सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

भारत में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के प्रभाव के परिणाम

भारतभूमि सदा से सनातन संस्कृति की वाहिका रही है, परंतु वामपंथी विचारधारा, विशेषतः सांस्कृतिक मार्क्सवाद (Cultural Marxism), ने इस राष्ट्र की मूल संरचना पर कुठाराघात करने का निरंतर प्रयास किया है। वामपंथ, जो मूलतः आर्थिक मार्क्सवाद पर आधारित था, औद्योगीकरण के प्रसार और शीतयुद्ध के अंत के पश्चात् सांस्कृतिक मार्क्सवाद के रूप में विकसित हुआ। इसकी मूल अवधारणा यह है कि समाज में आर्थिक वर्ग-संघर्ष के स्थान पर सांस्कृतिक संघर्ष उत्पन्न किया जाए, जिससे परंपरागत समाजिक ढांचे को तोड़ा जा सके। भारत में वामपंथ और सांस्कृतिक मार्क्सवाद का प्रभाव अत्यंत गहरा एवं व्यापक रहा है, जिसने राजनीति, अर्थव्यवस्था, शिक्षा, मीडिया, साहित्य, कला, धर्म एवं सांस्कृतिक मूल्यों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है।

स्वतंत्रता से पूर्व वामपंथ की भूमिका

वामपंथियों ने स्वतंत्रता संग्राम के समय ही भारतीय राष्ट्रवाद के विरुद्ध षड्यंत्र रचना प्रारंभ कर दिया था। उन्होंने यह मत प्रतिपादित किया कि भारत एक राष्ट्र नहीं है, बल्कि विभिन्न जातीय, भाषाई एवं सांस्कृतिक समूहों का संकलन मात्र है। इसी विचारधारा के आधार पर उन्होंने ब्रिटिश शासन को प्रस्ताव दिया कि भारत को स्वतंत्र करने के स्थान पर 30 भागों में विभाजित कर देना चाहिए। यह विभाजनकारी मानसिकता बाद में अलगाववादी आंदोलनों का आधार बनी।

स्वतंत्रता प्राप्ति के उपरांत भी वामपंथियों ने राष्ट्र-विरोधी गतिविधियों को जारी रखा। 1948 में वामपंथियों ने निज़ाम हैदराबाद के साथ मिलकर भारतीय संघ के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह छेड़ा, जिसे सरदार वल्लभभाई पटेल ने कठोरता से कुचल दिया। इसी प्रकार, 1967 में पश्चिम बंगाल के नक्सलबाड़ी क्षेत्र से प्रारंभ हुआ माओवादी आंदोलन, जो माओ की विचारधारा से प्रेरित था, राष्ट्र के लिए एक भीषण आंतरिक संकट बनकर उभरा। इस आंदोलन के कारण विगत 55 वर्षों में तीन लाख से अधिक निर्दोष नागरिकों की हत्या हुई और सहस्रों सैनिक वीरगति को प्राप्त हुए।

सांस्कृतिक मार्क्सवाद का उदय एवं प्रभाव

सांस्कृतिक मार्क्सवाद का प्रमुख उद्देश्य समाज में पारंपरिक मूल्यों को समाप्त कर, नववामपंथी विचारधारा को संस्थागत करना है। इसका आधार फ्रैंकफर्ट स्कूल के चिंतक जैसे एंटोनियो ग्राम्शी, थियोडोर अडोर्नो, मैक्स होर्कहाइमर, हर्बर्ट मार्कुसे आदि के सिद्धांतों पर टिका है। ग्राम्शी ने ‘सांस्कृतिक वर्चस्व’ (Cultural Hegemony) की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें यह प्रतिपादित किया गया कि किसी समाज को नियंत्रित करने के लिए उसके सांस्कृतिक मूल्यों एवं परंपराओं को नष्ट करना आवश्यक है। भारत में इस विचारधारा का प्रभाव निम्नलिखित क्षेत्रों में स्पष्ट रूप से देखा जा सकता है—

1. शिक्षा एवं अकादमिक क्षेत्र पर प्रभाव
आपातकाल के दौरान इंदिरा गांधी ने वामपंथियों को शैक्षिक संस्थानों का पूर्ण नियंत्रण सौंप दिया। इसके परिणामस्वरूप भारतीय इतिहास, समाजशास्त्र, राजनीति एवं साहित्य में वामपंथी विचारधारा का वर्चस्व स्थापित हो गया। भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के वास्तविक नायकों को गौण कर दिया गया, जबकि वामपंथी विचारकों को प्रमुख स्थान दिया गया। हिन्दू धर्म, सनातन संस्कृति एवं भारतीय इतिहास को विकृत रूप में प्रस्तुत किया गया। उदाहरणस्वरूप, मुगलों एवं ब्रिटिश उपनिवेशवादियों को गौरवशाली दिखाने का प्रयास किया गया, जबकि भारतीय राजाओं, संतों एवं योद्धाओं को साम्प्रदायिकता एवं प्रतिगामिता से जोड़ दिया गया।

