सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।

तमाम अधिकारी जनता को पशु मानते हैं और भेड़ बकरी की तरह बिना सिविक सेंस वाली जनता का एक बड़ा हिस्सा सच में पशु जैसे हैं भी।


मेरी अपनी नज़र में प्रधानमंत्री ने इस देश की जो सबसे बड़ी सेवा की वह है जनता को यह बताना की सऊर से साफ़ सफ़ाई से रहो, कुछ नहीं तो कम से कम हगना तो सीख लो। पूरी दुनिया भारतीयों के बारे में कल्पना रखती है कि वो घर में रहते हैं और घर के बाहर हगते हैं। इसमें उस स्तर तक सच्चाई नहीं भी थी, फिर भी हमारे कुकर्म भी कम न थे। आज दस साल में आधी आबादी को हगने का सऊर आ गया है। बच्चों को इतना पता है कि मुंह में गोबर चबाने के बाद कहीं भी नहीं थूक देना है। मक्खी भिनभिनाते खाने से परहेज करना है। निश्चित रूप से अगली पीढ़ी स्वच्छता की आग्रही बनने वाली है और यह पीढ़ी यह इच्छा रखने लगी है कि उसका गांव और शहर स्वच्छता में अव्वल आए।

यदि प्रधानमंत्री जी देश में उसी स्तर का #कैंपेन_नागरिक_कर्तव्यों_को लेकर चलायें तो यह इस देश पर बहुत बड़ा एहसान होगा। रोज वीडियो आ रहे हैं। कहीं कुछ निकृष्ट और बेहूदे रेल में घुसने के लिए एसी बोगी का काँच तोड़ते हुए रील बना रहे हैं, तो कहीं कुछ क़बीलाई मेट्रो में बिना टिकट कूदते फाँदते जा रहे हैं, कहीं कुछ लंपट रेल के इमरजेंसी खिड़की को खुलवाने के लिए महिलाओं पर पानी फेंककर उन्हें भयाक्रांत कर रहे हैं। हर बड़े एक्सप्रेस-वे पर लोग उल्टा गाड़ी लेकर घुस रहे हैं और किसी न किसी परिवार को हर रोज अपनी नीचता से काल के गाल में भेज रहे हैं। किसी को कुछ नहीं मिल रहा तो ब्लेड से सीट फाड़ रहे हैं। गुटखा खाकर ट्रेन में थूक रहे हैं। दो दिन की यात्रा के लिए चार चार गठरी लेकर सिर पर चल रहे हैं, पीछे से कोई धक्का दे रहा है तो उसे मना करने के बजाय आगे वाले को दे रहे हैं और यदि कोई सुरक्षाकर्मी रोके तो उसे दुश्मन समझ रहे हैं।

 मुझे भली प्रकार याद है राम मंदिर उद्घाटन के समय का दृश्य...। मैं वहीं पर था, सब महत्वपूर्ण लोग बुलाए गए थे, उनसे तो सिविक सेंस की उम्मीद थी, लेकिन सब पागलों की तरह धक्का देने लगे। मैं आगे ही था, स्वयंसेवक होने के नाते सामने खड़े सुरक्षाकर्मियों को उस धक्का-मुक्की से किसी तरह लड़ते देखा तो मैं भी उनके साथ लग गया। पीछे जो धक्का दे रहे थे, उन पर चिल्लाना और समझाना शुरू किया कि भगदड़ हो जाएगी गिर जाओगे, ऐसा मत करो। मेरी देखा देखी चार पाँच लोग और साथ आए। आगे सुरक्षाकर्मी जो लगभग गिव-अप करने के स्थिति में थे, उनके जान में जान आई और थोड़ी देर में सब ठीक।

कभी कुंभ में भगदड़, कभी मंदिर में भगदड़, कभी रेलवे स्टेशन पर ठेलीठेला, ऐन मौक़े पर ऐसी भयानक भीड़ में भला कौन प्लेटफार्म बदलने की घोषणा करता है? आप अधिकारियों की निगाह में तो पशु हैं। उन्हें क्या फ़र्क़ पड़ रहा है? लेकिन एक ट्रेन पकड़ने के लिए जिस तरह आप अपनी जान देने को तैयार हैं, वह साबित करता है कि अभी आप पशु की ही श्रेणी में हैं। अपने जान की चिंता सरकार से ज़्यादा आपको होनी चाहिए लेकिन यहाँ तो एक्सप्रेस-वे पर लोग उल्टा चलाते चले जा रहे हैं कि सामने वाले को मेरी चिंता रहेगी और वह ज़रूर जान बचायेगा। सड़क में गड्ढा होकर वहाँ कीचड़ का पानी इकट्ठा हो चुका है, उसमें मैगट दिखाई दे रहा हैं, लेकिन बगल में पानीपूरी का ठेला भिनभिनाती मक्खियों के साथ सज जाता है। पानीपूरी वाला पसीने वाले हाथ डाल डालकर पानी को मिला रहा है और उसे एंजॉय किया जा रहा है। मुंबई में लोकल को पकड़ने के लिए लोग कई दशक से जद्दो-जहद कर रहे हैं, लड़ रहे हैं, दौड़ रहे हैं। उसके लिए व्यवस्था नहीं बन रही। वह शहर का वाइब स्थापित किया जा रहा है। पत्रकार स्थापित कर रहे हैं और पशुवत् जनता, नेता अधिकारियों से प्रश्न पूछने के बजाय इसके साथ एडजस्ट करना सीख रही है। अच्छी सड़कें बन रही हैं। लोग बूढ़ी गायों को छोड़ दे रहे हैं। वह अनाथ पशु सड़क घेरकर बैठ रहे हैं, हादसे हो रहे हैं, कोई फ़र्क़ नहीं पड़ता। सरकारी अस्पताल, सरकारी कार्यालय जाइए, लिफ्ट से लेकर टॉयलेट तक और एक एक कोने तक गुटखा और पान की पीक से रंगा हुआ है। यह सरकारी कार्यालय का कैरेक्टर स्थापित कराया जा चुका है। कोर्ट में वकीलों को बैठने की ठीक से जगह नहीं, जबरदस्ती गर्मी में काला कोट, टाई लगवायी जा रही है, और वो उसे पहनकर आनंदित हैं। आधे से ज़्यादा वकीलों का जीवन दिन भर खड़े खड़े बीत रहा है लेकिन यह सामान्यता के तौर पर स्थापित हो चुका है। जीवन के हर क्षेत्र में पशुवत समाज असामान्यताओं को सामान्यता बना चुका है।

यदि इस देश को वास्तव में दुनिया के सामने सम्मानित बनाना है तो मेरा प्रधानमंत्री जी से अनुरोध है कि वह स्वच्छता की भांति नागरिक कर्तव्य और सामान्यता के प्रति लोगों को आग्रही बनने के लिए उसी स्तर की मुहिम छेड़ें जैसा उन्होंने स्वच्छता के लिए छेड़ा है। हम लोगों की पीढ़ी में बदलाव की संभावना कम है लेकिन यदि आग्रह स्थापित होता है तो शायद अगली पीढ़ी को पशुता से जरूर मुक्ति मिलेगी। रही बात दुर्घटना की तो एक पशु दूसरे पशु से भला कौन सी बहुत बड़ी संवेदना प्रकट करेगा? इतनी ही उम्मीद है कि अधिकारियों पर कड़ी कार्रवाई हो और सरकार ठीक से उनके परिवार को भुगतान करे।
🙏🙏🙏
Bhupendra Singh

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