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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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वर्तमान समय में एक विषय अत्यधिक चर्चित हो रहा है – कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) के आगमन के उपरांत संगणक-आधारित नौकरियों में कमी आ जाएगी। यह कथन अंशतः सत्य है। निम्न स्तर की सेवा क्षेत्रीय नौकरियों में हिंदू युवा संलग्न नहीं होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप भविष्य में उनके समक्ष कठिनाइयाँ उत्पन्न हो सकती हैं। यदि यह स्थिति निरंतर बनी रहती है, तो अनेक युवा अपनी आवश्यकताओं की पूर्ति हेतु अप्राचीन एवं विधर्मी समुदायों के अधीन कार्य करने के लिए विवश हो सकते हैं।
किन्तु इन विषयों पर चर्चा करते समय हम प्रायः इनके ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य तथा निहित कारणों को भलीभांति समझ नहीं पाते। किस कारणवश यह स्थिति उत्पन्न हुई, इसके लिए हम स्वयं भी उत्तरदायी हैं। इसे हम सभी को सहज रूप में स्वीकार करना चाहिए। सातवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक इस्लामिक आक्रांताओं के आक्रमणों को झेलने के उपरांत, भारत में मुगल सत्ता स्थापित हुई, तथापि अधिकांश रियासतें हमारी ही थीं। हमारे राजा स्वतंत्र थे तथा हम अपेक्षाकृत अधिक स्वायत्त थे।
इस्लामिक आक्रांता झुंडों में रहते थे और जब उन्हें धन की आवश्यकता होती, तब वे लूटपाट करने हेतु आक्रमण करते थे। फिर भी हम स्वतंत्र थे, क्योंकि हमारा प्रशासनिक तंत्र सुदृढ़ था। सातवीं शताब्दी से सत्रहवीं शताब्दी तक भारत विश्व की सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 24% से अधिक का योगदान करता था। यह कैसे संभव हुआ? क्योंकि हमारी शासन-प्रणाली, समाज व्यवस्था एवं शिक्षा पद्धति सुदृढ़ थी। गुरुकुल प्रणाली व्यापक रूप से संचालित थी और अधिकांश रियासतें हमारी ही थीं।
जब अंग्रेज भारत में आए, तब उन्होंने विभिन्न विचारकों एवं शोधकर्ताओं के माध्यम से भारतीय सामाजिक संरचना का गहन अध्ययन किया। विशेष रूप से लार्ड मैकाले, विलियम जोन्स, मैक्स मूलर, चार्ल्स ग्रांट, जेम्स मिल, हेनरी टॉमस कोलब्रुक, वॉरेन हेस्टिंग्स, एवं हर्बर्ट रिस्ले जैसे यूरोपीय विद्वानों ने भारतीय समाज, संस्कृति और परंपराओं का व्यापक विश्लेषण किया।
इन शोधों के आधार पर उन्होंने निष्कर्ष निकाला कि यदि इस समाज को पराधीन बनाना है, तो इसके मूल स्तंभों—गुरुकुल शिक्षा प्रणाली, स्वदेशी उद्योग-व्यवसाय, और सनातनी मूल्यों—को ध्वस्त करना अनिवार्य होगा। इसी कारण उन्होंने भारतीय गुरुकुल शिक्षा पद्धति के उन्मूलन के लिए 1835 में लॉर्ड मैकाले के शिक्षा नीति प्रस्ताव को लागू कर कॉन्वेंट शिक्षा पद्धति को विकल्प रूप में स्थापित किया।
इसके साथ ही परंपरागत स्वावलंबी व्यवसायों के स्थान पर उन्होंने वेतन-आधारित नौकरी संस्कृति को प्रोत्साहित किया। अंग्रेजों ने वेतन प्रणाली लागू की, जिसमें बिना श्रम किए धनार्जन की व्यवस्था थी, तथा सेवानिवृत्ति के उपरांत पेंशन की गारंटी भी प्रदान की गई। इसका परिणाम यह हुआ कि हिंदू समाज अपने पारंपरिक व्यवसायों को त्यागकर नौकरी को श्रेष्ठ विकल्प मानने लगा, क्योंकि इससे न केवल नियमित आय सुनिश्चित होती थी, अपितु परिश्रम भी अपेक्षाकृत न्यून करना पड़ता था।