2. मीडिया एवं संचार माध्यमों पर नियंत्रण
सांस्कृतिक मार्क्सवाद का एक प्रमुख उपकरण मीडिया है। मुख्यधारा के समाचार पत्र, टेलीविजन चैनल एवं डिजिटल प्लेटफॉर्म वामपंथी प्रभाव में हैं, जहाँ राष्ट्रवादी विचारधारा को कट्टरता का पर्याय बना दिया जाता है, जबकि वामपंथी एवं इस्लामी आतंकवाद को वैध ठहराने का प्रयास किया जाता है। ‘अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता’ के नाम पर वामपंथी एवं टुकड़े-टुकड़े गैंग के समर्थन में अभियान चलाए जाते हैं, जबकि राष्ट्रवादी विचारों को सेंसर कर दिया जाता है।

3. धर्म एवं आध्यात्मिकता पर आक्रमण
वामपंथियों ने हिन्दू धर्म एवं भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं पर निरंतर प्रहार किया है। ‘ब्राह्मणवादी पितृसत्ता’ का सिद्धांत प्रस्तुत कर हिन्दू धर्म के मूलभूत आधार को खंडित करने का प्रयास किया गया। हिन्दू देवी-देवताओं को मिथक बताना, महिषासुर-दुर्गा विमर्श उत्पन्न करना, दलितों को हिन्दू धर्म से पृथक करने का षड्यंत्र रचना, तथा हिन्दू परंपराओं को सामंतवादी एवं अत्याचारी घोषित करना—ये सभी सांस्कृतिक मार्क्सवाद की योजनाएँ हैं।

4. परिवार एवं लिंग सिद्धांतों का विखंडन
पारंपरिक परिवार व्यवस्था को ध्वस्त करने के लिए नारीवाद के अतिवादी रूप को बढ़ावा दिया गया। मातृत्व, गृहस्थ धर्म एवं विवाह संस्था को स्त्री के शोषण का उपकरण बताया गया। पश्चिम से प्रेरित LGBTQ+ आंदोलन को बढ़ावा देकर भारतीय समाज की पारंपरिक मान्यताओं को चुनौती दी गई। जेंडर न्यूट्रैलिटी एवं लैंगिक पहचान को विकृत रूप में प्रस्तुत कर नैसर्गिक संबंधों को समाप्त करने की योजना बनाई गई।

5. अर्थव्यवस्था एवं सामाजिक संरचना पर प्रभाव
भारतीय अर्थव्यवस्था में सरकारी नियंत्रण को बढ़ावा देकर निजी उद्योगों एवं स्वदेशी व्यापार को कमजोर किया गया। वामपंथी नीतियों के कारण बंगाल, केरल, बिहार एवं मध्यप्रदेश के कुछ भागों में उद्योगों का विनाश हुआ, जिससे व्यापक बेरोजगारी एवं पलायन की समस्या उत्पन्न हुई।

6. राजनीतिक परिदृश्य में वामपंथ का प्रभाव
भारतीय राजनीति में वामपंथियों का प्रभाव प्रत्यक्ष एवं परोक्ष रूप से निरंतर बना हुआ है। वामपंथी दल भले ही चुनावी परिदृश्य में कमजोर हुए हों, परंतु उनकी विचारधारा विपक्षी दलों एवं विभिन्न सामाजिक आंदोलनों के माध्यम से प्रकट होती रहती है। ‘अर्बन नक्सल’ नामक अवधारणा के अंतर्गत बुद्धिजीवी वर्ग, छात्र संगठन, फिल्म निर्देशक, साहित्यकार एवं एनजीओ—इन सभी को वामपंथी विचारधारा का प्रचार करने हेतु प्रयोग किया जा रहा है।

भारत में सांस्कृतिक मार्क्सवाद के प्रभाव के परिणाम

1. हिन्दू समाज में जातीय संघर्ष को प्रोत्साहित कर समाज को विखंडित करना।

2. धार्मिक परंपराओं एवं सांस्कृतिक मूल्यों को अवैज्ञानिक एवं रूढ़िवादी सिद्ध कर उन्हें नष्ट करने का प्रयास।

3. राष्ट्रवाद एवं सैन्य बलों के विरुद्ध नकारात्मक विमर्श तैयार करना।

4. भारतीय अर्थव्यवस्था को समाजवादी नीतियों के माध्यम से दुर्बल करना।

5. महिलाओं एवं युवाओं को पारंपरिक मूल्यों से भटकाकर पाश्चात्य विचारधारा की ओर प्रेरित करना।

इस प्रकार, सांस्कृतिक मार्क्सवाद एवं वामपंथी विचारधारा भारत के सांस्कृतिक, सामाजिक, राजनीतिक एवं आर्थिक ताने-बाने को छिन्न-भिन्न करने में निरंतर संलग्न रही है। यदि इस वैचारिक प्रदूषण को निष्क्रिय नहीं किया गया, तो भारतीय समाज अपनी मौलिक पहचान को खो सकता है।

✍️दीपक कुमार द्विवेदी

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