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ब्रिक्स मुद्रा, स्वर्ण मानक प्रणाली और भारत की आर्थिक आत्मनिर्भरता

ब्रिक्स मुद्रा एवं स्वर्ण मानक प्रणाली को लेकर पूर्व मेंने एक लेख लिखा था एवं जय सनातन भारत समूह द्वारा रविवार को आयोजित होने वाले साप्ताहिक विमर्श-मिलन में इस विषय पर विस्तार से चर्चा की गई थी। वैश्विक आर्थिक व्यवस्था के वर्तमान परिदृश्य में यह विषय अत्यंत महत्वपूर्ण हो जाता है, विशेषकर जब अमेरिका एवं पश्चिमी शक्तियाँ अपने आर्थिक वर्चस्व को बनाए रखने हेतु नीतिगत दबाव उत्पन्न कर रही हैं।


डोनाल्ड ट्रंप के दूसरे कार्यकाल की शुरुआत में कुछ सकारात्मक निर्णय देखने को मिले थे। उन्होंने कल्चरल मार्क्सवाद, वोकिज्म और नारीवादी एजेंडे का प्रतिरोध किया, जिससे पश्चिमी समाज में वामपंथी विचारधारा के बढ़ते प्रभाव को चुनौती मिली। इसी क्रम में उन्होंने बांग्लादेश में हिंदू समुदाय के समर्थन में खड़े होकर धार्मिक अल्पसंख्यकों के अधिकारों की रक्षा का संकेत भी दिया। इन कदमों से ऐसा प्रतीत हुआ कि ट्रंप प्रशासन वैश्विक स्तर पर वामपंथी एवं इस्लामिक प्रसारवाद के विरुद्ध निर्णायक भूमिका निभाएगा।

किन्तु जैसे-जैसे समय बीत रहा है वैसे यह स्पष्ट होने लगा कि ट्रंप की नीतियाँ मूल रूप से अमेरिकी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ करने तक ही सीमित हैं। उनके द्वारा उठाए गए प्रारंभिक कदमों से जो आशाएँ जगी थीं, वे धीरे-धीरे धूमिल होती गईं। अमेरिका की आंतरिक स्थिति को देखा जाए तो वह एक पूर्ण रूप से जनकल्याणकारी राज्य में परिवर्तित हो चुका है, जहाँ स्वास्थ्य सेवाओं, बेरोजगारी भत्तों और अन्य सामाजिक सुरक्षा योजनाओं पर अरबों डॉलर व्यय किए जा रहे हैं। इस वित्तीय असंतुलन को ठीक करने के लिए अमेरिका विकासशील देशों पर टैरिफ और व्यापारिक नीतिगत प्रतिबंधों का दबाव बना रहा है, जिससे उसकी अर्थव्यवस्था को स्थिर किया जा सके।

इस परिस्थिति में यह स्पष्ट हो जाता है कि ट्रंप प्रशासन की प्राथमिकता वामपंथी विचारधारा अथवा इस्लामिक कट्टरवाद से संघर्ष नहीं, बल्कि अमेरिकी आर्थिक प्रभुत्व को बनाए रखना है। भारत जैसे विकासशील राष्ट्रों पर लगाए जा रहे टैरिफ और आर्थिक प्रतिबंध इस बात के प्रमाण हैं कि अमेरिका अपने वित्तीय घाटे की भरपाई अन्य देशों के संसाधनों से करना चाहता है। यह नीति न केवल भारत के आर्थिक हितों के लिए घातक है, बल्कि संपूर्ण वैश्विक व्यापार व्यवस्था को प्रभावित करने वाली है।

