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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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इस समूचे परिप्रेक्ष्य में अनेक भारतीय यह अनुभव करते हैं कि संयुक्त राज्य अमेरिका भारत का सर्वोत्तम सहयोगी है। यह सत्य हो सकता है, किंतु भारतीयों को यह समझना चाहिए कि सभी अमेरिकियों का दृष्टिकोण एक समान नहीं है। भारत के प्रति अमेरिकी नीति बीते समय में न तो स्थिर रही है और न ही एकरूपी। प्रत्येक जटिल परिस्थिति में अनेक प्रतिस्पर्धी दृष्टिकोण विद्यमान रहते हैं, और अमेरिकी राजनीति की दिशा समय-समय पर इन दृष्टिकोणों के मध्य परिवर्तित होती रहती है।
भारतीय-अमेरिकी संबंधों के गहन विश्लेषण से पूर्व, हमें चीन और इस्लामी राष्ट्रों के साथ अमेरिका की जटिलताओं का अध्ययन करना होगा। अमेरिका स्वयं को एक ओर ईसाई परंपरा और नैतिक मूल्यों से प्रेरित मानता है, तो दूसरी ओर वह अति-आधुनिक, प्रबुद्ध और पंथ-निरपेक्ष सिद्धांतों का अनुयायी होने का दावा करता है। यही द्वैत उसे एक विभाजित व्यक्तित्व प्रदान करता है, और अब इन दोनों पहचानों के लिए अन्य सभ्यताओं से चुनौती उत्पन्न हो गई है।
चीन के साथ अमेरिका का संघर्ष वस्तुतः आधुनिकताओं का संघर्ष है। यह प्रतिस्पर्धा धर्म, अब्राहमिक परंपरा अथवा किसी विचारधारा पर आधारित न होकर विशुद्ध रूप से भौतिकवादी चिंताओं पर केंद्रित है—औद्योगिक उत्पादन, सैन्य शक्ति, राजनीतिक प्रभुत्व और उपभोक्तावाद। चीन स्पष्ट रूप से यह दावा करता है कि वह अनेक दृष्टियों से अमेरिका से अधिक शक्तिशाली बनने की दिशा में अग्रसर है। अमेरिकी उद्योगों का ह्रास, उत्पादन क्षेत्र की गिरावट और बड़े पैमाने पर आउटसोर्सिंग का चलन, अमेरिकी अर्थव्यवस्था के मूल ढांचे को कमजोर कर रहा है। अमेरिका दिनों-दिन एक कर्जदार राष्ट्र बनता जा रहा है, और यह विडंबना ही है कि चीन इस कर्ज का एक बड़ा भाग उपलब्ध करा रहा है। अमेरिका ने चीन को उद्योग, प्रौद्योगिकी और पूंजी प्रदान की, जिसके परिणामस्वरूप वह स्वयं के ही प्रतिस्पर्धी को सशक्त करने का दोषी बन बैठा। यह अमेरिका के लिए पहला झटका था।
दूसरा झटका इस्लामी रूढ़िवाद से टकराव है। चीन से प्रतिस्पर्धा के विपरीत, इस्लामी राष्ट्र आधुनिकता की ओर नहीं देख रहे हैं। वे अमेरिका के साथ इसलिए संघर्षरत नहीं हैं कि उनके पास बेहतर मशीनें, अधिक शक्तिशाली फैक्ट्रियाँ या विस्तृत निर्यात तंत्र है, अपितु उनका टकराव विशुद्ध रूप से धार्मिक और सांस्कृतिक स्तर पर है। इस्लामी कट्टरपंथ ईसाइयत की उस व्याख्या को चुनौती देता है, जो अमेरिका के लिए उसकी सांस्कृतिक पहचान का आधार है। दोनों पंथ अपने-अपने ईश्वर-प्रदत्त दावों को अंतिम और सार्वभौमिक मानते हैं, जिससे टकराव और तीव्र होता जा रहा है।
चीन और इस्लामिक खतरे के मध्य अमेरिका ने भारत के प्रति एक विरोधाभासी नीति विकसित कर ली है। एक ओर वह भारत को अपना रणनीतिक सहयोगी बनाना चाहता है, तो दूसरी ओर उसे अत्यधिक शक्तिशाली बनने से रोकने की भी चेष्टा करता है। यही कारण है कि भारत के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण को किसी एक निश्चित ढांचे में सीमित करना कठिन हो गया है।
भारत के प्रति अमेरिकी नीति दो ध्रुवों के बीच झूलती रही है। एक पक्ष भारत को आर्थिक, औद्योगिक और सैन्य रूप से सशक्त बनाने का पक्षधर है, जबकि दूसरा पक्ष भारत को विखंडित करने की रणनीति पर कार्य करता है। अमेरिकी नीति निर्माताओं के भीतर इन दोनों दृष्टिकोणों का संतुलन समय-समय पर बदलता रहा है।