इस परिवर्तन में प्रारंभ में शिक्षित एवं संपन्न वर्ग सम्मिलित हुआ, तत्पश्चात अन्य वर्ग भी क्रमशः प्रविष्ट होते गए। शनैः-शनैः हिंदू छात्र कॉन्वेंट विद्यालयों में अध्ययन करने लगे, जिससे गुरुकुलों में विद्यार्थियों की संख्या में तीव्र ह्रास होने लगा। इस प्रकार, अंग्रेजों की नीतियों ने भारतीय समाज की मौलिक संरचना को परिवर्तित कर उसे मानसिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक रूप से परतंत्र बनाने की दिशा में कार्य किया।
समय के साथ हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग शासन व्यवस्था पर निर्भर हो गया और एक प्रकार की पराधीनता की ओर अग्रसर हो गया। अंग्रेजों ने 200 वर्षों में भारत से 45 ट्रिलियन डॉलर लूटकर अपने साम्राज्य को सुदृढ़ किया। उन्होंने हमारी ज्ञान-परंपरा एवं शोध-कार्य को चुराकर अपने लाभ के लिए प्रयोग किया तथा एक आधुनिक प्रशासनिक तंत्र की स्थापना कर दी।
हम इस षड्यंत्र का समुचित प्रतिकार नहीं कर सके और निरंतर पिछड़ते गए। आज भी अनुसंधान एवं विकास (R&D) के क्षेत्र में हम पश्चिमी देशों से बहुत पीछे हैं। इसका वास्तविक कारण क्या है? इन विषयों पर हम कभी गंभीर विमर्श नहीं करते। हम हिंदू-मुस्लिम एवं अन्य सामाजिक विषयों पर अत्यधिक चर्चा करते हैं, गुरुकुल प्रणाली को पुनः स्थापित करने तथा हिंदू इको-सिस्टम को सुदृढ़ करने की बात करते हैं, किंतु हम स्वयं अपने स्तर पर कोई ठोस वैकल्पिक प्रणाली विकसित नहीं कर पा रहे हैं।
यह स्थिति क्यों उत्पन्न हुई? इसका समाधान क्या हो सकता है? इस विषय चिंतन मंथन करने की आवश्यकता है।
भारत की तथाकथित स्वतंत्रता के पश्चात् 1955 से 1990 तक पंचवर्षीय योजनाओं के माध्यम से सोवियत संघ से प्रेरित समाजवादी आर्थिक नीतियों को अपनाया गया। भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू ने मिश्रित अर्थव्यवस्था की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें भारी उद्योगों और बुनियादी ढांचे का नियंत्रण सरकार के अधीन रखा गया। उनके बाद इंदिरा गांधी और राजीव गांधी ने भी इस नीति को आगे बढ़ाया।
1976 के आपातकाल के दौरान भारतीय संविधान की प्रस्तावना में "समाजवादी" और "धर्मनिरपेक्ष" (secular) शब्द जोड़े गए, जिससे सरकार की नीतियों को औपचारिक रूप से समाजवादी दिशा प्रदान की गई। इस दौरान वामपंथी विचारधारा से प्रेरित इतिहास लेखन को प्रोत्साहित किया गया, और सरकारी स्तर पर निजी उद्यमिता के दमन की नीति अपनाई गई।
ब्रिटिश शासन के दौरान भी निजी व्यापार और उद्यमों का दमन हुआ था, लेकिन 1955 से 1990 के कालखंड में भारतीय सरकार ने लाइसेंस राज, कोटा प्रणाली, और नियंत्रणवादी नीतियों के माध्यम से उद्यमशीलता को अत्यंत कठिन बना दिया। सरकारी नौकरियों को सर्वोच्च प्रतिष्ठा दिलाने की नीति अपनाई गई, जिससे स्वावलंबन एवं निजी क्षेत्र में रोजगार के अवसर सीमित हो गए। यदि कोई व्यक्ति स्वतंत्र रूप से व्यवसाय करना चाहता था, तो कठोर नियमों, लाइसेंसिंग बाधाओं और लालफीताशाही के कारण उसे भारी कठिनाइयों का सामना करना पड़ता था।