इस स्थिति में भारत सरकार के लिए यह आवश्यक हो जाता है कि वह डॉलर के वर्चस्व से मुक्त होने तथा अपनी आर्थिक आत्मनिर्भरता सुनिश्चित करने हेतु ठोस कदम उठाए। इसके लिए स्वर्ण मानक प्रणाली को अपनाना और ब्रिक्स मुद्रा को मान्यता देना अत्यंत आवश्यक है। यदि भारत सरकार इस दिशा में प्रभावी नीति नहीं बनाती, तो उसे अमेरिका और पश्चिमी शक्तियों के आर्थिक दबाव का सामना करना पड़ेगा, जिससे देश की विकास यात्रा अवरुद्ध हो सकती है।

आर्थिक सशक्तिकरण ही किसी भी राष्ट्र की वास्तविक शक्ति का आधार होता है। यदि भारत आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं बना, तो न केवल उसकी स्वतंत्रता प्रभावित होगी, बल्कि वह वैश्विक व्यापार और भू-राजनीतिक रणनीतियों में भी पिछड़ जाएगा। इस कारण केवल सरकार ही नहीं, बल्कि समाज और बौद्धिक वर्ग को भी इस दिशा में गंभीर चिंतन करना चाहिए।

साथ ही, यह भी ध्यान रखना चाहिए कि भारत केवल आर्थिक चुनौतियों से ही नहीं जूझ रहा है, बल्कि सांस्कृतिक और वैचारिक खतरों का भी सामना कर रहा है। इस्लामिक विस्तारवाद, ईसाई मिशनरियों द्वारा चलाए जा रहे कन्वर्जन अभियान, कल्चरल मार्क्सवाद मार्क्सवाद, वोकिज्म और वैश्विक गहरे राज्य (डीप स्टेट) जैसी शक्तियाँ निरंतर भारत को कमजोर करने के प्रयास में लगी हुई हैं। यदि इन खतरों का समय रहते प्रतिकार नहीं किया गया, तो भारत एक गहरे संकट में फँस सकता है।

अतः आर्थिक आत्मनिर्भरता केवल विकास का साधन नहीं, बल्कि राष्ट्रीय सुरक्षा की भी अनिवार्य शर्त बन चुकी है। हमें यह समझना होगा कि जब तक भारत आर्थिक रूप से शक्तिशाली नहीं बनेगा, तब तक वह अपने शत्रुओं का समुचित प्रतिरोध नहीं कर पाएगा। इतिहास साक्षी है कि जब भी कोई राष्ट्र आर्थिक रूप से कमजोर हुआ है, तब-तब आंतरिक और बाह्य शक्तियाँ उसे विभाजित करने में सफल रही हैं। आज के संदर्भ में भी हमें इस सच्चाई को स्वीकार करना होगा कि यदि हम अपनी अर्थव्यवस्था को सुदृढ़ नहीं करेंगे, तो हमें भविष्य में एक और विभाजन के लिए तैयार रहना पड़ेगा।

हमारे शत्रु सदैव अवसर की प्रतीक्षा में रहते हैं। यह हमारे ऊपर निर्भर करता है कि हम उन्हें अवसर दें या समय रहते उनके समूल नाश की योजना बनाएँ। राष्ट्र की सुरक्षा केवल सीमाओं तक सीमित नहीं होनी चाहिए, अपितु इसे अर्थव्यवस्था, संस्कृति एवं समाज के समस्त स्तरों पर सुनिश्चित किया जाना चाहिए। यदि हम इन संकटों को समय रहते नहीं समझ पाए, तो भविष्य की पीढ़ी को एक अस्थिर एवं संघर्षग्रस्त भारत सौंपना हमारी नियति बन जाएगी।

अतः यह आवश्यक है कि हम आर्थिक आत्मनिर्भरता, सांस्कृतिक संरक्षण एवं राष्ट्रीय सुरक्षा को एकीकृत दृष्टिकोण से देखें तथा उसी के अनुरूप सुदृढ़ नीतियों का निर्माण करें। हमें अपने शत्रुओं के मूल स्रोतों पर प्रहार कर उनकी शक्ति को समाप्त करना होगा, अन्यथा हमें एक भयावह भविष्य के लिए तैयार रहना पड़ेगा।


✍️दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी )

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