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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
महेन्द्र सिंह भदौरिया
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परम पूजनीय डॉ. श्री सदाशिवराव (गुरुजी) गोलवलकर जी : राष्ट्रवाद और संगठन शक्ति के अमर प्रेरणास्रोत
डॉ. सदाशिवराव गोलवलकर जिन्हें संपूर्ण समाज प्रेमपूर्वक गुरुजी कहता है वे केवल एक संगठनकर्ता नहीं बल्कि हिंदू राष्ट्रवाद की उस धारा के सृजक थे जिन्होंने भारत को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और समाज को संगठित करने के लिए अपना जीवन समर्पित कर दिया वे भारतीय संस्कृति के मर्मज्ञ थे और उन्होंने अपने कार्यों से यह सिद्ध किया कि जब कोई विचारधारा संगठित रूप लेती है तो वह राष्ट्र का भाग्य बदल सकती है
उनका जन्म 19 फरवरी 1906 को महाराष्ट्र के नागपुर में हुआ वे बाल्यकाल से ही एक मेधावी छात्र थे लेकिन उनकी रुचि केवल पढ़ाई तक सीमित नहीं थी वे भारत की सनातन परंपरा के प्रति गहरी श्रद्धा रखते थे और उनका मानना था कि भारत की आत्मा उसकी संस्कृति में बसती है जब उन्होंने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय से विज्ञान की पढ़ाई पूरी की तब उनके पास एक सुनहरा भविष्य था लेकिन उन्होंने आत्मकल्याण की राह छोड़कर राष्ट्र कल्याण का मार्ग चुना वे स्वामी अखंडानंद जी महाराज के सान्निध्य में आध्यात्मिक शिक्षा ग्रहण कर चुके थे और वहीं से उन्होंने सेवा और राष्ट्रनिर्माण का वास्तविक अर्थ सीखा
उनकी जीवन यात्रा का सबसे महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब वे डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार के संपर्क में आए संघ की विचारधारा और अनुशासन ने उन्हें इतना प्रभावित किया कि उन्होंने अपने संपूर्ण जीवन को इसी कार्य में समर्पित कर दिया डॉ. हेडगेवार के निधन के बाद 1940 में गुरुजी को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का दूसरा सरसंघचालक बनाया गया यह दायित्व कठिन था क्योंकि यह वह समय था जब भारत स्वतंत्रता संग्राम और विभाजन की त्रासदी के दौर से गुजर रहा था लेकिन गुरुजी ने संघ को केवल एक संगठन नहीं बल्कि राष्ट्र जीवन का अभिन्न अंग बनाने का निर्णय लिया
गुरुजी ने हिंदू समाज को संगठित करने के लिए एक स्पष्ट दिशा दी उन्होंने कहा कि जब तक हिंदू समाज संगठित नहीं होगा तब तक राष्ट्र सशक्त नहीं हो सकता उनके नेतृत्व में संघ का अभूतपूर्व विस्तार हुआ और लाखों स्वयंसेवक समाज में सक्रिय भूमिका निभाने लगे वे केवल संगठन के विस्तार तक सीमित नहीं रहे बल्कि उन्होंने हिंदू समाज को विभिन्न क्षेत्रों में सशक्त करने के लिए अनेक संगठनों की नींव रखी
1964 में उन्होंने विश्व हिंदू परिषद की स्थापना की जिसका उद्देश्य हिंदू समाज को एक सशक्त और जागरूक धारा के रूप में खड़ा करना था उन्होंने यह देखा था कि विश्वभर में फैला हिंदू समाज असंगठित है और उसे एक साझा मंच की आवश्यकता है इसी भावना से उन्होंने परिषद का मार्गदर्शन किया और विश्वभर में हिंदू जागरण की लहर दौड़ गई उनकी प्रेरणा से गौ रक्षा आंदोलन मंदिर मुक्ति आंदोलन और धर्मांतरण विरोधी अभियान जैसे अनेक आंदोलन खड़े हुए
गुरुजी का मानना था कि राष्ट्रवाद केवल राजनैतिक विचारधारा नहीं बल्कि यह समाज की सांस्कृतिक चेतना से जुड़ा हुआ विषय है वे कहते थे कि हिंदू राष्ट्र का अर्थ किसी समुदाय विशेष का प्रभुत्व नहीं बल्कि यह उस सांस्कृतिक चेतना का जागरण है जो संपूर्ण विश्व को वसुधैव कुटुंबकम की भावना से जोड़ता है उन्होंने स्वयंसेवकों को हमेशा यह सिखाया कि उनका कार्य समाज सेवा से ही राष्ट्र सेवा की ओर ले जाएगा उनके इस विचार का उदाहरण हमें 1971 के भारत-पाक युद्ध के दौरान देखने को मिला जब संघ के स्वयंसेवकों ने सीमा पर सैनिकों की सहायता की बांग्लादेश के शरणार्थियों को राहत पहुंचाई और भारत के गौरव की रक्षा के लिए अद्वितीय योगदान दिया
गुरुजी की संगठन शक्ति का प्रभाव केवल भारत तक सीमित नहीं रहा बल्कि उन्होंने संपूर्ण विश्व में हिंदू चेतना को जागृत करने का कार्य किया आज जब हिंदू समाज पुनर्जागरण के दौर से गुजर रहा है तब गुरुजी के विचार पहले से भी अधिक प्रासंगिक हो गए हैं स्वयंसेवकों परिषद के कार्यकर्ताओं और संगठन के हर कार्यकर्ता को उनसे यह सीख लेनी चाहिए कि किसी भी आंदोलन की सफलता केवल नारे देने से नहीं बल्कि अनुशासन और संकल्प से होती है
आज का सनातन समाज अनेक चुनौतियों से घिरा हुआ है धर्मांतरण गौहत्या मंदिरों पर हमले और हिंदू समाज को विभाजित करने के प्रयास लगातार हो रहे हैं ऐसे में गुरुजी का जीवन हमारे लिए एक प्रकाशस्तंभ के समान है हमें चाहिए कि हम उनके बताए मार्ग पर चलते हुए हिंदू समाज को संगठित करें मंदिरों और तीर्थस्थलों की रक्षा करें शिक्षा और संस्कृति के क्षेत्र में हिंदू मूल्यों का प्रसार करें और समाज को यह याद दिलाएं कि जब हम संगठित होते हैं तभी हम शक्तिशाली बनते हैं
गुरुजी ने अपने जीवन से यह सिद्ध किया कि विचार और संगठन जब एक साथ चलते हैं तो इतिहास बदल जाता है हमें चाहिए कि हम उनके विचारों को केवल ग्रंथों में सीमित न रखें बल्कि उन्हें अपने जीवन का हिस्सा बनाएं जब हर स्वयंसेवक यह संकल्प लेगा कि वह राष्ट्र सेवा को अपना जीवन लक्ष्य बनाएगा तभी भारत पुनः विश्वगुरु बनेगा और सनातन धर्म अपनी दिव्यता के साथ संपूर्ण विश्व में प्रकाश फैलाएगा यही गुरुजी को सच्ची श्रद्धांजलि होगी
लेखक
महेन्द्र सिंह भदौरिया
प्रांत सेवा टोली सदस्य
विश्व हिन्दू परिषद उत्तर गुजरात
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