सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

छावा से हिंदू समाज को क्या सीख लेनी चाहिए ?


छत्रपति संभाजी महाराज जैसे अमर बलिदानियों ने अखण्ड हिन्दू राष्ट्र के स्वप्न को साकार करने हेतु अपना सर्वस्व न्योछावर कर दिया। किंतु हमारी पीढ़ी ने 80 वर्ष पूर्व 9% विधर्मियों को भारत माता के पवित्र आँचल को विदीर्ण कर 17% भूभाग और 23% आबादी को समर्पित कर दिया, वह भी बिना किसी प्रतिरोध के। फिर भी हम गर्वपूर्वक यह कहते नहीं अघाते कि हमें 1947 में स्वतंत्रता प्राप्त हुई और संविधान ने हमें जीवन जीने की स्वतंत्रता प्रदान की। किंतु क्या हम यह स्वीकारने को तैयार हैं कि हमने अपने पूर्वजों के बलिदानों को तुच्छ स्वार्थों की वेदी पर होम कर दिया? हमने अपने राष्ट्र की अखंडता का सौदा कर लिया, विभाजन को सहजता से स्वीकार कर लिया, और अब, जब हम अपने ही देश के नौ राज्यों में अल्पसंख्यक हो चुके हैं, तब भी स्वयं को स्वतंत्र और सुरक्षित मानने का भ्रम पाल रहे हैं।

हम यह तथ्य भूल जाते हैं कि शत्रु हमारे द्वार पर खड़ा है, हमारी बस्तियों में आग लगी हुई है, किंतु हम अपनी मस्ती में निमग्न हैं। 80 वर्ष पूर्व अपने तथाकथित स्वतंत्रता संग्राम के नाम पर हमने अपनी मातृभूमि का अंश विधर्मियों को सौंप दिया, और यदि यही मानसिकता बनी रही, तो आने वाले समय में हम अपने तुच्छ स्वार्थों की पूर्ति हेतु अपना सबकुछ गँवा देंगे। यदि हमने चेतना नहीं दिखाई, तो हम अपनी संतानों, अपनी संस्कृति और यहाँ तक कि अपनी पुत्रियों तक का सौदा करने को विवश हो जाएंगे। क्योंकि जो समाज अपने पूर्वजों के त्याग और बलिदान को विस्मृत कर देता है, वह स्वयं एक दिन इतिहास बन जाता है।

हमने अखण्ड हिन्दू राष्ट्र के उस स्वप्न को विस्मृत कर दिया, जिसके लिए वीर छत्रपति शिवाजी महाराज, महाराणा प्रताप, राणा सांगा, बप्पा रावल, गुरु गोविंद सिंह, महारानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर जैसे असंख्य वीर-वीरांगनाएँ सहस्रों वर्षों तक संघर्षरत रहीं। हमने भारत-विभाजन की भयावह त्रासदी झेली, किंतु उसके पश्चात भी वास्तविकता को स्वीकारने के बजाय, तथाकथित स्वतंत्रता का उत्सव मनाने में तल्लीन हैं। जिन विधर्मियों ने भारत को खंड-खंड किया, जिनकी क्रूरता के कारण लाखों निर्दोषों का रक्त बहा, उन्हें दंडित करने के स्थान पर हम उनके साथ "सेक्युलरिज़्म" की कुटिल राजनीति का अन्न ग्रहण कर रहे हैं। वे हमें इतिहास के पृष्ठों में निरंतर अपमानित कर रहे हैं, और हम "गंगा-जमुनी तहज़ीब" के छलपूर्ण गीत गा रहे हैं।

छावां फिल्म देखने बाद क्या हम अपने घर लौटकर अपने बच्चों से यह चर्चा करते हैं कि संभाजी महाराज, छत्रपति शिवाजी, महाराणा प्रताप, राणा सांगा, बप्पा रावल जैसे महापुरुषों ने अपने जीवन का उत्सर्ग किस उद्देश्य के लिए किया था? किस स्वराज्य की स्थापना के लिए महाराणा प्रताप ने घास की रोटियाँ खाईं? क्या कारण थे कि हमने विगत सहस्र वर्षों में इतना विशाल भूभाग खो दिया?

एक समय था जब हमारे चक्रवर्ती सम्राटों के अधीन समस्त विश्व झुका करता था, और आज हम अपने ही देश में असहाय खड़े हैं। हमने पिछले हजार वर्षों में इतना बड़ा भूभाग क्यों और कैसे खो दिया? हम क्यों 1000 वर्षों तक गुलाम बने रहे? क्या आज भी हम वैचारिक रूप से गुलामी की मानसिकता से मुक्त हो पाए हैं?

हम यदि अपने बच्चों को सत्य से अवगत नहीं कराएंगे, तो राष्ट्रधर्म के प्रति त्याग और समर्पण की भावना उनमें कैसे जागृत होगी? यदि हम उनमें राम, कृष्ण, शिव, सम्राट विक्रमादित्य, वीर शिवाजी, महाराणा प्रताप, महारानी लक्ष्मीबाई, अहिल्याबाई होल्कर जैसे गुणों का निर्माण नहीं करेंगे, तो अखण्ड हिन्दू राष्ट्र की कल्पना को कैसे साकार कर पाएंगे?

छावां जैसी फिल्में देखने मात्र से कुछ नहीं होगा। जब तक हम अपने भीतर स्वधर्म, राष्ट्रधर्म, शत्रुबोध, कर्तव्यबोध एवं अपने दायित्वों का बोध उत्पन्न नहीं करेंगे, तब तक कोई वास्तविक परिवर्तन संभव नहीं है। समय आ चुका है कि हम मानसिक एवं वैचारिक परतंत्रता की बेड़ियों को तोड़ें, अपने पूर्वजों के स्वप्न को पुनः जीवित करें और अखंड हिंदू राष्ट्र की पुनर्स्थापना के लिए संकल्पबद्ध हों। यही युगधर्म है, यही राष्ट्रधर्म है।

✍️ दीपक कुमार द्विवेदी

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