1991 में आर्थिक उदारीकरण की प्रक्रिया आरंभ हुई, किंतु यह आधा-अधूरा सुधार था। कुछ क्षेत्रों में विदेशी निवेश और निजीकरण को बढ़ावा मिला, किंतु कृषि क्षेत्र एवं अन्य पारंपरिक व्यवसायिक क्षेत्रों में आवश्यक सुधार नहीं हो सके।
मोदी सरकार द्वारा 2020 में कृषि सुधार कानून लाने का प्रयास किया गया, जो कृषि बाजारों में प्रतिस्पर्धा और किसानों को सीधी बिक्री की स्वतंत्रता प्रदान करता, किंतु पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के किसान संगठनों, जिनमें बिचौलियों की मजबूत पकड़ थी, ने व्यापक विरोध किया। अंततः सरकार को ये सुधार वापस लेने पड़े।
इस देश में यदि कोई व्यक्ति व्यवसाय करना चाहता है, यदि कोई भारतीय कंपनी उन्नति कर रही है, अथवा यदि कोई व्यक्ति अपने स्तर पर कार्य करना चाहता है, तो उसे "चोर" कहा जाएगा। समाज में उसे प्रतिष्ठा नहीं मिलेगी, अपितु उसे अपमानित किया जाएगा।
इसके विपरीत, यदि कोई व्यक्ति सरकारी सेवा में कार्यरत है, तो उसे अत्यधिक सम्मान प्राप्त होगा, चाहे वह चपरासी ही क्यों न हो; उच्च प्रशासनिक पदों (आईएएस, आईपीएस, आदि) की तो बात ही छोड़ दीजिए। उसकी विवाह योग्य प्रतिष्ठा भी बढ़ जाएगी, और उसे दहेज की प्राप्ति भी होगी।
वहीं, यदि कोई व्यवसायी या उद्यमी अपना उद्योग प्रारंभ करता है, तो उसे "चोर" समझा जाएगा, अपमानित किया जाएगा, तथा समाज में बड़े मंचों पर स्थान नहीं मिलेगा। दूसरी ओर, एक सरकारी अधिकारी चाहे जितनी भी भ्रष्टाचार करे, कार्य न करे अथवा अल्प शिक्षित ही क्यों न हो, समाज में उसे सम्मान प्राप्त होता रहेगा।
इस मानसिकता के कारण, कोई भी साधारण हिंदू युवा अपना स्टार्टअप या व्यवसाय प्रारंभ करने का साहस नहीं कर पाता, क्योंकि सरकारी नौकरी में न केवल स्थायित्व प्राप्त होता है, बल्कि ऊपरी आय, सामाजिक प्रतिष्ठा एवं विवाह में दहेज जैसी कुरीतियों का भी लाभ मिलता है। दूसरी ओर, यदि कोई युवा व्यवसाय या स्टार्टअप प्रारंभ करता है, तो उसे अपमानित किया जाता है और हेय दृष्टि से देखा जाता है।
स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत जितनी भी सरकारें रही हैं, वे सभी इस मानसिकता को गढ़ने में किसी न किसी रूप में उत्तरदायी रही हैं। दुर्भाग्यवश, इस सोच को परिवर्तित करने हेतु कोई गंभीर प्रयास नहीं किया जा रहा है।
इसमें आग में घी डालने का कार्य जातिगत राजनीति ने किया। जो लोग वर्षों से परंपरागत कार्यों में संलग्न थे तथा सेवा क्षेत्र में कार्यरत थे, उन्हें सर्वप्रथम अंग्रेजों ने यह समझाने का प्रयास किया कि ये जातियाँ तीन सहस्र वर्षों से शोषित रही हैं तथा इनका शोषण मात्र 4% ब्राह्मणों द्वारा किया गया है। इसके साथ-साथ अंग्रेजों ने अपना विकल्प प्रस्तुत करना प्रारंभ किया।
जब शिक्षित वर्ग ने नौकरियों को प्राथमिकता देना आरंभ किया, तब उनके अनुकरण में सेवा क्षेत्र से जुड़े हुए लोग भी इस प्रवृत्ति से प्रभावित होने लगे। फलस्वरूप, एक विशाल वर्ग ने अपने परंपरागत कार्यों को त्याग दिया। इस कथानक को आगे बढ़ाने हेतु अंग्रेजों ने शिक्षित वर्ग का सहारा लिया तथा सेवा क्षेत्र में कार्यरत लोगों के मन में विष घोलना प्रारंभ किया, जिससे उनमें कुंठा उत्पन्न हुई।