भारत के निर्माण के प्रति अमेरिकी दृष्टिकोण यह मानता है कि भारत का बाज़ार, श्रम शक्ति और सैन्य क्षमताएँ उसे वैश्विक राजनीति में एक महत्वपूर्ण शक्ति बना सकती हैं। अमेरिका चाहता है कि भारत चीन की आक्रामकता का प्रतिरोध करने में सक्षम हो और इस्लामी उग्रवाद के विरुद्ध एक स्थिर शक्ति के रूप में कार्य करे। यही कारण है कि अमेरिका ने भारतीय अर्थव्यवस्था में भारी निवेश किया है और अपनी बहुराष्ट्रीय कंपनियों को भारत में व्यापारिक अवसरों की खोज करने के लिए प्रेरित किया है।
परंतु, इसके समानांतर, अमेरिका के कुछ रणनीतिकार भारत के अत्यधिक सशक्त होने को अपने लिए दीर्घकालिक खतरा मानते हैं। उनका तर्क है कि यदि भारत चीन की भाँति अत्यधिक सफल हो जाता है, तो वह अमेरिका के लिए एक और आर्थिक और सैन्य प्रतिस्पर्धी के रूप में उभर सकता है। अमेरिका के लिए एक सशक्त भारत लाभकारी है, किंतु एक अत्यधिक शक्तिशाली भारत उसके हितों के अनुकूल नहीं होगा।
भारत के विखंडन की नीति अमेरिका की विदेश नीति का पुरातन तत्व रही है। शीतयुद्ध के दौरान अमेरिका ने भारत को विभाजित करने की रणनीति अपनाई थी। 1950 और 1960 के दशक में जब नेहरू की नीतियाँ सोवियत संघ के पक्ष में झुकी हुई थीं, तब अमेरिका ने द्रविड़ आंदोलन को समर्थन दिया। इसी प्रकार, उसने विभिन्न जातीय और धार्मिक समूहों के भीतर विद्वेष को बढ़ावा देने का प्रयास किया, ताकि भारत की आंतरिक स्थिरता बाधित हो।
भारत के विखंडन से अमेरिका को कई लाभ प्राप्त हो सकते हैं। इससे वह एक और प्रतिस्पर्धी शक्ति के उदय को रोक सकता है और भारत की श्रम शक्ति और संसाधनों का अपने नियंत्रण में रख सकता है। इसके अतिरिक्त, भारत में यदि आंतरिक संघर्ष उत्पन्न होता है, तो इससे पश्चिमी हथियार उद्योग को एक नया बाज़ार मिलेगा। साथ ही, राष्ट्र की कमजोरी ईसाई मिशनरियों के लिए भी अनुकूल वातावरण प्रदान करेगी, जिससे धर्मांतरण की गति तेज़ हो सकती है।
हालाँकि, इस नीति के गंभीर दुष्परिणाम भी हो सकते हैं। यदि भारत वास्तव में गृहयुद्ध जैसी स्थिति में पहुँचता है, तो यह अमेरिका के लिए भी एक भयावह परिदृश्य होगा। अमेरिका पहले ही अफगानिस्तान, इराक़ और पाकिस्तान में अस्थिरता के दुष्परिणाम देख चुका है। भारत का विखंडन इससे भी अधिक जटिल और संकटपूर्ण स्थिति उत्पन्न कर सकता है।
अमेरिकी नीति भारत को संपूर्ण राष्ट्र के रूप में समर्थन देने और इसके विभिन्न आंतरिक संघर्षों का दोहन करने के बीच संतुलन बनाए रखने का प्रयास करती रही है। एक ओर वह भारत को उन्नति के अवसर प्रदान करता है, तो दूसरी ओर उसे अपनी शर्तों के अधीन रखने की भी चेष्टा करता है। अमेरिका भारत पर 'मानवाधिकार', 'धर्मनिरपेक्षता' और 'स्वतंत्रता' जैसे मूल्यों के माध्यम से भी नियंत्रण रखने की नीति अपनाता है, जिससे भारत उस तीव्र आर्थिक प्रगति की राह पर न बढ़ सके, जिस पर चीन अग्रसर हुआ था।
विडंबना यह है कि भारत में कुछ ऐसे समूह सक्रिय हैं, जो अनजाने में ही अमेरिकी विखंडन नीति को बल प्रदान करते हैं। भारतीय रणनीतिकारों को इस वास्तविकता को स्वीकार करना होगा कि अमेरिकी राजनीति किसी एक पक्ष में स्थायी रूप से खड़ी नहीं होती। वह अपनी वैश्विक शक्ति बनाए रखने के लिए सदैव दोनों पक्षों से खेलता रहेगा।
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