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सनातन विचार ही वह प्रकाश है, जहाँ से जीवन, धर्म और कर्तव्य—तीनों का सत्य प्रकट होता है।
प्रस्तुतकर्ता
Deepak Kumar Dwivedi
को
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भारत की रीढ़ की हड्डी है परिवार।
पश्चिमी देशों में अठारह साल के बच्चे को निकाल बाहर करते हैं स्वावलंबी होने के नाम पर।
फिर वही बच्चे मां बाप को उनके अशक्त होने पर निकाल बाहर करते हैं।
हमारे आपके घर में तीस साल के बेरोजगार बेटे को बाप बैठा कर खिलाता है, जरूरी खर्च उठाता है, उसको निराश्रित छोड़ नहीं देता।
पश्चिमी देशों में तमाम नियम कानून हैं, बच्चे को मारोगे तो पुलिस आ जायेगी।
अलावा इसके, तमाम दबाव हैं। दुनिया भर के अनोवैज्ञानिक मनोवैज्ञानिक समझा रहे हैं कि बच्चे को एक थप्पड़ भी मारा तो न जाने कौन कौन से कांप्लेक्स उसमें पनप सकते हैं।
भारतीय मां बाप ये सब ठेंगे पर रखते हुए,
न पढ़ने पर बच्चे को बेफिकर सूंत देते हैं।
वही मां बाप जो अपना आखिरी रुपया खर्च कर के भी बच्चे के लिए टूर/फेट की फीस भर देते हैं।
और चमत्कार यह है कि बच्चे बुरा मानने की जगह पिटने की यादों पर हंसते हैं।
इसीलिए हमारे घरों में अभी भी बुजुर्ग कम ही जा रहे हैं वृद्धाश्रम।
यह कमीनी हरकत नव धनाढ्य करते हैं अधिकांश।
न तो पुराने पैसे वाले ऐसा करते हैं न परंपरावादी मध्यमवर्गीय लोग।
जिस निम्न वर्ग की हम लोग खिल्ली उड़ाते हैं,वो सारी गाली गलौज करने के बाद भी अपने बुजुर्गों को समेटे रखता है।
यह करते हैं नव धनाढ्य और उनकी होड़ लगाते स्यूडो आधुनिक मध्यमवर्गीय परिवार।
कमाल है यह। सीमित संसाधनों वाला एक क्लर्क मां बाप को नहीं त्यागता। बेरोजगार छोटे भाई को पैसे देता रहता है कंपटीटिव एक्जाम्स के फार्म भरने के लिए।
बहू सास से झांव झांव करती है लेकिन पति को उन्हें ले नहीं जाने देती कहीं।
यहां वृद्ध, बेड पर उठंगे, खांसते हुए गालियां देते रहते हैं, बहू भुनभुनाती रहती है लेकिन पोते पोतियां दादा दादी को जाने नहीं देते।
इसी को तोड़ना चाहता है बाजार।
काफी टूटा है। पूरा टूट गया तो हम यह लड़ाई हार जायेंगे।
फैसला आप कीजिए, जीतना है या हारना है।
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