इसके पश्चात, सेवा क्षेत्र में कार्यरत लोगों को आरक्षण प्रदान किया गया। वर्ष 1914 की जनगणना के अनुसार, देश में 2% जनसंख्या अस्पृश्य श्रेणी में आती थी, जो धीरे-धीरे बढ़कर 20% हो गई। किंतु मंडल आयोग की संस्तुतियाँ लागू होने के पश्चात 85% जनसंख्या को अस्पृश्य घोषित कर दिया गया। यह सम्पूर्ण प्रक्रिया एक सुनियोजित षड्यंत्र का भाग थी, जिसके अंतर्गत 85% जनसंख्या को आरक्षण प्रदान कर दिया गया तथा शेष 15% जनसंख्या को शोषणकर्ता के रूप में स्थापित कर दिया गया।
आरक्षण प्रणाली के विस्तार से लोगों को सरकारी नौकरियाँ सहज उपलब्ध होने लगीं। अल्पशिक्षित व्यक्ति को भी सरकारी सेवा प्राप्त होने लगी, जिसके कारण अधिकांश जनसंख्या अपने पारंपरिक कार्यों को त्यागकर नौकरियों में प्रवृत्त हो गई। उदारीकरण के पश्चात लोगों को निजी क्षेत्र में भी अनेक अवसर प्राप्त होने लगे। औद्योगीकरण एवं तकनीकी विकास के फलस्वरूप वर्ष 1991 के उपरांत लोगों को नवीन संभावनाएँ प्राप्त हुईं, जिससे हिंदू समाज का एक बड़ा वर्ग नौकरीपेशा बन गया।
इस स्थिति का सर्वाधिक लाभ म्लेच्छ समुदाय ने उठाया, क्योंकि उनके पूर्वजों ने अपने पारंपरिक व्यवसायों को नहीं त्यागा। परिणामस्वरूप, वे आर्थिक रूप से सुदृढ़ होते चले गए।
कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI) एवं तकनीकी परिवर्तन के कारण, आगामी समय में कंप्यूटर आधारित नौकरियों में व्यापक कटौती होने की संभावना है। किंतु सेवा क्षेत्र के कार्य कभी समाप्त नहीं होंगे, और म्लेच्छ समुदाय ने इन पर अपना वर्चस्व स्थापित कर लिया है।
अतः भविष्य में म्लेच्छ समुदाय आर्थिक रूप से और अधिक सशक्त होगा, जिससे हमारे संतति को उनकी अधीनता स्वीकार करनी पड़ेगी। सरकारी तंत्र भी उनके अनुकूल कार्य करेगा, और हमारा समाज निरंतर पतन की ओर अग्रसर होता जाएगा। इस समस्त स्थिति के लिए हम स्वयं उत्तरदायी हैं, क्योंकि हमने इसे परिवर्तित करने का कोई प्रयास नहीं किया। अब भी यदि हम इस वास्तविकता को नहीं समझेंगे, तो आने वाली पीढ़ियों को इसका घोर दुष्परिणाम भोगना पड़ेगा।
इस पक्ष का एक अन्य पहलू यह भी है कि जो संगठन हिंदुत्व, सनातन धर्म एवं हिंदू समाज का अपने को प्रहरी बताते हैं वे अंग्रेजी आर्थिक मॉडल का कोई विकल्प प्रस्तुत नहीं कर सके। वे अपना स्वतंत्र आर्थिक मॉडल निर्मित नहीं कर पाए और अंग्रेजों द्वारा प्रदत्त मॉडल पर ही चलते रहे। इसका परिणाम यह हुआ कि एक वर्ग ने केंद्रीकृत समाजवादी आर्थिक मॉडल को अपनाया, जबकि दूसरे ने पूंजीवादी मॉडल को स्वीकार किया।
किन्तु जिनके ऊपर इस व्यवस्था में परिवर्तन लाने का दायित्व था, जो स्वयं को विश्व का सर्वाधिक विशाल संगठन कहकर गर्वित होते हैं, विविध प्रकल्पों का संचालन करते हैं तथा समाज के विविध क्षेत्रों में सक्रिय हैं—वे भी अंग्रेजों द्वारा निर्मित व्यवस्था का कोई विकल्प प्रस्तुत करने में असफल रहे। इसी कारण आज स्थिति अत्यंत जटिल हो चुकी है, जिससे हिंदू युवाओं का भविष्य संकटग्रस्त होता जा रहा है और वे दर-दर ठोकरें खाने के लिए विवश हो रहे हैं।
