सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

हिंदू संगठन और सैन्यीकरण: समय की माँग और समाधान

मैंने यह विचार लगभग तीन से चार वर्ष पूर्व प्रस्तुत किया था कि यदि साप्ताहिक हनुमान चालीसा पाठ, साप्ताहिक भजन टोली, लघु विमर्श मंडल, सामूहिक सहभोज तथा विभिन्न विषयों पर चौपाल एवं वैचारिक गोष्ठी प्रारंभ कर दी जाए, तो हिंदू समाज में व्यापक जागृति संभव होगी तथा बड़े स्तर पर हिंदू एकता सुदृढ़ होगी। इसी अवधारणा को मूर्त रूप देने हेतु मैंने चार-पाँच वर्ष पूर्व अतुल्य भारत अखंड व्हाट्सएप समूह के माध्यम से साप्ताहिक विष्णु सहस्रनाम पाठ एवं साप्ताहिक विमर्श मिलन प्रारंभ किया था। यह अभियान इतना सफल हुआ कि इसके अंतर्गत मंच पर प्रतिष्ठित विचारक, लेखक एवं हिंदू राष्ट्रवादी सोशल इन्फ्लुएंसर जुड़े, जिनके माध्यम से विभिन्न वैचारिक विषयों पर सारगर्भित चर्चाएँ हुईं।

आज, जब कुछ प्रभावशाली व्यक्तित्व फेसबुक एवं अन्य माध्यमों पर हनुमान चालीसा साप्ताहिक विमर्श मिलन एवं भजन मंडली के माध्यम से समस्याओं के समाधान की बात कर रहे हैं, तब यह स्पष्ट है कि इस अवधारणा की प्रासंगिकता एवं महत्ता निरंतर बढ़ रही है। किंतु, हनुमान चालीसा पाठ, भजन मंडली, सभी जातियों के साथ सहभोज एवं वैचारिक मिलन से केवल एक सीमित स्तर तक समाधान संभव है। पूजा-पाठ, अनुष्ठान एवं कर्मकांड तो एक कांग्रेसी अथवा वामपंथी भी करता है—बंगाल में वामपंथी भी दुर्गा पूजा करते हैं—किन्तु जब राष्ट्ररक्षा एवं परिवार-सुरक्षा की बात आती है, तब वे अपने राजनीतिक हितों के अनुरूप ही निर्णय लेते हैं, यहाँ तक कि विरोध में भी खड़े हो जाते हैं।

सरकारी आँकड़ों के अनुसार हिंदुओं की जनसंख्या 110 करोड़ बताई जाती है, किंतु वास्तविकता में यह संख्या लगभग 70 करोड़ के आसपास ही है। इनमें से केवल 20 करोड़ धर्मनिष्ठ हिंदू हैं, शेष अधिकांश अधर्मनिष्ठ एवं प्रमादग्रस्त हैं। इस स्थिति में हिंदू समाज को संगठित करने हेतु एक सुव्यवस्थित प्रयास आवश्यक है। केवल धार्मिक आयोजनों से समाज को दीर्घकालिक दिशा नहीं दी जा सकती, अपितु यह भी आवश्यक है कि हिंदू समाज में राष्ट्रभक्ति, राष्ट्रधर्म के प्रति कर्तव्यबोध एवं पारिवारिक दायित्वबोध जाग्रत किया जाए।

हिंदू समाज को लक्ष्य-आधारित बनाने हेतु सैन्यीकरण आवश्यक है। 70 करोड़ हिंदू समाज में कम से कम 12 करोड़ हिंदुओं का सैन्यीकरण अनिवार्य है। हिंदू समाज की विभिन्न मत-पंथ-परंपराओं का सम्मान करते हुए उन्हें आर्थिक एवं सामाजिक रूप से सशक्त करना भी आवश्यक है। इसके साथ ही सनातनी आर्थिक मॉडल पर कार्य करना होगा तथा हिंदू परिवार व्यवस्था को सुदृढ़ करने की दिशा में भी ठोस प्रयास करना होगा। हिंदू समाज में शत्रुबोध, इतिहासबोध, कर्तव्यबोध एवं स्वधर्मबोध जाग्रत करना होगा, जिससे वह अपने अस्तित्व और धर्म-संस्कृति की रक्षा के प्रति अधिक संवेदनशील बने।

इस दिशा में कार्य करने के लिए प्रत्येक ग्राम, नगर एवं शहर में लघु अखाड़ों की स्थापना की जानी चाहिए। छोटे-छोटे व्हाट्सएप समूहों के माध्यम से आत्मरक्षा प्रशिक्षण केंद्र प्रारंभ किए जा सकते हैं। बड़े हिंदू संगठनों को चाहिए कि वे राष्ट्रीय स्तर पर आत्मरक्षा प्रशिक्षण केंद्रों का संचालन करें। साप्ताहिक हनुमान चालीसा पाठ, साप्ताहिक मिलन एवं कुटुंब प्रबोधन कार्यक्रम प्रत्येक ग्राम, मोहल्ले एवं जाति-समाज के भीतर आयोजित किए जाएँ। हिंदू बालकों में शिवाजी एवं श्रीराम जैसे गुणों का विकास करने हेतु संस्कारशालाओं एवं लघु गुरुकुलों की स्थापना आवश्यक है, जहाँ उन्हें साप्ताहिक धार्मिक शिक्षा के साथ-साथ व्यावहारिक जीवन के लिए आवश्यक कौशल भी सिखाए जाएँ।

बड़े परिवर्तन के लिए छोटे स्तर से कार्य प्रारंभ करना आवश्यक है। यदि प्रत्येक परिवार, मोहल्ला एवं ग्राम अपनी रक्षा का दायित्व स्वयं ले ले, तो एक छोटे समूह से एक मजबूत संगठन का निर्माण संभव है। प्रत्येक मोहल्ले में दस परिवार मिलकर एक संगठित इकाई का निर्माण करें, जो आगे चलकर एक सुदृढ़ ग्राम, नगर एवं राष्ट्रीय संगठन का रूप ले सकती है। जिस दिन प्रत्येक हिंदू अपने परिवार एवं कुल की रक्षा का दायित्व समझ लेगा, उसी दिन से सनातन धर्म की रक्षा सुनिश्चित हो जाएगी। यही हिंदू समाज के जागरण एवं राष्ट्र की पुनरुत्थान की कुंजी है। "संगठित हिंदू, सुरक्षित हिंदू—यही राष्ट्र रक्षा की नींव है।"


✍दीपक कुमार द्विवेदी

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