औद्योगिक समूहों, गुप्तचर (खुफिया) एजेंसियों एवं बहुराष्ट्रीय कंपनियों का एक जटिल संजाल है, जिसका एकमात्र उद्देश्य विश्व पर अपना प्रभुत्व स्थापित एवं स्थायी बनाए रखना है।
इस सत्ता तंत्र की जड़ें 18वीं शताब्दी के अंत में अंकुरित होने लगी थीं, जब रोमन चर्च एवं ईस्ट इंडिया कंपनी जैसी शक्तियाँ विश्व पर नियंत्रण स्थापित कर रही थीं। उस काल में चर्च ने अपने प्रभाव के माध्यम से समाज पर आधिपत्य जमाया, जबकि ईस्ट इंडिया कंपनी ने व्यापार के नाम पर विभिन्न देशों की सत्ता पर अधिकार कर लिया। औद्योगिक क्रांति के साथ शक्ति संतुलन व्यापारिक संस्थानों एवं बैंकों के पक्ष में झुकता गया। धीरे-धीरे, अंतरराष्ट्रीय वित्तीय समूहों एवं सैन्य-औद्योगिक समूहों ने केवल आर्थिक शक्ति ही अर्जित नहीं की, अपितु राजनीतिक निर्णयों को भी नियंत्रित करने लगे। रॉथ्सचाइल्ड, रॉकफेलर, मोर्गन, कार्नेगी जैसे उद्योगपति केवल व्यापारी नहीं थे, बल्कि वे वैश्विक सत्ता संतुलन को नियंत्रित करने वाले प्रमुख खिलाड़ी बन चुके थे।
द्वितीय विश्व युद्ध के उपरांत गहरा राज्य का प्रभाव और अधिक स्पष्ट होने लगा। ब्रिटेन की वैश्विक पकड़ शिथिल पड़ने के साथ ही सत्ता का केंद्र लंदन से वाशिंगटन डी.सी. स्थानांतरित हो गया। अमेरिका अब केवल एक महाशक्ति नहीं, अपितु विश्व की सर्वाधिक प्रभावशाली राजनीतिक एवं आर्थिक नियंत्रक बन चुका था। किंतु अमेरिकी सत्ता केवल राष्ट्रपति अथवा संसद (कांग्रेस) के हाथों में सीमित नहीं थी। इसके पार्श्व में एक गुप्त सत्ता संरचना सक्रिय थी, जो वित्तीय एवं सैन्य-औद्योगिक समूहों द्वारा संचालित थी। इस सत्ता तंत्र ने बहुराष्ट्रीय निगमों, गुप्तचर एजेंसियों, वैश्विक वित्तीय संस्थानों एवं मीडिया नेटवर्क के माध्यम से एक ऐसा जटिल संजाल निर्मित किया, जो विभिन्न सरकारों को नियंत्रित करता है।
गहरा राज्य केवल आर्थिक और राजनीतिक नियंत्रण तक सीमित नहीं है, अपितु इसका उद्देश्य समाज की मूल संरचनाओं को ध्वस्त कर एक वैश्विक उपभोक्ता संस्कृति का निर्माण करना है। इसके लिए वैश्विक बाजार शक्तियाँ (Global Market Forces) कार्यरत हैं। वे धर्म, संस्कृति, परिवार एवं समाज व्यवस्था को विघटित कर एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना चाहती हैं, जो केवल भौतिकवादी मूल्यों पर आधारित हो और जो सांस्कृतिक अस्मिता एवं राष्ट्रीय पहचान से रहित हो।
इसके लिए वामपंथी विचारधारा को एक प्रमुख हथियार के रूप में प्रयुक्त किया जाता है। वामपंथी समूहों, मीडिया संस्थानों, शिक्षा तंत्र एवं सामाजिक अभियानों के माध्यम से एक ऐसा वैचारिक वातावरण निर्मित किया जाता है, जिसमें पारंपरिक धर्म, संस्कृति एवं परिवार संस्था को पिछड़ा एवं अप्रासंगिक घोषित किया जाए। सांस्कृतिक पुनरुत्थान एवं राष्ट्रीय अस्मिता से जुड़े विचारों को कट्टरता, फासीवाद एवं असहिष्णुता के नाम पर खारिज किया जाता है।