हमने न तो हिंदू आर्थिक मॉडल पर समुचित कार्य किया, न स्थानीयकरण (लोकलाइजेशन) को अपनाया, न तंत्र को विकेंद्रीकृत किया और न ही संपूर्ण व्यवस्था का कोई समुचित विकल्प विकसित किया। इस कारण भविष्य में गंभीर समस्याएँ उत्पन्न होंगी। इसमें दोष उन लोगों का भी है, जिनके पास समस्त व्यवस्था को परिवर्तित करने का अवसर था और जो एक नवीन विकल्प दे सकते थे। जब तक हम एक सशक्त विकल्प प्रस्तुत नहीं करेंगे, तब तक यह समस्या बनी रहेगी।
अंग्रेजों ने अपना पूंजीवादी आर्थिक सिद्धांत विकसित किया, जो उनका स्वयं का था। मुद्रा एवं अर्थनीति पर आधारित आचार्य चाणक्य का "मुद्रा राक्षस" सिद्धांत भी था, जिसे अंग्रेजों ने अपने अनुरूप विकसित किया और एक नवीन विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया, जिसे विश्व समाज ने स्वीकार कर लिया। किंतु हमने अंग्रेजों से समाजवादी सिद्धांतों का आयात किया और उनके जाल में ऐसे उलझे कि अब उससे निकलने का प्रयास भी हमारे लिए एक कठिन परिस्थिति बन चुका है।
संविधान की प्रस्तावना आज भी यही इंगित करती है कि न हम पूर्ण रूप से पूंजीवादी बन सके, न ही पूर्णतः समाजवादी। दो नावों पर सवार होने का परिणाम यह हुआ कि हम "धोबी के कुत्ते" की स्थिति में पहुँच गए—न घर के रहे, न घाट के।
हमारे संगठनों के पास यह स्वर्णिम अवसर था, जिसे हमने व्यर्थ गँवा दिया। हमारे विचारकों, जैसे श्रद्धेय दत्तोपंत ठेंगड़ी जी एवं राजीव दीक्षित जी ने हिंदू आर्थिक मॉडल पर व्यापक शोध एवं अध्ययन किया था। उनकी अवधारणाओं को व्यवहार में उतारने तथा उन्हें एक सशक्त विकल्प के रूप में स्थापित करने की आवश्यकता थी। किंतु हम ऐसा करने में असफल रहे।
हमारी अपनी सरकार एवं इतना विशाल संगठन होने के बावजूद यदि यह कार्य नहीं हो सका, तो इस विकट स्थिति के लिए दोषी हम स्वयं हैं तथा वे संगठन भी, जिनके पास संपूर्ण व्यवस्था को बदलने का अवसर था, किंतु वे उसे साकार नहीं कर सके।
इन परिस्थितियों में परिवर्तन लाने का यह एक उत्तम अवसर हमारे समक्ष उपस्थित है। हमें अपनी सरकार, हिंदू संगठन तथा हिंदू समाज का सहयोग लेकर सनातनी आर्थिक मॉडल को अपनाना चाहिए। इसे हिंदू आर्थिक मॉडल या भारतीय आर्थिक मॉडल किसी भी नाम से संबोधित किया जा सकता है, किंतु इसे पूंजीवादी एवं समाजवादी मॉडलों के विकल्प के रूप में प्रस्तुत किया जाना आवश्यक है।
यदि सनातनी आर्थिक मॉडल को धरातल पर क्रियान्वित किया जाए, तो वृहद स्तर पर परिवर्तन संभव है। भविष्य में हिंदू समाज एवं हिंदू युवाओं को दिशाहीन होने से रोकने के लिए इस मॉडल पर संगठित रूप से कार्य करना होगा। यदि हम इस दिशा में सतत प्रयास करें, तो कुछ वर्षों में ही हिंदू समाज की स्थिति में सकारात्मक सुधार होगा और भारत एक शक्तिशाली राष्ट्र के रूप में प्रतिष्ठित हो सकेगा।
इस लक्ष्य की सिद्धि हेतु हम सभी को संगठित एवं समर्पित प्रयास करने होंगे। सामूहिक पुरुषार्थ द्वारा ही वास्तविक परिवर्तन संभव है।
✍️ दीपक कुमार द्विवेदी ( बाल योगी)
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