यही कारण है कि संपूर्ण विश्व में वामपंथी समूह प्रायः उन्हीं मुद्दों को प्राथमिकता देते हैं, जो गहरा राज्य के उद्देश्यों को आगे बढ़ाते हैं—धर्मनिरपेक्षता के नाम पर धार्मिक पहचान को समाप्त करना, परिवार संस्था को तोड़कर व्यक्ति को समाज से अलग-थलग करना, राष्ट्रवाद को कट्टरता के रूप में प्रस्तुत करना, और परंपरागत मूल्यों को रूढ़िवादिता बताकर उनका उपहास करना।
इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थाएँ एवं बहुराष्ट्रीय निगम सक्रिय भूमिका निभाते हैं। वे केवल व्यापार करने तक सीमित नहीं हैं, बल्कि राजनीतिक एवं सामाजिक व्यवस्थाओं को नियंत्रित करने की दिशा में भी कार्यरत हैं। यदि कोई राष्ट्र या नेतृत्व इस तंत्र के विरुद्ध जाता है, तो उसे विभिन्न माध्यमों से निशाना बनाया जाता है—मीडिया के माध्यम से चरित्र हनन, आर्थिक प्रतिबंध, राजनीतिक अस्थिरता, एवं कभी-कभी सत्ता परिवर्तन तक की साजिशें रची जाती हैं।
भारत भी गहरा राज्य के प्रभाव से अछूता नहीं है। 1974 में जब इंदिरा गांधी ने पहला परमाणु परीक्षण किया, तो भारत को अस्थिर करने का प्रयास किया गया। 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा पोखरण-2 परीक्षण के कुछ ही माह बाद उनकी सरकार गिर गई। 2024 के लोकसभा चुनावों से पूर्व भी मोदी सरकार को अस्थिर करने के प्रयास किए गए, जिसमें अंतरराष्ट्रीय मीडिया, वामपंथी विचारधारा एवं विदेशी वित्तपोषण की महत्वपूर्ण भूमिका रही। भारत की आंतरिक राजनीति में हस्तक्षेप करने के लिए विभिन्न वैश्विक शक्तियों ने योजनाएँ बनाई, ताकि किसी भी प्रकार से एक सशक्त राष्ट्रवादी सरकार को कमजोर किया जा सके।
गहरा राज्य का प्रभाव इतना व्यापक है कि इसे पूरी तरह समाप्त करना कठिन है। किंतु यदि कोई राष्ट्र आर्थिक आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक पुनरुत्थान, तकनीकी स्वावलंबन एवं एक मजबूत सुरक्षा तंत्र का निर्माण करता है, तो वह इस षड्यंत्र से बच सकता है। भारत जैसे प्राचीन एवं गौरवशाली राष्ट्र के लिए यह अनिवार्य है कि वह अपनी नीतियों को बाहरी हस्तक्षेप से मुक्त रखकर आत्मनिर्भरता की ओर अग्रसर हो।
स्वदेशीकरण, राष्ट्रवादी नेतृत्व, वैकल्पिक मीडिया एवं सुरक्षा तंत्र का सशक्तिकरण ही वे उपाय हैं, जिनसे इस गुप्त सत्ता तंत्र की जंजीरों को तोड़ा जा सकता है। आज की वैश्विक राजनीति का वास्तविक खेल सतह पर नहीं, बल्कि पर्दे के पीछे खेला जाता है। गहरा राज्य मात्र एक अवधारणा नहीं, अपितु एक कठोर वास्तविकता है, जिससे सतर्क रहना प्रत्येक राष्ट्र के लिए आवश्यक है।
✍️Deepak Kumar Dwivedi
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